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Opinion: भारत की न्याय व्यवस्था खुद के बारे में सोचे

Rakesh Kumar Malviya | News18Hindi
Updated: December 7, 2019, 12:11 PM IST
Opinion: भारत की न्याय व्यवस्था खुद के बारे में सोचे
हैदराबाद के शादनगर में 25 वर्षीय वेटनेरी डॉक्टर से रेप और हत्या के चारों आरोपियों के एनकाउंटर वाली जगह पर खड़ी पुलिस

देश यदि कानून और संविधान को जानते-समझते हुए भी इस तरह के संदिग्ध एनकाउंटर को एक सकारात्मक और न्याय देने वाला कदम ठहरा देता है तो उसपर आश्चर्य मत कीजिए. चिंता कीजिए कि मुल्क को हम किस दिशा में बढ़ा रहे हैं.

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  • Last Updated: December 7, 2019, 12:11 PM IST
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हैदराबाद एनकाउंटर के बाद देश में बहुसंख्यक वर्ग की जो प्रतिक्रिया आई उसके बाद देश की न्याय और कानून व्यवस्था को अपने बारे में गंभीर रूप से सोच लेना चाहिए. दरअसल यह समाज की मेधा खो जाने का प्रतीक नहीं है, यह प्रतीक है कि सालों साल चलते मुकदमों और गंभीर आपराधिक मामलों के दर्ज होने के बाद भी अपराधी बचकर निकल जाते हैं. कैसे उन्हें त्वरित रूप से न्याय नहीं मिल पाता? अदालतों में चक्कर पर चक्कर लगाते रहते हैं, ठीक जज की कुर्सी के सामने फाइल आगे बढ़ाने, तारीख देने के नाम पर खेल खुलेआम चलता है, उसने न्याय के मंदिर का क्या हाल कर दिया है! इसलिए देश यदि कानून और संविधान को जानते-समझते हुए भी इस तरह के संदिग्ध एनकाउंटर को एक सकारात्मक और न्याय देने वाला कदम ठहरा देता है तो उसपर आश्चर्य मत कीजिए. चिंता कीजिए कि मुल्क को हम किस दिशा में बढ़ा रहे हैं.

बलात्कार की हर घटना देश की आधी ही आबादी पर एक नया खौफ पैदा नहीं करती, वह एक बड़े वर्ग को प्रभावित करती है, जिसमें बच्चे भी होते हैं. मर्द भी होते हैं, हर कोई अपनों के लिए चिंतित हो उठता है. यह चिंता क्षणिक होती है, कुछ दिनों में हम भूल जाते हैं, देश किसी दूसरी भावना में बहने लगता है, इसलिए समाज के मूल सवालों पर कभी गंभीर विमर्श नहीं होता. समाज भूलकर अपने काम में लग जाता है और सरकारें अपराध संबंधी आंकड़ों को ही दबाकर भूल जाती है. इस बार की एनसीआरबी की रिपोर्ट भी बहुत देर से जारी की गई. जब समाज और सरकार इन विषयों पर बात करना बंद कर देते हैं तो वह नासूर धीरे-धीरे पल रहा होता है. और तो और अपराधियों को चुनकर संसद तक पहुंचा दिया जाता है.

इस साल जब एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफार्मस ने चुनाव में चुने गए सांसदों का विश्लेषण करके रिपोर्ट जारी की उसमें 43 प्रतिशत सांसदों ने खुद को किसी न किसी तरह के अपराध में लिप्त बताया. 2014 में यह आंकड़ा 34 प्रतिशत था और उसके पहले के साल में इससे भी पांच प्रतिशत कम था.


तय कीजिए कि हमारी मेधा किस ओर जा रही है, सोशल मीडिया की तरक्की और सूचना तकनीक की क्रांति के बाद हमारे पास हर जानकारी थी, हम मोबाइल फोन में ही देख सकते थे कि हम जो चुनने जा रहे हैं वह आदमी कैसा है, पर किया क्या. और ज्यादा अपराध के आरोपियों को चुन लिया. चुने गए 19 सांसदों ने खुद को महिला अपराध को आरोपी बताया. तीन ने खुद को बलात्कार का आरोपी बताया, इनमें से एक कांग्रेस से हैं, एक भारतीय जनता पार्टी से हैं, एक और अन्य दल से हैं. अपराध में भी बराबर की भागीदारी है. ये लोकतंत्र है, यह देश है .



यह देश ऐसा नहीं है, हमारे बुजुर्गों ने बहुत मेहनत करके संविधान बनाया है. संविधान के प्रकाश में कानून व्यवस्था बनी है. बहुत मेहनत से उसको लागू करने की कोशिश भी की है, लेकिन उसमें हमारी असफलताएं भी सामने आ रही हैं, पर क्या असफलताओं के समानांतर दूसरी ऐसी व्यवस्थाओं का समर्थन किया जाएगा, जो कोई दूसरी बीमारियां समाज में पैदा कर रही होंगी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं.)

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First published: December 7, 2019, 12:11 PM IST
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