हार के जीतने वाले को बाजीगर नहीं येडियुरप्पा कहते हैं, चौथी बार बने कर्नाटक के सीएम

कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार गिरने के येडियुरप्पा चौथी बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बन गए हैं. उन्हें कर्नाटक के राज्यपाल वजूभाई वाला ने राजभवन में आयोजित एक कार्यक्रम में पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई.

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Updated: July 26, 2019, 7:11 PM IST
हार के जीतने वाले को बाजीगर नहीं येडियुरप्पा कहते हैं, चौथी बार बने कर्नाटक के सीएम
कर्नाटक की गठबंधन सरकार गिरने के बाद एक बार फिर से बीएस येदियुरप्पा वहां के मुख्यमंत्री बन सकते है (फाइल फोटो)
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Updated: July 26, 2019, 7:11 PM IST
बीएस येडियुरप्पा चौथी बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बन चुके हैं. उन्होंने चौथी बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली है. राजभवन में आयोजित कार्यक्रम में राज्यपाल वजुभाई वाला ने येडियुरप्पा को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई. अब उन्हें एक हफ्ते बाद कर्नाटक की विधान सौदा में अपना बहुमत साबित करना होगा.

येडियुरप्पा कर्नाटक में पॉलिटिक्स के जोड़-तोड़ के महारथी हैं. कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार के गिरने से मुहर लग गई है. बुकंकरे सिद्धालिंगप्पा येडियुरप्पा कर्नाटक राजनीति के इतने मजबूत नाम हैं कि उनका विकल्प खोज पाना मुमकिन नहीं. एक हारी हुई बाजी को जीतकर वे ऐसा साबित भी कर चुके हैं. उन्होंने कह दिया है कि बीजेपी अब सरकार बनाने का दावा करेगी.

येडियुरप्पा ही विकल्प क्यों
वैसे कर्नाटक में पिछले चुनावों से पहले जब बीजेपी को कर्नाटक में अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करनी थी तो उसके सामने मुख्यमंत्री पद के तीन विकल्प थे. अनंत हेगड़े, प्रताप सिम्हा और बीएस येडियुरप्पा. लेकिन बीजेपी ने अपना दांव पहले दोनों नेताओं की हिंदुत्ववादी छवि को दरकिनार करते हुए येडियुरप्पा पर लगाया. यह गलत भी साबित नहीं हुआ और बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. हालांकि वह बहुमत से थोड़ी दूर रहे और कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर गठबंधन सरकार बनाई.

वे भी येडियुरप्पा ही थे जिन्होंने दक्षिण भारत में पहली बार कमल खिलाकर किसी राज्य में बीजेपी का खाता खोला था. बाद में हालांकि वे भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे, पार्टी से दरकिनार कर दिए गए, जिसके बाद उन्हें अपनी एक पार्टी कर्नाटक जनता पक्ष बनानी पड़ी. लेकिन 2014 में उनकी बीजेपी में फिर से वापसी हुई और वे कर्नाटक के प्रदेश अध्यक्ष के रास्ते से होते हुए पार्टी के सीएम कैंडिडेट भी बने.

ज़मीनी नेता रहे हैं येडियुरप्पा
येडियुरप्पा को सिर्फ लिंगायत का नेता नहीं कहा जा सकता है. कर्नाटक के मांड्या जिले के बुकानाकेरे में सिद्धलिंगप्पा और पुत्तथयम्मा के घर 27 फरवरी 1943 को जन्मे येडियुरप्पा ने चार साल की उम्र में अपनी मां को खो दिया था. उन्होंने अपने पॉलिटिकल करियर की शुरुआत साल 1972 में शिकारीपुरा तालुका के जनसंघ अध्यक्ष के रूप में की थी. इमरजेंसी के दौरान वे बेल्लारी और शिमोगा की जेल में भी रहे. यहां से उन्हें किसान नेता के तौर पर पहचान मिली. साल 1977 में जनता पार्टी के सचिव पद पर काबिज होने के साथ ही राजनीति में उनका कद और बढ़ गया.
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कर्नाटक की राजनीति में उन्हें नज़रंदाज़ करना इसलिए नामुमकिन हो जाता है क्योंकि 1988 में ही उन्हें पहली बार बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया था. येडियुरप्पा 1983 में पहली बार शिकारपुर से विधायक चुने गए और फिर छह बार यहां से जीत हासिल की. 1994 के विधानसभा चुनावों में हार के बाद येडियुरप्पा को असेम्बली में विपक्ष का नेता बना दिया गया. 1999 में जब वो चुनाव हार गए तो बीजेपी ने उन्हें MLC बना दिया. जिन दो महत्वपूर्ण जातियों के हाथों में राजनीति का भविष्य रहा है वो हैं लिंगायत और वोक्कालिगा. कर्नाटक में मुख्यमंत्री अमूमन इसी समुदाय से ही रहे हैं. पिछले विधानसभा चुनावों में हार के बाद बीजेपी को समझ आ गया कि बिना येडियुरप्पा के कर्नाटक में कमल खिलना बेहद मुश्किलों भरा साबित होगा.

येडियुरप्पा ने 1972 में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत दी थी (फाइल फोटो)


कर्नाटक के सबसे विवादित नेता भी हैं येडियुरप्पा
बता दें कि साल 2004 में उनकी पत्नी का निधन रहस्यमयी परिस्थिति में एक कुएं में गिरने से हो गया था. येडियुरप्पा पर जमीन घोटाले और अवैध खनन घोटाले के भी आरोप लगे थे. लोकायुक्त की रिपोर्ट के चलते बेरेजेपी आलाकमान ने मुख्यमंत्री की कुर्सी से रुखसत होने को कह दिया था. नवम्बर 2010 में येडियुरप्पा पर आरोप लगा कि उन्होंने बेंगलुरु में प्रमुख जगहों पर अपने बेटों को भूमि आवंटित करने के लिए अपने पद का दुरुपयोग किया जिससे वह विवादों के एक और घेरे में आ गए. पांच फरवरी 2011 को उन्होंने अपनी संपत्ति सार्वजनिक की और और कांग्रेस को चेतावनी दी कि वह उनके पास 'काले धन' की बात साबित करके दिखाए.

एक सप्ताह में दो बार हासिल किया था विश्वासमत
मई 2008 में उन्होंने बहुमत से कम के आंकड़े के साथ शासन की शुरुआत की लेकिन विपक्षी और निर्दलीय विधायकों को अपने पाले में कर उन्होंने जबर्दस्त बहुमत जुटा लिया जो इस्तीफा देकर उपचुनाव में उतरे. उन्होंने अपने अभियान को 'ऑपरेशन लोटस' नाम दिया और 224 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा बहुमत हासिल करने में सफल रही. लेकिन खनन क्षेत्र से जुड़े प्रभावशाली रेड्डी बंधु जनार्दन और करुणाकर उनके लिए परेशानी का सबब बने रहे. बाद में बीजेपी के ही 11 बागी विधायकों और पांच निर्दलीय विधायकों ने येडियुरप्पा सरकार से समर्थन वापस लेकर उन्हें संकट में डाल दिया. वह बच गये और दो बार विश्वास मत में जीत हासिल की. पहला ध्वनि मत से जीता जिसे राज्यपाल एच आर भारद्वाज ने असंवैधानिक करार दिया. उसके बाद उन्हें एक और शक्ति परीक्षण करना पड़ा जिसमें वह 100 के मुकाबले 106 मतों से विजयी हुए.

भारद्वाज के साथ अकसर मतभेद रखने वाले येडियुरप्पा भारतीय विधायिका के इतिहास में पहले ऐसे मुख्यमंत्री साबित हुए, जिन्होंने एक ही सप्ताह में दो बार विश्वास मत जीता.

कुमारस्वामी के साथ भी येडियुरप्पा ने बनाई थी सरकार (फाइल फोटो)


जब येडियुरप्पा को मिला कुमारस्वामी से धोखा
बगावत करने वाले 11 विधायकों को उच्च न्यायालय द्वारा अयोग्य करार दिये जाने के फैसले से संकट टलता देख रहे येडियुरप्पा के सामने फिर से कठिनाई का दौरा शुरू हुआ जब जेडीएस ने उन पर तथा उनके परिवार पर भूमि घोटालों के अनेक आरोप लगाए. गौरतलब है कि कांग्रेस की धरम सिंह नीत गठबंधन सरकार को हटाने में जेडीएस नेता कुमारस्वामी की मदद करके येडियुरप्पा ऊंचाई पर पहुंचे थे. कुमारस्वामी ने बीजेपी की मदद से सरकार बनाई. जेडीएस और बीजेपी के बीच समझौता हुआ, जिसके मुताबिक कुमारस्वामी पहले 20 माह तक मुख्यमंत्री रहेंगे, जिसके बाद 20 महीनों के बाकी कार्यकाल में इस पद पर येडियुरप्पा काबिज होंगे.

कुमारस्वामी की सरकार में येडियुरप्पा को उप मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री मनोनीत किया गया. बहरहाल अक्तूबर, 2007 में जब येडियुरप्पा के मुख्यमंत्री बनने की बारी आई तो कुमारस्वामी ने अपने पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया. इसके बाद येडियुरप्पा व उनकी पार्टी के सभी मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया तथा पांच अक्तूबर को राज्यपाल से मिलकर सरकार से भाजपा का औपचारिक समर्थन वापस ले लिया. कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लग गया.

राष्ट्रपति शासन की अवधि के दौरान जेडीएस और भाजपा ने अपने मतभेद दूर करने का फैसला किया और येडियुरप्पा मुख्यमंत्री बने. उन्होंने 12 नवंबर 2007 में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. जेडीएस ने मंत्रालयों के प्रभार को लेकर उनकी सरकार को समर्थन देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद 19 नवंबर, 2007 को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. घोटाले के आरोपों के बाद पार्टी से निकाल दिए गए 75 साल येडियुरप्पा ने 2011 में अपना अलग संगठन बनाया था लेकिन 2013 में इसका प्रदर्शन काफी खराब रहा था लेकिन वह बीजेपी के वोटबैंक का एक हिस्सा काटने में सफल रहे थे. इस वजह से बीजेपी को कर्नाटक में पराजय का मुंह देखना पड़ा था और 2014 में बीजेपी से उनका फिर से समझौता हो गया.

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First published: July 26, 2019, 5:48 PM IST
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