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अहम चुनावों से पहले CWC में बदलाव राहुल गांधी के लिए बड़ा जुआ साबित हो सकता है

राहुल गांधी की फाइल फोटो

राहुल गांधी की फाइल फोटो

सीडब्लूसी में जगह नहीं बना पाने वाले नेताओं में प्रमुख हैं: सुशील कुमार शिंदे, दिग्विजय सिंह और जनार्दन द्विवेदी.

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    वेंकटेश केसरी

    कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी की नई कार्यकारिणी में युवा और पुराने दिग्गजों के रिश्तों के बीच खटास साफ तौर पर देखी जा सकती है. कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी ने अपने राष्ट्रीय पदाधिकारियों को एक-एक कर आराम से बदला और आखिर में पद संभालने के छह महीने बाद उन्होंने CWC को एक झटके में ही बदल दिया.

    पार्टी के पुनर्गठन से संदेश साफ है सोनिया गांधी के वफादार अपनी जगह पर जमे रह सकते हैं. लेकिन महत्वपूर्ण फैसलों में राहुल के वफादारों की अहम भूमिका होगी. करीब दो दशकों तक पार्टी के फैसलों को प्रभावित करने वाली मैनेजेरियल कल्चर को परखने के लिए राहुल गांधी ने यह बदलाव किया है.

    ये सब ठीक है, क्योंकि नए पार्टी अध्यक्ष को संगठन चलाने के लिए भरोसेमंद सहयोगियों की अपनी टीम चुनने की आज़ादी होनी चाहिए. लेकिन इस बदलाव की टाइमिंग पर लोग सवाल उठा रहे हैं. दरअसल यह बदलाव राज्यों में निर्णायक चुनावी लड़ाई से ठीक पहले किया गया है जिसके चलते पार्टी के भीतर कई लोग नाराज हैं.

    सीडब्लूसी में जगह नहीं बना पाने वाले नेताओं में प्रमुख हैं: सुशील कुमार शिंदे, दिग्विजय सिंह और जनार्दन द्विवेदी.

    पूर्व केंद्रीय मंत्री और यूपीए 2 लोकसभा के नेता रह चुके शिंदे पार्टी का दलित चेहरा रहे हैं. राहुल का यह फैसला लोकसभा चुनाव से पहले महाराष्ट्र में गलत संदेश भेज सकता है. कांग्रेस को विश्वास है कि एनसीपी और अन्य पार्टियों की मदद से वह चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करेगी.

    दिग्विजय सिंह दो बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. वह हिंदी भाषी क्षेत्र में प्रमुख ठाकुर नेता हैं. माना जा रहा है कि वह इस अपमान को हल्के में नहीं लेंगे और इसका असर आगामी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है. मध्य प्रदेश कांग्रेस पहले ही दो हिस्सों में बंटी हुई है. (पढ़ेंः खुशी है कि राहुल ने नई टीम बनाई- दिग्विजय सिंह)

    वहीं जब कांग्रेस में प्रियंका गांधी को सोनिया गांधी की राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने की मांग चल रही थी तब जनार्दन द्विवेदी ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने सोनिया से राहुल को एक्टिव पॉलिटिक्स में उतारने को कहा था.

    द्विवेदी ने कांग्रेस सेवा दल शिविर में यह सुझाव दिया था और सोनिया ने तुरंत उनकी बात का समर्थन किया था. इसके बाद राहुल गांधी को 2004 में अमेठी लोकसभा सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार बनाया गया.

    इस कार्यकारिणी में एक और बड़े नेता को जगह नहीं मिली है. वह हैं हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भुपिंदर सिंह हूडा. राहुल ने उनकी प्रतिद्वंद्वी मानी जाने वाली शैलजा कुमारी को सीडब्लूसी में जगह दी है.
    कांग्रेस के मीडिया सेल प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला जो कि हरियाणा से आते हैं और जो हूडा सरकार में मंत्री रह चुके हैं, उन्हें CWC में स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाया गया है. पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल के बेटे कुलदीप बिश्नोई को भी विशेष आमंत्रित सदस्य का स्थान दिया गया है. वह भी हूडा के प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं. हालांकि हूडा को खुश करने के लिए उनके बेटे दिपेंदर को भी विशेष आमंत्रित सदस्य बनाया गया है.

    टीम में इस बदलाव से नाखुश एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'राहुल गांधी यह एक्सपेरिमेंट ऐसे वक्त में कर रहे हैं जब हमें जंग लड़नी है.'

    कांग्रेस में फिलहाल अलग-अलग जातियों के मजबूत नेताओं और ताकतवर क्षेत्रीय नेताओं की कमी है.

    कांग्रेस में यह खालीपन तब आया जब हिंदी भाषी क्षेत्रों में दलितों का झुकाव बसपा की तरफ, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में दक्षिण भारतीय पार्टियों, महाराष्ट्र में शरद पवार की एनसीपी की तरफ मराठाओं का झुकाऔर और ब्राह्मण और ठाकुरों का बीजेपी की तरफ झुकाव बढ़ गया. हिंदी भाषी क्षेत्रों में उच्च जातियों ने बीजेपी के ओबीसी वोटबैंक के साथ एक राजनीतिक संबंध बना लिया है.

    राहुल गांधी ने कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को यह सोचकर सीडब्लूसी में शामिल किया कि इससे से कर्नाटक की ओबीसी जातियां खुश होंगी लेकिन विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार ने उन्हें अपने ही राज्य में कमजोर बना दिया है.

    कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस बदलाव के साथ ही एक बड़ा दाव खेल दिया है. राहुल के पास भले ही वक्त हो लेकिन कई नेता ऐसे हैं जिनके पास वक्त नहीं है. और राजनीति में चूके हुए मौकों से ज्यादा जीती हुई लड़ाई मायने रखती है.

    लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, यह उनकी निजी राय है.

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