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तीन राज्‍यों में कांग्रेस की जीत राहुल गांधी के लिए तीर है या तुक्‍का!

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Updated: December 15, 2018, 10:31 PM IST

एक साल पहले 11 दिसंबर 2017 को राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्‍यक्ष पद की कमान संभाली थी. संयोग देखिए कि 11 दिसंबर 2018 को यानी ठीक एक साल बाद उसी दिन कांग्रेस की जीत का डंका बजा.

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तीन राज्यों में कांग्रेस की एक साथ होली और दिवाली हो गई. हाथ ने बीजेपी को मात दे दी. अमित शाह के महाप्लान की कांग्रेस के कप्तान ने हवा निकाल दी. तो लगातार हार का मुंह देख रहे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ज़ोरदार कमबैक किया. लेकिन, कांग्रेस के इस जश्न में 2019 की चिंता भी छिपी है. यह चिंता है कांग्रेस के भविष्य को नरेंद्र मोदी के मुकाबले खड़ा करने की .

तीन राज्‍य जीतने के बाद राहुल ने कहा कि नरेंद्र मोदी ने मुझे सिखाया है कि राजनीति में क्या नहीं करना चाहिए. विपक्ष के नेता के नाते मुझे अफसोस है कि मोदी जी ने देश की धड़कन नहीं सुनी. हमने उन्हें हराया है लेकिन उन्होंने राज्यों के लिए जो काम किया है, उसके लिए धन्यवाद देता हूं. जिस तरह आज तीन राज्यों में हराया है 2019 में भी हराएंगे.

राहुल के आत्मविश्वास से भरे इन शब्दों में 2019 का यलगार है. बार-बार अपरिपक्वता के तीखे तंज का मीठा जवाब है. कांग्रेस के कमबैक की खुशी है. जीत की हैट्रिक पर नाज़ है और इसकी वजहें भी हैं. बिना चुनाव पूर्व गठबंधन के कांग्रेस ने हिंदी पट्टी के तीनों राज्यों में अपने दम पर जीत दर्ज की.

मध्य प्रदेश में जहां RSS का सबसे ज्यादा प्रभाव माना जाता है वहां आंकड़े अपने पक्ष में किए. तो यूपी की तुलना में जहां मुस्लिमों की आबादी छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में कुल मिलाकर 18 फीसदी के करीब है वहां किला फतह किया, जबकि कांग्रेस को मुस्लिमों की पार्टी कहने वालों की कमी नहीं.

लेकिन, क्या इस नाज़ में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का आगाज़ छिपा है. क्या इस जीत के मायने इतने बड़े हैं कि बीजेपी की पेशानी पर बल ला सकते हैं? क्या मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मिली कामयाबी से राहुल गांधी का क़द वाकई इतना बड़ा हो गया है कि वह नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का मुकाबला कर सकते हैं? नामदार होने के आरोपों को कामदार के तौर पर खुद को स्थापित कर विरोधियों को जवाब दे सकते हैं?

इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे. साथ ही कोशिश करेंगे ये जानने की तीन राज्यों में मिली जीत की हैट्रिक से क्या कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तुरुप का इक्का साबित हो चुके हैं या फिर इन राज्यों में एक ही दिन मनाई गई कांग्रेस की होली और दिवाली, सिर्फ तुक्का है!

11 दिसंबर को आए नतीजों में मध्य प्रदेश में मामा का खेल खराब हो गया, राजस्थान में वसुंधरा राजे का राजपाट चला गया और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह की विदाई हो गई. जानकार कहते हैं कि जमी-जमाई सरकारों का अंत तो आगाज़ है, अंजाम अभी बाकी है.

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दावा है कि राहुल गांधी को अब परिपक्व नेता ना मानने की ज़िद छोड़ देनी चाहिए. उनकी स्वीकार्यता को अब कोई नकार नहीं सकता. कांग्रेस के समर्थक तो राहुल गांधी में भविष्य के प्रधानमंत्री का अक्स भी देखने लगे हैं. कहने लगे हैं कि उनमें पीएम मोदी की लोकप्रियता में सेंध लगाने की कुव्‍वत भी है.

ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया ने कहा था, 'ये जीत कांग्रेस, कार्यकर्ताओं और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की है. मैं मानता हूं कि राहुल गांधी इस देश का नेतृत्व करें.'

समर्थकों की वफादारी साबित ही होती है इस बात से कि वह अपने सेनापति का पक्ष कैसे रखते हैं. लेकिन, यहां सवाल कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी के क़द और करिश्मे का है. क्योंकि लोकतंत्र में चुनाव जीतना और सरकार बनाना सफलता की निशानी तो है ही. लेकिन अपने नाम को लहर में तब्दील करना भी एक कला है.

वैसे जिस बीएसपी ने मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस को समर्थन दिया. वही कांग्रेस की कामयाबी में राहुल गांधी को श्रेय देने से परहेज़ कर रही है. साथ ही बीजेपी की हार के असल मायने समझा रही है और शायद कांग्रेस को आईना दिखा रही है.
बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा था कि बीजेपी से नाराजगी का फायदा कांग्रेस को मिला, ना चाहते हुए भी जनता ने कांग्रेस को चुना.


2019 से पहले मायावती की ज़ुबान कांग्रेस का गुमान तोड़ने की लिए काफी है. ये भी साबित हो जाता है कि कहीं ना कहीं कांग्रेस की कामयाबी में लोकतंत्र के तंत्र की शिकार जनता की नाराज़गी शामिल है. जिन चुनावों को 2019 लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल बताया जा रहा था. उससे ये पूरी तरह तय नहीं हुआ कि कांग्रेस में लोगों का भरोसा बढ़ रहा है. ये भी साबित नहीं हुआ कि राहुल गांधी की लोकप्रियता में इज़ाफा 2019 में मोदी के लिए खतरे की घंटी है. नतीजों पर गौर करें तो ये बात आसानी समझी भी जा सकती है.

मध्य प्रदेश में बीजेपी को मिली 109 सीटें जबकि कांग्रेस को 114 सीटें. BSP को 2 और अन्य के खाते में गईं 5 सीटें. यानि सत्ता विरोधी लहर, किसानों की नाराज़गी, बेरोज़गारी और घोटालों की आंच पर पर पक रही कांग्रेस की उम्मीदों की हांडी से वह जादुई आंकड़ा नहीं निकला जिसकी भविष्यवाणी चुनावी पंडित कर रहे थे.


बहुमत के लिए ज़रूरी 116 सीटों में से कांग्रेस को 2 सीटें कम मिलीं. लिहाजा, कांग्रेस को BSP की बैसाखी के सहारे सरकार बनानी पड़ रही है. राजनीतिक पंडितों का कहना है कि सत्ता विरोधी लहर के बावजूद बीजेपी को वैसी हार नहीं मिली और न ही कांग्रेस को एक बड़ी जीत. कांटे का मुकाबला रहा. कांग्रेस को तिनके का सहारा जैसा मामला रहा.

राजस्थान में कांग्रेस 99 पर नाबाद
जिस राज्य में 1993 के बाद से कोई भी पार्टी लगातार दूसरी बार सरकार ना बना पाई हो. जिस राज्य की मुख्यमंत्री को लेकर जनता में आक्रोश हो. उस राजस्थान में कांग्रेस बिल्ली के भाग का छींका टूटने की फिराक में लेटी हुई थी. लेकिन, उसे जनता ने नाकों चने चबवा दिए. राहुल गांधी ने दौरे पर दौरे किए.मंदिरों में माथा टेका, अजमेर शरीफ में चादर चढ़ाई तो नतीजे पक्ष में भी आए. लेकिन, पिछले कई चुनावों से आहत कांग्रेस को वह राहत नहीं मिली जिसकी उम्मीद सबको थी.

राजस्थान में सत्ता विरोधी लहर के बावजूद BJP को 73 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस शतक तक नहीं लगा पाई और 99 पर सिमट गई. BSP को 6 और अन्य के खाते में गईं 20 सीटें.
राजस्थान में कांग्रेस बीजेपी को सत्ता से बेदखल कर सरकार तो बनाने जा रही है. लेकिन, यहां मुकाबला एकतरफा तो बिल्कुल भी नहीं रहा, जैसा बताया जा रहा था. नतीजे इसकी तस्दीक करते हैं. राजस्थान में भी कांग्रेस बहुमत के आंकड़े से 2 कदम दूर रह गई. बहुमत के लिए 101 सीटें चाहिए थीं जबकि उसे मिली 99 सीटें. लिहाजा, यहां भी कांग्रेस को BSP और अन्य के सहारे सरकार बनानी होगी.

199 सीटों पर हो रही लड़ाई में कांग्रेस ने 99 सीटों पर कब्जा कर बाज़ी तो अपने नाम कर ली. लेकिन, कांग्रेस वह करिश्मा नहीं कर पाई जैसा 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने किया था. तब बीजेपी ने 163 सीटें जीती थीं और कांग्रेस सिर्फ 21 सीटें बचा पाई थी. हां, ये काबिलेगौर ज़रूर है कि कांग्रेस ने उन 21 सीटों से 99 तक का सफर भी तय किया.

अगर 'नोटा' ना होता तो क्या होता?
कांग्रेस दावे चाहे जो करे.राजनीति के जानकारों की मानें तो उसे तीन राज्यों में मिली जीत के पीछे यहां किसानों की बदहाली और बेरोजगारी के अलावा भी एक महत्वपूर्ण फैक्टर रहा नोटा यानी NONE OF THE ABOVE का. खासकर मध्यप्रदेश में जिस तरह की कांटे की टक्कर रही. उसमें नोटा और सपाक्स पार्टी का चुनावी मैदान में उतरना भी अहम था. सपाक्स सामान्य, पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदाय के शासकीय सेवकों का संगठन है जो प्रमोशन में आरक्षण की मुख़ालफ़त करता है.

बता दें कि मध्य प्रदेश में डेढ़ फीसदी वोट नोटा को पड़े जो अपने आप में काफी अहम था. मध्य प्रदेश की 11 सीटों पर नोटा ने बीजेपी का खेल खराब कर दिया. जहां बीजेपी कांग्रेस के हाथों बेहद कम अंतर से हारी.
कई सीटें तो ऐसी रहीं जहां जीत का अंतर महज़ 100 से कुछ ज्यादा ही था. जबकि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में 18 सीटें ऐसी हैं, जहां जीत-हार के अंतर से ज्यादा नोटा पर वोट पड़े. छत्तीसगढ़ की दंतेवाड़ा और राजस्थान की बेंगू सीट पर सबसे ज्यादा नोटा को वोट मिले.


वैसे अगर 2013 के चुनावों को देखें तो 15 साल से सत्ता में दूर कांग्रेस के लिए करीब 10 फीसदी वोट शेयर के अंतर को कम करना इतना आसान नहीं था. लेकिन स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ केंद्र सरकार के एससी/एसटी एक्ट में संशोधन और प्रमोशन में आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सवर्णों और कर्मचारियों में आक्रोश भी एक अहम फैक्टर रहा.

इससे मतदान प्रतिशत में बढ़ोत्तरी के साथ ही कांग्रेस को बीजेपी के करीब वोट प्रतिशत हासिल करने में मदद मिली.
2018 के चुनावों में बीजेपी का वोट प्रतिशत 41.00 फीसदी रहा जबकि कांग्रेस ने पिछली बार का अंतर कम करते हुए अपने वोट शेयर को 40.9 फीसदी तक पहुंचाने में सफलता हासिल की.


किसानों का मुद्दा भुनाने में नाकाम
हिंदी पट्टी के तीनों राज्यों में सबसे बड़ा दंगल जीतने के लिए राहुल गांधी ने किसानों का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठाया. मंदसौर में किसानों के आंदोलन में पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी हल्ला बोला. किसान समृद्धि संकल्प रैली के जरिए 6 किसानों की मौत को राजनीतिक मुद्दा बनाने की भरपूर कोशिश की.
नतीजे बताते हैं कि किसानों का मुद्दा भुनाने में कांग्रेस नाकाम रही.सिर्फ मंदसौर की ही बात करें तो बीजेपी नोटा के बावजूद 18370 वोटों के अंतर से सीट बचाने में कामयाब रही.


एक साल पहले 11 दिसंबर 2017 को राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्‍यक्ष पद की कमान संभाली थी. संयोग देखिए कि 11 दिसंबर 2018 को यानी ठीक एक साल बाद उसी दिन कांग्रेस की जीत का डंका बजा. पोस्टर राहुल गांधी की कामयाबी का जिक्र कर रहे हैं और इतिहास आगाह कर रहा है.. 1998 वाला वह दौर याद दिला रहा है जब राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस को बहुमत देकर जनता जनार्दन ने 1999 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को चुन लिया था.

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First published: December 15, 2018, 9:16 PM IST
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