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Explained : शादी-ब्याह को लेकर नए कानून पर सवालों में घिरी राजस्थान सरकार, जानें क्यों बरपा हंगामा

गहलोत ने कहा कि सरकार का संकल्प है कि राजस्थान में किसी कीमत पर बाल विवाह न हो.

गहलोत ने कहा कि सरकार का संकल्प है कि राजस्थान में किसी कीमत पर बाल विवाह न हो.

Rajasthan Govt. Bill on Marriage: राजस्थान अनिवार्य विवाह पंजीकरण (संशोधन) विधेयक 2021 के तहत राजस्थान अनिवार्य पंजीकरण विधेयक 2009 की धारा 8 में सुधार किया गया था जो ज्ञापन सौंपने के कर्तव्य की बात करता है, इस कानून के मुताबिक ज्ञापन का मतलब विवाह के पंजीकरण के लिए ज्ञापन देने से है.

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    जयपुर. पिछले महीने राजस्थान विधानसभा (Rajasthan Assembly) में एक बिल पारित हुआ, इस बिल ने राजस्थान का राजनीतिक जमीन को गर्मा दिया है और बैठे बिठाए विपक्ष को एक मुद्दा दे दिया है. ये बिल 2009 के शादी के पंजीकरण की अनिवार्यता पर 2009 में बने कानून में सुधार लाने के लिए पारित किया गया है, खास बात ये है कि इसमें बालविवाह को भी शामिल किया गया है, जिसने इस कानून को विवादों की रेत पर लाकर खड़ा कर दिया है. अब इस रेत में धंसने से बचने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) ने कहा है कि वो राज्यपाल से दरख्वास्त करेंगे की बिल को सरकार को वापस भेज दिया जाए, हम इसकी कानून विभाग से जांच करवाएंगे और उसके बाद किसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि कानून को अमली जामा पहनाया जाए या नहीं.

    भाजपा के विरोध को बीच में इस बिल को पारित कर दिया गया था. वहीं कई सामाजिक संगठनों, महिला संगठनों औऱ राष्ट्रीय बाल संरक्षण अधिकार आयोग के विरोध गहलोत को इस बिल को वापस लेने के लिए बोला है क्योंकि इस बिल के आधार पर बाल विवाह को वैधता मिल जाएगी. इस विषय को लेकर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी दाखिल की गई है.

    क्या संशोधन हुआ
    राजस्थान अनिवार्य विवाह पंजीकरण (संशोधन) विधेयक 2021 के तहत राजस्थान अनिवार्य पंजीकरण विधेयक 2009 की धारा 8 में सुधार किया गया था जो ज्ञापन सौंपने के कर्तव्य की बात करता है, इस कानून के मुताबिक ज्ञापन का मतलब विवाह के पंजीकरण के लिए ज्ञापन देने से है.

    संशोधन से पहले धारा 8 कहती थी – पार्टी और इस मामले में ऐसी पार्टी जिसने 21 साल की उम्र पूरी नहीं की है, ऐसी स्थिति में पार्टी के माता-पिता या पालक पर, जहां पार्टी रहती है वहां, या जहां पर रजिस्ट्रार ने शादी की प्रक्रिया पूरी करवाई है वहां पर विवाह की तारीख से 30 दिन के भीतर ज्ञापन सौंपने की जिम्मेदारी होगी. (2) अगर समय सीमा के अंदर ज्ञापन नहीं सौंपा जाता है तो धारा के उप धारा (1) के तहत वो किसी भी वक्त नियत जुर्माने के भुगतान के साथ ज्ञापन सौंप सकता है.

    संशोधन के बाद धारा 8 में उम्र से जुड़ा जो अहम बदलाव होता है उसके बाद ये कानून कहता है – शादी करने वाली पार्टी या इस मामले में वर 21 साल की और वधु 18 साल की उम्र पूरी नहीं करती है, तो ऐसी स्थिति में माता-पिता, या पार्टी के पालक पर ज्ञापन देने की जिम्मेदारी होगी, ये ज्ञापन 30 दिनों के भीतर जहां शादी संपन्न हुई वहां के रजिस्ट्रार के कानूनी अधिकार क्षेत्र में या जहां पर पार्टी रहती है वहां पर सौंपना होगा. उपधारा 2 का संशोधन योग्य पार्टी को ज्ञापन सौंपने की अनुमति देता है-भले ही किसी एक या दोनों की मौत ही क्यों ना हो गई है.

    ये संशोधन हुआ क्यों
    राज्य सरकार ने इस संशोधन को तकनीकी करार दिया है, उनका तर्क है कि ये कानून उम्र को केंद्रीय कानून के अनुरूप लाएगा, जिसके अनुसार शादी के लिए लड़की की उम्र 18 और लड़के की उम्र 21 होनी चाहिए. सरकार का मानना है कि विवाह के बाल विवाह के पंजीकरण से उन्हें तेजी से रद्द करने में मदद मिलेगी और सरकार पीड़ितों खासकर विधवाओं तक आसानी से पहुंच पाएंगे.

    फिर आलोचना क्यों
    आलोचकों का कहना है कि बालविवाह अनिवार्य पंजीकरण उसे वैध बनाएगा. इसके विरोध में ये तर्क भी दिया जा रहा है कि सरकार के दावे के उलट विवाह प्रमाणपत्र अदालत में विवाह के रद्द करने को लेकर बाधा बन सकता है. आमतौर पर बालविवाह सार्वजनिक चकाचौंध से दूर होता है और इसे साबित करना बेहद मुश्किल होता है. यहां तक कि संशोधन से पहले भी, धारा 8 के तहत बाल विवाह का पंजीकरण अनिवार्य था.

    बाल विवाह पंजीकृत कैसे हो सकता है
    दरअसल, बालविवाह गैरकानूनी है ही नहीं, हालांकि इसे रोकने के लिए कानूनी ढांचा तैयार किया गया है. बालविवाह निषेध अधिनियम के अनुसार बालविवाह उस सूरत में रद्द हो सकता है अगर दुल्हा या दुल्हन वयस्क होने पर इस विवाह को मानने से इंकार कर देते हैं. यानी इससे उन्हें ये विकल्प मिलता है कि वो इस शादी से उसी तरह कदम वापस खींच सकते हैं जैसे वो कभी हुई ही नहीं थी.

    इसके उलट अगर पार्टी को लगता है कि वो विवाह कायम रखना चाहते हैं तो ये विवाह वैध करार दिया जाता है. य नाबालिग लड़कियों को उनके वैवाहिक घर, संपत्ति और दूसरे कानूनी अधिकार सुनिश्चत कराने के लिए दिया गया एक कवच है. कुछ निश्चित हालातों में बाल विवाह खुद ब खुद रद्द करार दिया जाता है मसलन किसी नाबालिग बच्चे को जबरदस्ती, या उसका अपहरण करके या मानव तस्करी के उद्देश्य से उसकी विवाह किया गया हो.

    फिर कानून किस तरह से बाल विवाह को रोकने में सक्षम होगा
    बालविवाह निषेध अधिनियम की धारा 9 के तहत, वयस्क पुरुष अगर किसी नाबालिग लड़की से विवाह करता है तो उसे 2 साल तक की सजा ऱ 1 लाख रू जुर्माना हो सकता है. धारा 10 के तहत – जो कोई भी बाल विवाह करता है या करवाता है, या इसे करने के लिए प्रेरित करता है, उसे सश्रम कारावास की सजा हो सकती है जिसे दो साल तक बढ़ाया जा सका है, साथ ही जुर्माना भी देना होगा जिसे 1 लाख रु तक बढ़ाया जा सकता है. इससे बचने के लिए से ये साबित करना होगा कि विवाह के दौरान वो इस बात से अंजान था कि यह एक बाल विवाह है. इसके तहत पुलिस को दुल्हे, उसके पालक जो बालविवाह करा रहे हैं और वो सभी जो इस विवाह को संपन्न करने में भागीदारी निभा रहे हैं उन्हें हिरासत में लेने का अधिकार होता है.

    इंडिपेंडेत थॉट बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2017) के मामले में सर्वोच्च न्यायलय ने बाल विवाह के लिए वैवाहिक बलात्कार के संरक्षण का विस्तार करने से इंकार कर दिया था. न्यायालय का कहना था कि नाबालिग के साथ शारीरिक संबंध किसी भी सूरत में बलात्कार की श्रेणी में ही आते हैं. जहां वैवाहिक बलात्कार में कानून के तहत दंड का प्रावधान नहीं है, वहीं नाबालिक के साथ संसर्ग बलात्कार की श्रेणी में आता है.

    क्या पंजीकरण विवाह को वैध बनाता है.
    सीमा बनाम अश्विनी कुमार (2006) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि विवाह का पंजीकरण अनिवार्य होना चाहिए. कर्नाटक और उत्तराखंड राज्यों में भी इसी तरह का प्रावधान है, वहां विवाह का पंजीकरण करके बाल विवाह का रिकॉर्ड तैयार किया जाता है. 2019 में केरल उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि बाल विवाह को पंजीकृत करने के लिए कानून में कोई रोक नहीं है.

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