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पुश अप, डांस और तैराकी, राहुल गांधी ये सब दक्षिण भारत में ही क्यों कर रहे हैं?

राहुल गांधी दक्षिण से ही पार्टी को उबारकर सत्ता में लाने का ख्वाब देख रहे हैं. (फाइल फोटो: Shutterstock)

राहुल गांधी दक्षिण से ही पार्टी को उबारकर सत्ता में लाने का ख्वाब देख रहे हैं. (फाइल फोटो: Shutterstock)

Rahul Gandhi's Plan: अमेठी (Amethi) की असफलता और वायनाड की सफलता वाला फार्मूला अब राहुल एक संसदीय सीट से उठाकर पूरे इलाके में आजमाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. अब राहुल गांधी दक्षिण से ही पार्टी को उबारकर सत्ता में लाने का ख्वाब देख रहे हैं.

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नई दिल्ली. राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की हाल ही में तमिलनाडु (Tamil Nadu) दौरे की चार तस्वीरें बहुत चर्चित हुईं. पहली तब जब वो एक लड़की को ऑटोग्राफ देते हुए गले लगा लेते हैं, दूसरी जिसमें राहुल दनादन पुश अप करते हुए नज़र आ रहे हैं, तीसरी जब वो समुद्र में छलांग लगा देते हैं और चौथी जब वो मंच पर थिरकने लगते हैं. सवाल ये है कि राहुल गांधी ने दशकों तक उत्तर भारत (North India) की सीट अमेठी का प्रतिनिधित्व किया है. वो उत्तर भारत में भी खूब दौरे करते रहते हैं लेकिन इस तरह की तस्वीरें वो उत्तर भारत के दौरे के दौरान क्यों नहीं दिखाते?

इस सवाल का जवाब गांधी परिवार की हर संकट के समय 'दक्षिण देखो' की नीति में छुपा है. इतिहास गवाह है कि गांधी परिवार जब जब चुनौतियों का सामना करता है तब तब वह दक्षिण की तरफ रुख करता है. चाहे इमरजेंसी के बाद चौतरफा घिरी इंदिरा गांधी का चिकमंगलूर से 'एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर चिकमंगलूर' के नारे के साथ हुंकार भरना हो या सोनिया गांधी का बेल्लारी से चुनाव लड़ना हो या फिर राहुल गांधी का वायनाड से लोकसभा आना.

पिछले दो लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की दुर्गति, खासतौर पर उत्तर भारत के राज्यों में, ने राहुल गांधी को दक्षिण भारत पर फोकस करने को मजबूर कर दिया. अमेठी ने राहुल गांधी को हराया और वायनाड ने जिताया. मतलब अमेठी की असफलता और वायनाड की सफलता वाला फार्मूला अब राहुल एक संसदीय सीट से उठाकर पूरे इलाके में आजमाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. अब राहुल गांधी दक्षिण से ही पार्टी को उबारकर सत्ता में लाने का ख्वाब देख रहे हैं.



राहुल गांधी ने इसीलिए केसी वेणुगोपाल जैसे अपेक्षाकृत कम राष्ट्रीय राजनीति के अनुभव वाले नेता को संगठन महासचिव जैसे कांग्रेस के महत्वपूर्ण पद पर बैठाया. हाल ही में राहुल गांधी ने राज्य सभा से आज़ाद के रिटायर होने के बाद कर्नाटक से आने वाले मल्लिकार्जुन खड़गे को राज्यसभा में नेता विरोधी दल की कमान सौंपी.
दक्षिण पर राहुल गांधी के फोकस का आलम यह है कि पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव के प्रचार में राहुल सबसे ज्यादा वक्त तमिलनाडु, केरल और असम को दे रहे हैं जबकि पश्चिम बंगाल में अब तक उन्होंने चुनाव प्रचार की तारीखों पर मुहर तक नहीं लगाई है. कांग्रेस के जानकार कहते हैं कि राहुल गांधी केरल और तमिलनाडु में चुनाव खत्म हो जाने के बाद ही पश्चिम बंगाल का रुख करेंगे.

एक वजह यह भी है राहुल गांधी जब दक्षिण भारत में दौरे के लिए जाते हैं तब गांधी परिवार से होने की वजह से वहां पर वह आकर्षण का केंद्र होते हैं जो उत्तर भारत में देखने को अब नहीं मिलता. शुरुआत में उत्तर भारत में भी राहुल गांधी को लेकर उत्सुकता थी लेकिन समय के साथ अब वह फीकी पड़ चुकी है. दक्षिण भारत में जनता से मिल रहे समर्थन से खुश राहुल इसलिए भी दक्षिण की ओर ज्यादा रुख करते हैं.

वैसे राहुल गांधी की ये रणनीति बहुत रिस्की भी है. उत्तर का पूरा मैदान इग्नोर कर दक्षिण के बलबूते पार्टी को सत्ता में लाना टेढ़ी खीर हो सकती है क्योंकि भारत की राजनीति में ये कहावत मशहूर है कि दिल्ली का रास्ता यूपी होकर ही गुजरता है. तो सवाल ये है कि क्या राहुल गांधी खुद को दक्षिण में ज्यादा समेटकर उत्तर प्रियंका के करिश्मे के हवाले कर पूरे भारत में पार्टी को उबारने का प्लान बना रहे हैं?
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