SC/ST कोटे में कैटेगरी के आधार पर आरक्षण के फैसले पर फिर से गौर करने की जरूरत : सुप्रीम कोर्ट

SC/ST कोटे में कैटेगरी के आधार पर आरक्षण के फैसले पर फिर से गौर करने की जरूरत : सुप्रीम कोर्ट
कोर्ड ने कहा, शिक्षण संस्थानों में नौकरियों और प्रवेशों में कोटा देने के लिए, पुन: विचार करने की आवश्यकता है.

Quota Within Quota: 2004 में ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की संविधान बेंच (Constitution Bench) ने फैसला दिया था कि किसी वर्ग को प्राप्त कोटे के भीतर कोटे की अनुमति नहीं है, लिहाज़ा कोर्ट ने ये मामला आगे विचार के लिए 7 जजों की बेंच को भेजा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 27, 2020, 5:51 PM IST
  • Share this:
(उत्कर्ष आनंद)

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की संविधान बेंच ने गुरुवार को  कहा है कि राज्य आरक्षण (Reservation) के लिए SC/ST समुदाय में भी कैटेगरी बनाने पर विचार किया जा सकता है. अदालत ने कहा कि साल 2004 के फैसले पर फिर से विचार किए जाने की जरूरत है, जिसमें कहा गया था कि शैक्षणिक संस्थानों में नौकरियों और प्रवेश में आरक्षण देने के लिए राज्यों के पास अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों का उप-वर्गीकरण करने की शक्ति नहीं है. चूंकि 2004 में ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच (Constitution Bench) ने ये फैसला दिया था, लिहाज़ा कोर्ट ने ये मामला आगे विचार के लिए 7 जजों की बेंच को भेजा है.

शीर्ष अदालत ने संविधान बेंच को SC/ST के भीतर क्रीमी लेयर की अवधारणा पर पुनर्विचार करने के लिए कहा है. जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा, 'ई वी चिन्नैया मामले में संविधान बेंच के 2004 के फैसले पर फिर से गौर किए जाने की जरूरत है. इसलिए इस मामले को उचित निर्देश के लिए प्रधान न्यायाधीश (CJI SA Bodde) के समक्ष रखा जाना चाहिए.



अपने आदेश में जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने माना कि SC/ST के भीतर उप-जातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया जा सकता है.
अयोध्या में मस्जिद निर्माण के लिए बने ट्रस्ट में हो सरकारी नुमाइंदा, सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई याचिका

गुरुवार को बेंच ने कहा, 'इस तरह के वर्गीकरण से संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत राष्ट्रपति के आदेश के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होगी.' जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा, 'राज्य के पास आरक्षण देने की शक्ति है, तो यह उन उप-जातियों को इसका लाभ दे सकती है, जो पहले इसका फायदा नहीं उठा पा रहे थे.'


इंदिरा बनर्जी, विनीत सरन, एमआर शाह और अनिरुद्ध बोस वाली बेंच ने कहा कि 2004 के फैसले को सही ढंग से तय नहीं किया गया था और राज्य एससी/एसटी के भीतर जाति को उपवर्गीकृत करने के लिए कानून बना सकते हैं.

अभी 5 जजों की राय ये है कि 2004 के फैसले को फिर से पुनर्विचार की ज़रूरत है. चूंकि दोनों मामलों में आज फैसला देने वाली और ई वी चिन्नय्या मामले में फैसला देने वाली संविधान बेंच में जजों की संख्या 5 है. लिहाजा आज संविधान बेंच ने अपनी राय रखते हुए माना है कि पुराने फैसले में दी गई व्यवस्था पर फिर से विचार की ज़रूरत है. इसलिए इस मामले को प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे के पास भेज दिया गया, ताकि पुराने फैसले फिर से विचार करने के लिए बड़ी बेंच का गठन किया जा सके.

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले के बाद ये अपील दायर की गई थीं. इस फैसले में पंजाब अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग (सेवा में आरक्षण) अधिनियम, 2006 की धारा 4 (5) को रद्द कर दिया गया था. जिसके तहत प्रत्यक्ष भर्ती में अनुसूचित जाति के लिए आर‌क्षित रिक्तियों का 50 प्रतिशत, अगर उपलब्ध हो, तो पहली वरीयता के रूप में बाल्मीकि और मजहबी सिखों को देने का प्रावधान था. इस प्रावधान को असंवैधानिक ठहराते हुए, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने ईवी च‌िन्नैया बनाम स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश (2005) 1 SCC 394, पर भरोसा किया.



SG तुषार मेहता ने स्वरा भास्कर के खिलाफ अवमानना कार्यवाही के लिए सहमति देने से किया इनकार

इसमें कहा गया था कि अनुच्छेद 341 (1) के तहत राष्ट्रपति के आदेश में सभी जातियां सजातीय समूह के एक वर्ग का गठन करती हैं, और उन्हें आगे विभाजित नहीं किया जा सकता है. इसके बाद यह भी कहा गया था कि संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II की प्रविष्टि 41 या सूची III की प्रविष्टि 25 के संदर्भ में ऐसा कोई भी कानून संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा. (PTI इनपुट के साथ)
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज