OPINION: 2019 के रण में मोदी मैजिक से मुकाबले के लिए यह है राहुल की रणनीति

राहुल गांधी इससे पहले धर्म को निजी स्तर तक ही सीमित रखते रहे हैं, ताकि पार्टी की सेक्युलर छवि को बनाया रखा जा सके. लेकिन अब वो धर्म के मामले में खुलकर प्रदर्शन कर रहे हैं.

News18.com
Updated: September 10, 2018, 1:02 PM IST
OPINION: 2019 के रण में मोदी मैजिक से मुकाबले के लिए यह है राहुल की रणनीति
राहुल गांधी इससे पहले धर्म को निजी स्तर तक ही सीमित रखते रहे हैं, ताकि पार्टी की सेक्युलर छवि को बनाया रखा जा सके. लेकिन अब वो धर्म के मामले में खुलकर प्रदर्शन कर रहे हैं.
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Updated: September 10, 2018, 1:02 PM IST
सरोज नागी
क्या कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी की रणनीतियों का तोड़ खोज लिया है. बीजेपी 2014 में सत्ता में आई. सत्ता में आने के साथ मोदी सरकार ने "हिंदुत्व, एंटी- कांग्रेस मुहिम, नेशनलिज़्म और डेवेलेपमेंट" का मुद्दा उठाया, जिसका संक्षिप्त रूप हैंड (HAND) है जो कि कांग्रेस पार्टी का चुनावी निशान भी. जबकि राहुल गांधी 'फार्मर (किसान), आदिवासी, दलित (अनुसूचित जाति) और शिव भक्ति' (FADS) के सहारे इसका मुकाबला करने की तैयारी में हैं.

सवाल ये है कि क्या बीजेपी को पटखनी देने की मुहिम राहुल गांधी की कैलाश यात्रा के साथ ही खत्म हो जाएगी या कांग्रेस के पास और भी कोई योजना है. कांग्रेस को 2014 में 20 फीसदी से भी कम वोट मिले थे. इस वक्त कांग्रेस की चार राज्यों- पंजाब, मिज़ोरम, पुडुचेरी और कर्नाटक में सरकार है. इसमें भी कर्नाटक में गठबंधन सरकार है. कांग्रेस के पारंपरिक वोटर रहे 'ब्राह्मण-अल्पसंख्यक-एससी/एसटी' अब उसके पाले से खिसकते जा रहे हैं, क्योंकि दूसरी पार्टियां ने इन वोटरों को हाईजैक कर लिया है.

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सोनिया गांधी ने 2004 के चुनावों के बाद अपनी नीतियों में थोड़ा परिवर्तन करते हुए पार्टी को गरीब और आम आदमी की राजनीति की तरफ मोड़ा. इसके अलावा दूसरी पार्टियों को भी अपने साथ लेने की कोशिश की, जिनका खुद का एक वोट आधार था. लेकिन 2014 में हार का मुंह देखने के बाद कांग्रेस ने अब अपनी नीति बदल दी है और वो नए तरीकों की तलाश कर रही है. हिदुत्व इसका एक उदाहरण है.

इस मामले में कांग्रेस के समर्थकों की अलग-अलग राय है. कुछ लोगों कहना है कि हिंदू पहचान को ज़ाहिर करने से बीजेपी के एजेंडे के खिलाफ हिंदुओं को अपने पक्ष में किया जा सकेगा. दूसरी ओर कुछ लोगों का कहना है कि इससे कांग्रेस को मिलने वाला अल्पसंख्यकों का वोट बैंक खिसक जाएगा.

राहुल गांधी इससे पहले धर्म को निजी स्तर तक ही सीमित रखते रहे हैं, ताकि पार्टी की सेक्युलर छवि को बनाया रखा जा सके. लेकिन अब वो धर्म के मामले में खुलकर प्रदर्शन कर रहे हैं. गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान वो करीब दो दर्जन मंदिरों में गए. इसी तरह कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान भी वो तमाम मंदिरों और मठों में गए. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने वाले हैं और उम्मीद है कि राहुल गांधी वहां भी कुछ ऐसा ही करेंगे. कैलाश मानसरोवर यात्रा भी इसमें एक कड़ी है.

क्या इन कदमों से कांग्रेस 'एंटी-हिंदू' होने के आरोपों से बरी हो पाएगी?
सवाल यह है कि क्या कांग्रेस का यह कदम भूल सुधार है. कांग्रेस जो कि हमेशा बीजेपी के हिंदुत्व के एजेंडे से विपरीत एजेंडा रखती रही है वो भी अब सॉफ्ट हिंदुत्व का मुद्दा अपना रही है. इससे कहीं ये भी साबित हो रहा है कि कांग्रेस उस नीति को अपना रही है कि अगर आप किसी से लड़कर जीत नहीं सकते तो उसके साथ हो लें.

साफ्ट हिन्दुत्व की राह सिर्फ राहुल गांधी ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस के प्रमुख कमलनाथ ने भी अपना ली है. इसी की एक बानगी देखने को मिली, जब हाल ही में उन्होंने सभी पंचायतों में गौशाला बनवाने का वादा किया. उधर पंजाब में अमरिंदर सरकार ने भी आईपीसी में 295AA को शामिल किए जाने के लिए सहमति जताई, जिसके तहत गुरु ग्रंथ साहिब, गीता, कुरान और बाइबिल का अपमान करने पर उम्रकैद की सज़ा का प्रावधान है. सवाल है कि कांग्रेस ऐसा क्यों कर रही है?

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2014 के लोकसभा चुनावों मे हार के बाद कई अन्य फैक्टर के अलावा रिपोर्ट में पाया गया कि जनता में एक संदेश चला गया था कि कांग्रेस मुस्लिमों को समर्थन देने वाली पार्टी है, बीजेपी ने भी कांग्रेस पर 'स्यूडो सेक्युलर' और 'एंटी-हिंदू' होने के आरोप लगाए.

अब राहुल का हिंदूवादी चेहरा दिखाकर कांग्रेस हार्ड कोर हिंदू वोट नहीं भी जुटा पाएगी तो भी बीजेपी के एंटी-हिंदू वाले आरोप के असर को कम करने में सफल हो सकती है. लेकिन यह खेल कांग्रेस के लिए खतरों भरा हो सकता है. सॉफ्ट हिंदुत्व का यह खेल दूसरे वर्गों को कांग्रेस से दूर कर सकता है.

हालांकि यह पहली बार नहीं है कि कांग्रेस ने सॉफ्ट हिदुत्व का सहारा लिया हो. भले ही नेहरू के पास इस तरह की बातों के लिए समय न रहा हो लेकिन उनके नाम के साथ जोड़ा जाने वाला 'पंडित' शब्द कहीं न कहीं इसी सामाजिक धार्मिक पृष्ठभूमि से आता था.

इंदिरा गांधी अक्सर मंदिरों और मठों मे जाया करती थीं. 1986 राजीव गांधी ने अयोध्या में राम जन्म भूमि का ताला खुलवाया और इसके बाद राम राज्य लाने के वादे के साथ फैज़ाबाद से अपना चुनाव प्रचार शुरू किया. सोनिया गांधी ने भी 2001 में संभवतः अपने ऊपर लगने वाले विदेशी मूल के आरोपों को खारिज करने के लिए कुंभ मेले के दौरान संगम में डुबकी लगाई.

राहुल गांधी 2015 में केदारनाथ की यात्रा करके सुर्खियों में आ गए थे. बाद में 2016 में उन्होंने राम जन्मभूमि की यात्रा की. मस्जिद ढहाए जाने के बाद से गांधी परिवार से वहां जाने वाले वह पहले व्यक्ति बन गए थे. अब कैलाश यात्रा करके उन्होंने अपनी इस छवि को अच्छी तरह से उभार लिया है.

हालांकि, इससे पहले गांधी परिवार के नेता इस बात का ध्यान रखते थे कि हिंद्त्व का कार्ड साधने के चक्कर में मुस्लिम वोट उनके खाते से न खिसक जाए. लेकिन राहुल गांधी इस बात को लेकर चिंतित नहीं हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि बीजेपी का विरोध करने वाले मुसलमान या तो कांग्रेस में आएंगे या तो किसी दूसरी पार्टी में जाएंगे और इस स्थिति में अगर महागठबंधन बनता है को अंततः फायदा उन्हें कोई नुकसान नहीं होगा.

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बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे कांग्रेस को फायदा होगा. इससे पहले चाहे वह अयोध्या में राम मंदिर का ताला खुलवाने का फैसला रहा हो या कि ऑपरेशन ब्लू स्टार ये दोनों ही काफी बड़े फैसले थे. लेकिन राहुल का मंदिरों में जाना इससे बिल्कुल अलग है. इसका फायदा भी कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिला. जिन-जिन क्षेत्रों में राहुल गांधी ने दौरा किया था वहां-वहां उन्हें काफी वोट मिला. हालांकि इसमें दूसरे फैक्टर भी थे जो काम कर रहे थे.

बीजेपी पर हमला
राहुल गांधी ने लगातार मोदी सरकार को पूंजीपतियों की, जनता विरोधी, एससी/एसटी विरोधी और सूट-बूट वाली सरकार बताकर और गब्बर सिंह टैक्स का ज़िक्र करके परेशानियां खड़ी करने की कोशिश की है. 2019 के चुनावों के पहले उम्मीद है कि मोदी सरकार कुछ मुद्दों को हल कर लेगी लेकिन कांग्रेस के सामने भी बड़ी चुनौतियां हैं. सिर्फ भाषणों और आरोपों से काम नहीं चलेगा बल्कि कांग्रेस को लोगों से जुड़ाव पैदा करने के साथ-साथ अपनी पहुंच को बढ़ाना होगा.

(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यहां लिखे विचार उनके निजी हैं.)
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