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राफेल विवाद: राहुल ने पीएम को बताया भ्रष्ट, रक्षा मंत्री की फ्रांस यात्रा पर भी उठाए सवाल

राहुल गांधी ने रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण की यात्रा पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि निर्मला सीतारमण ने अचानक फ्रांस का दौरा क्यों किया. इसमें इमरजेंसी जैसी बात क्या थी?

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    राफेल डील पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि डील में शामिल एक अधिकारी ने भी फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति के बयान को सही बताया है. उन्होंने कहा कि राफेल मुद्दा सीधे तौर पर भ्रष्टाचार है.

    कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी चुप हैं. राहुल गांधी ने रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण की यात्रा पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि निर्मला सीतारमण ने अचानक फ्रांस का दौरा क्यों किया. इसमें इमरजेंसी जैसी बात क्या थी?

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    राहुल गांधी ने कहा कि दसॉ के साथ कई स्तर पर कॉन्ट्रैक्ट हुए हैं. दसॉ वही कहेगा जो भारत सरकार उसे कहने के लिए कहेगी. दसॉ के आंतरिक दस्तावेजों में लिखा गया है कि बिना क्षतिपूर्ति दिए हुए इस डील को पूरा नहीं किया जा सकता.



    कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ जांच की मांग की और आरोप लगाया कि वह एक ‘भ्रष्ट व्यक्ति’ हैं जिन्होंने 36 लड़ाकू विमानों की खरीद में अनिल अंबानी को 30,000 करोड़ रुपये का फायदा पहुंचाया. राहुल ने प्रधानमंत्री के खिलाफ अपने आरोपों के समर्थन में कोई साक्ष्य पेश नहीं किये. सरकार लगातार कहती रही है कि उसकी दसॉ द्वारा रिलायंस डिफेंस को चुनने में कोई भूमिका नहीं है.

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    कांग्रेस का आरोप है कि सरकार प्रत्येक विमान 1,670 करोड़ रुपये में खरीद रही है जबकि यूपीए सरकार ने प्रति विमान 526 करोड़ रुपये कीमत तय की थी. पार्टी ने सरकार से जवाब मांगा है कि क्यों सरकारी एयरोस्पेस कंपनी एचएएल को इस सौदे में शामिल नहीं किया गया.

    कांग्रेस ने इस पर भी जवाब मांगा कि विमान की कीमत 526 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1,670 करोड़ रुपये क्यों और कैसे की गई. सरकार ने भारत और फ्रांस के बीच 2008 समझौते के एक प्रावधान का हवाला देते हुए विवरण साझा करने से इंकार कर दिया है.

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    बुधवार को फ्रांस की खोजी वेबसाइट ‘मीडियापार्ट’ ने दसॉ एविऐशन के आंतरिक दस्तावेज के हवाले से खबर दी थी कि विमानन कंपनी 36 राफेल लड़ाकू विमानों का करार करने के लिए समझौते के तहत रिलायंस डिफेंस के साथ संयुक्त उपक्रम शुरू करने के लिए मजबूर थी.

    दसॉ एविऐशन ने एक बयान में कहा कि उसने ‘भारत के रिलायंस ग्रुप के साथ साझेदारी करने का फैसला स्वतंत्र रूप से किया.’

    पिछले महीने, ‘मीडियापार्ट’ ने फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के हवाले से कहा था कि ‘फ्रांस के पास दसॉ के लिए भारतीय सहयोगी कंपनी के चयन को लेकर कोई विकल्प’ नहीं था और भारत सरकार ने फ्रांसीसी विमानन कंपनी के सहयोगी के रूप में भारतीय कंपनी के नाम का प्रस्ताव रखा था.

    इस खबर ने राजनीतिक भूचाल ला दिया था और कांग्रेस ने सरकार पर हमले तेज कर दिये थे और सरकार ने मजबूती से इन आरोपों को खारिज किया था. दसॉ और रिलायंस डिफेंस विमान के उपकरण बनाने तथा राफेल सौदे की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए संयुक्त उपक्रम गठित करने की घोषणा कर चुके हैं.

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    भारत की ‘ऑफसेट’ नीति के अनुसार, विदेशी रक्षा कंपनियां उपकरणों, कलपुर्जों की खरीद या अनुसंधान एवं विकास केन्द्र स्थापित करने के लिए कुल अनुबंध कीमत की कम से कम 30 प्रतिशत राशि भारत में खर्च करेगी.

    कांग्रेस इस सौदे में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का आरोप लगा रही है और उसका कहना है कि सरकार हर विमान 1670 करोड़ रुपये से अधिक की राशि में खरीद रही है जबकि यूपीए सरकार ने 126 राफेल विमानों की खरीद पर बातचीत के दौरान हर विमान की 526 करोड़ रुपये की राशि तय की थी.

    विपक्षी दलों का आरोप है कि रिलायंस डिफेंस का गठन 2015 में राफेल सौदे की घोषणा से सिर्फ 12 दिन पहले हुआ. रिलायंस समूह ने इन आरोपों को खारिज किया है.

    कांग्रेस ने इस विषय पर भी सरकार से जवाब मांगे हैं कि सरकारी विमानन कंपनी एचएएल को इस सौदे में शामिल क्यों नहीं किया गया जबकि यूपीए सरकार में सौदे में एचएएल को शामिल करने का फैसला हुआ था.

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    ‘मीडियापार्ट’ की खबर के बाद अपनी प्रतिक्रिया में दसॉ एविऐशन ने कहा कि भारतीय नियमों तथा करार के अनुरूप कंपनी खरीद के मूल्य की 50 प्रतिशत के बराबर राशि भारत में कलपुर्जे खरीदने और अनुसंधान एवं विकास सुविधाएं स्थापित करने में खर्च (ऑफसेट) करने के लिए प्रतिबद्ध है.

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