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कांग्रेस का नेतृत्‍व करने से हिचक रहे राहुल, राजस्‍थान और हरियाणा के मसलों पर निगाहें टिकीं

आने वाले चुनावों के मद्देनजर यदि कांग्रेस नेताओं के बीच टकराव की स्थिति बनती है तो पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना होगा. (File Photo)
आने वाले चुनावों के मद्देनजर यदि कांग्रेस नेताओं के बीच टकराव की स्थिति बनती है तो पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना होगा. (File Photo)

राहुल गांधी, पार्टी के वरिष्‍ठ नेताओं को तब तक अलग नहीं कर सकते, जब तक नया समूह जिम्‍मेदारी लेने को तैयार न हो जाए. और यही उनके लिए सबसे बड़ी दुविधा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 8, 2021, 9:12 PM IST
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कांग्रेस ने बुधवार की देर रात राजस्‍थान के सचिवों और महासचिवों की सूची जारी कर दी. इसमें सचिन पायलट और अशोक गहलोत के समर्थकों के बीच संतुलन रखते हुए कुछ निष्‍पक्ष नेताओं को भी शामिल किया गया है. यह तो बस एक झलक भर है कि समस्‍या खत्‍म हो गई जबकि इससे कहीं अधिक मुश्किल मुद्दा तो अभी सुलझना बाकी है. सवाल है कि क्‍या पायलट जो चाहते हैं, वे वह पा सकेंगे और क्‍या गहलोत  ऐसा होने देंगे?

नई दिल्‍ली के करीब सिंघु सीमा पर आंदोलन कर रहे किसानों से कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख और हरियाणा नेता रणदीप सुरजेवाला मिल रहे थे. इसके साथ ही रणदीप ने एक भावपूर्ण वीडियो सीरीज को‍ रिलीज किया. इस वीडियो में किसानों के प्रति उनकी चिंता और सहयोग को साफ देखा जा सकता है. दिलचस्‍प है कि भूपिंदर हुड्डा कहीं दिखाई नहीं पड़ रहे जबकि वे राज्‍य में भारतीय जनता पार्टी के विकल्‍प हो सकते हैं. कांग्रेस पार्टी भी आंदोलन स्‍थल पर अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा रही. इस विरोध पर कोई चर्चा भी नहीं करना चाहता, लेकिन सबको पता है कि आने वाले चुनाव में यह मुद्दा छाया रहेगा. ऐसा भी हो सकता है कि खट्टर की घटती लोकप्रियता के बावजूद भाजपा को लाभ मिल जाए.

इन तमाम घटनाओं के बीच राहुल गांधी का इंतजार हो रहा है. कांग्रेस के मुताबिक राहुल अभी छुट्टियां मना रहे हैं. पार्टी के भीतर अध्‍यक्ष पद को लेकर तैयारियां की जा रही हैं, लेकिन यह स्‍पष्‍ट नहीं हैं कि क्‍या राहुल एक बार फिर से जिम्‍मेदारी लेने को तैयार हैं. पार्टी के अंदरूनी सूत्र कहते हैं कि यह कोई मसला नहीं है. सारे निर्णय राहुल ही कर रहे हैं और अब तो उन्‍हें बहन का भी साथ मिल गया है. आमतौर हर संकट की घड़ी में वे दोनों ही याद आते हैं.




अभी राजस्‍थान और हरियाणा की बात करने का खास कारण है. एक में चुनाव होने हैं और दूसरे में गेहलोत और पायलट के बीच विवाद का हल निकाला जाना है. यह कांग्रेस की बहुत पुरानी समस्‍या है, कि उसमें लिए जाने वाले निर्णय पर स्‍पष्‍टता की कमी होती है. आमतौर पर ऐसे मामलों में कांग्रेस अपनी खुद की गलतियों के कारण हार जाती है.

पायलट ने राहुल से की थी पांडे की शिकायत
राजस्‍थान की बात पहले करें तो अजय माकन को महासचिव बनाते हुए राज्‍य का प्रभारी बनाया गया है. इससे पहले सचिन पायलट ने पूर्व प्रभारी अविनाश पांडे की शिकायत की थी. राहुल गांधी से मिलकर पायलट ने पांडे को भेदभाव करने वाला और पद के अयोग्‍य बताया था. इसके बाद अजय माकन को लाया गया, वे तब से कई मीटिंग्‍स कर चुके हैं. उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि वे नेतृत्‍व को लेकर चले आ रहे विवाद का हल करा दें. वे दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिश में जुटे हुए हैं. हालांकि विवाद आसानी से खत्‍म होता नहीं दिख रहा. राहुल ने पायलट को यह भरोसा दिया था कि उनका समय आएगा. अब पायलट के समर्थक पूछ रहे 'कब'? पायलट के लोगों को स्‍थान देने के लिए भी जल्‍द ही कैबिनेट विस्‍तार होने वाला है. वहीं पायलट, बिना पद लिए अपने आप को राज्‍य के भीतर और मजबूत करने की कोशिश में हैं.

इधर, गहलोत  अपनी मुख्‍यमंत्री की कुर्सी छोड़ना नहीं चाहते, वे उनके दिल्‍ली जाने की बातों को सिरे से खारिज कर देते हैं. हालांकि अहमद पटेल की मृत्‍यु के बाद दिल्‍ली में अनुभवी और परिपक्‍व नेता की जरूरत है. वहीं कांग्रेस में यह भी चर्चा है कि पायलट जो चाहते हैं, वह उन्‍हें सौंपें जाने से पहले यह समय शांति का है. पायलट के निकट समर्थक कह रहे हैं कि 'विद्रोह के तुरंत बाद मांगों को पूरा किया जाने लगे तो यह एक गलत परंपरा को जन्‍म देगा'. वहीं कुछ समर्थकों का कहना है कि पायलट ज्‍यादा समय तक चुप नहीं रहेंगे, उनका धैर्य खत्‍म हो रहा है. राहुल गांधी को इस मामले को तुरंत हल करना चाहिए. यदि वे अध्‍यक्ष बनते हैं तो भी वे सहयोगी जैसे रहेंगे. वहीं पायलट भी दिल्‍ली जाना नहीं चाहते, न ही राजस्‍‍थान को गहलोत  के लिए छोड़ना चाहते हैं. अब सवाल है कि राहुल गांधी क्‍या चाहते हैं? अब उन्‍होंने पार्टी चीफ का पद छोड़ा था तब उन्‍होंने पार्टी के तथाकथित 'ओल्‍ड गार्ड' पर निशाना साधा था कि 'ये लोग' उनके विचारों को तवज्‍जो नहीं देते.

हरियाणा के हालात अलग
वहीं हरियाणा में परिस्थितियां अलग हैं. भूपिंदर हुड्डा उन लोगों में शामिल थे, जिन्‍होंने सोनिया गांधी को विरोध पत्र भेजा था. इसमें कहा गया था कि पार्टी में बड़े परिवर्तन किए जाएं. इसके उलट हुड्डा का बेटा दीपेंदर अभी भी राहुल गांधी के करीबियों में शामिल है. यह बात सब जानते हैं कि हरियाणा में हुड्डा का प्रभाव है और वही हैं जो भाजपा को टक्‍कर दे सकते हैं. पिछले चुनाव में यह तय लग रहा था कि कांग्रेस और हुड्डा सरकार बना सकते हैं और इसमें दुष्‍यंत चौटाला उनकी मदद करेंगे. इसके लिए चर्चा भी हुई थी और आत्‍मविश्‍वास से भरे हुड्डा अपने समर्थकों से मिले और उन्‍हें मिठाई खिलाते नजर आ गए थे. लेकिन चौटाला, तब खट्टर के साथ चले गए. बाद में हुड्डा ने निर्णय लेने में पार्टी की सुस्‍त रफ्तार पर दोष मढ़ा था. जबकि उनके समर्थकों ने कहा था कि गांधी और हुड्डा के बीच संबंध ठीक नहीं थे.

चुनावों के दौरान राहुल गांधी ने कभी न तो हुड्डा को बुलाया और न ही राज्‍य में किए गए उनके कामकाज की तारीफ की थी. तब से स्थितियां बद्तर होती गईं और तभी हुड्डा ने विरोध पत्र पर साइन कर दिए थे. और अब रणदीप सुरजेवाला सुर्खियों में हैं तो हुड्डा और ज्‍यादा परेशान हैं. वहीं, रणदीप ने अपनी इच्‍छा से जींद उपचुनाव में चुनाव लड़ा था जो उनके लिए राजनीतिक आपदा साबित हुआ था. वे अपनी परंपरागत सीट कैथल से पहले ही हार चुके थे. लेकिन उन्‍होंने ''यस बॉस'' बोलकर राहुल गांधी के दिल में जगह बना ली. इसके बाद रणदीप ने पार्टी में अपना पद बढ़ाया. राहुल गांधी के करीबी होने से उन्‍हें कर्नाटक जैसे अहम राज्‍य का प्रभारी बनाया गया और विधान सभा चुनाव के दौरान उन्‍हें बिहार भेजा गया. लेकिन कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन पर उनकी कड़ी आलोचना हुई. सोनिया गांधी से हाल में जब तथाकथित विद्रोही नेता मिले तो उन्‍होंने कड़े शब्‍दों में कहा कि जब किसी को चुनाव प्रभारी बना कर भेजा जाता है तो परिणाम आने पर उसे जिम्‍मेदार क्‍यों नहीं ठहराया जाता? इस मीटिंग में राहुल गांधी भी मौजूद थे.

पार्टी को भुगतना होगा टकराव का खामियाजा
आने वाले चुनावों के मद्देनजर यदि कांग्रेस नेताओं के बीच टकराव की स्थिति बनती है तो पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना होगा. ऐसे में अब सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने वरिष्‍ठ नेताओं को भरोसा दिलाया है कि किसी की उपेक्षा नहीं होगी. हालांकि हुड्डा ये नहीं चाहते कि रणदीप को उनके विकल्‍प के रूप में प्रोजेक्‍ट किया जाए. पिछले चुनाव में भूपिंदर हुड्डा ने खुद को राज्‍य में पार्टी का चेहरा जाहिर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी और कहा था कि टिकट निर्णय के लिए उन्‍हें फ्री हैंड दिया जाना चाहिए.

ऐसी दबाव भरी परिस्थितियों में राहुल गांधी यदि कांग्रेस पार्टी की कमान सम्‍हालते हैं तो उन्‍हें इन दो बड़ी चुनौतियों का सामना करना ही होगा. यह सच्‍चाई है कि कांग्रेस इस योग्‍य नहीं रही कि वे लीडरशिप की दूसरी पीढ़ी तैयार कर सके. राहुल गांधी ने युवक कांग्रेस के चुनावों के जरिए कोशिश की थी, लेकिन वे सफल नहीं हो पाए थे. उन्‍हें पार्टी के सीनियर्स को तब तक अपने साथ रखना होगा जब तक नया समूह अपनी जिम्‍मेदारी लेने के लिए तैयार न हो जाए. यही उनके लिए सबसे बड़ी दुविधा है. कई लोग मानते हैं कि शायद यही कारण है कि राहुल गांधी अध्‍यक्ष पद लेने के लिए हिचक रहे हैं.
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