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30 साल पहले पिता और भाई की हत्या के बाद इस परिवार में छोड़ी थी घाटी, आज भी वापसी का इंतजार

News18Hindi
Updated: January 19, 2020, 7:35 PM IST
30 साल पहले पिता और भाई की हत्या के बाद इस परिवार में छोड़ी थी घाटी, आज भी वापसी का इंतजार
30 साल पहले जो कुछ हुआ राजेंद्र कौल उसको आज तक नहीं भुला सके

राजेंद्र कौल प्रेमी को 28 अप्रैल 1990 की वो खूनी रात आज भी याद है जब मिलिटेंट रात के 9:00 बजे उनके घर में दाखिल हुए और रात के 3:00 बजे उनके भाई वीरेंद्र कौल प्रेमी और उनके वालिद सर्वानंद कौल प्रेमी दोनों को साथ लेकर गए और 1 मई को उनकी लाशें पुलिस घर लेकर आई.

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  • Last Updated: January 19, 2020, 7:35 PM IST
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(ख़ुर्रम अली शहज़ाद)

कश्मीरी पंडितों के वादी से से विस्थापन की त्रासदी को 30 साल पूरे हो रहे हैं. इन 30 सालों में कश्मीरी पंडित वह दर्दनाक वक्त और खूनी माहौल कभी नहीं भूल सके हैं. पिछले 30 सालों में सरकारें आई गई कई प्रधानमंत्री आए वादे हुए लेकिन आज तक वादी में वापसी का वादा पूरा नहीं हो सका. आज भी लाखों हजारों कश्मीरी पंडितों को इन वादों के पूरा होने और अपने घर लौटने का इंतजार है. इन कश्मीरी पंडितों में से हर एक के पास दर्दनाक कहानी है. इनमें एक अज़ीम सानिहा , एक दर्दनाक कहानी सर्वानंद कौल प्रेमी व राजेंद्र कौल प्रेमी खानदान की भी है, इस खानदान ने अपने मुखिया सर्वानंद कौल प्रेमी और वीरेंद्र कौल प्रेमी की शहादत का दुख झेला है.

राजेंद्र कौल प्रेमी और उनका खानदान पिछले 30 सालों से दिल्ली में रह रहा है वह खुद दिल्ली के सरिता विहार में डीडीए फ्लैट में रहते हैं. 30 साल पहले जो कुछ हुआ उसको वह आज तक नहीं भुला सके. 30 साल पहले अनंतनाग जिले के सूफ़ शाली कोकरनाग के कस्बे में उनका खानदान अकेला दो लाख मुस्लिम लोगों के बीच रहता था. वालिद सर्वानंद कॉल प्रेमी कोकरनाग हाई स्कूल के हेडमास्टर थे.

धमकी के बाद भी नहीं छोड़ा था कस्बा

मकामी लोगों के साथ भाईचारा और यकीन की बात थी कि उनके खानदान ने 19 जनवरी 1990 को आतंकवादियों द्वारा वादी खाली कर देने की धमकी और फ़रमान के बावजूद अपना कस्बा नहीं छोड़ा था. राजेंद्र कौल प्रेमी को 28 अप्रैल 1990 की वो खूनी रात आज भी याद है जब मिलिटेंट रात के 9:00 बजे उनके घर में दाखिल हुए और रात के 3:00 बजे उनके भाई वीरेंद्र कौल प्रेमी और उनके वालिद सर्वानंद कौल प्रेमी दोनों को साथ लेकर गए और 1 मई को उनकी लाशें पुलिस घर लेकर आई. राजेंदर कहते हैं उस दिन विश्वास और भाईचारे के तमाम पुल बह गए, और जो भी बचे हुए कश्मीरी पंडित थे उन्होंने वादी छोड़ दी.



राजेंद्र कौल बताते हैं उनके वालिद सर्वानंद कौल और उनके खानदान की क्षेत्र में बहुत ज्यादा इज्जत थी. क्षेत्रीय लोग मुसलमान खुद कहते थे वह उनका बाल-बांका नहीं होने देंगे. लेकिन 1 मई को वालिद सर्वानंद कौल और छोटे भाई वीरेंद्र की शहादत के बाद उन्होंने 5 मई को आखिरी रस्मों की अदायगी के बाद वादी को छोड़ दिया. राजेंदर बताते हैं 28 अप्रैल की रात जो हुआ वह उन्हें आज भी याद है, 1 मई को पुलिस के आने का मंजर वह कभी भुला नहीं सकते.गीता और रामायण का कई भाषाओं में तर्जुमा कर चुके थे पिता
राजेंद्र कौल बताते हैं उनके वालिद सर्वानंद कौल प्रेमी 3 दर्जन से ज्यादा किताबों के लेखक थे जिनमें श्रीमद्भगवद्गीता गीता का कश्मीरी ट्रांसलेशन और उर्दू ट्रांसलेशन शामिल हैं. इसी तरह रामायण का कश्मीरी ट्रांसलेशन भी शामिल है. वह बताते हैं उनके घर में 21000 किताबें थीं जिन को जला दिया गया या लूट लिया गया, यही नहीं उनका घर भी जला दिया गया. राजेंद्र कहते हैं, कश्मीर से जब वो निकले उनकी दो बेटियां, बीवी और तीन गैर शादीशुदा बहनें थीं. उन्होंने कहा- काफी बुरा वक्त देखा, 10 दिन जम्मू में रहे. फिर दिल्ली आ गए जहां उनके छोटे भाई पहले से आकाशवाणी में नौकरी करते थे. राजेंद्र कहते हैं कि सरकारों से सिर्फ वादे मिले, उम्मीदें बंधाई गईं, लेकिन आज तक कोई मुआवजा नहीं मिला. न ही उनके वालिद के कत्ल के केस में कुछ हुआ. उनके पिता के कत्ल के केस को को अनट्रेसेबल बताकर बंद कर दिया गया.



राजेंद्र बताते हैं कश्मीर की याद आज भी बहुत आती है. 1 मई और 5 मई को घर का माहौल बहुत गमगीन होता है. उनके भाई दिल्ली में पहले से ही आकाशवाणी में थे जिससे थोड़ा सहारा मिला अब उनके परिवार में नई नस्लें पैदा हो चुकी हैं. उन्होंने कश्मीर नहीं देखा लेकिन वह खुद और नई नस्लें सब वापस वहां जाना चाहते हैं. राजेंद्र कहते हैं जहां पर वह खेले कूदे, जहां गुल्ली-डंडा, कबड्डी जैसे खेल खेले, जहां उनका स्कूल था वह वहां लौटना चाहते हैं.

सरकार से आज भी है आस
राजेंद्र कहते हैं कश्मीर छोड़ने के बाद दिल्ली आकर वह समाज के लिए काम करने लगे. अभी वह यही काम करते हैं. मानव अधिकार आयोग हो या फिर सरकार के दरवाजे हों, हर जगह जाते हैं. राजेंद्र बताते हैं कि मानव अधिकार आयोग ने उनके केस को लिया था, कश्मीर राज्य मानव अधिकार आयोग में भी उनका मामला गया, ऑर्डर पास हुआ, लेकिन कुछ नहीं हुआ. उनकी जमीनों पर माफिया का कब्जा हो चुका है और वहां घर बना लिए गए हैं

राजेंद्र प्रेमी जिस ड्राइंग रूम में बैठे हैं यह फ्लैट उन्होंने 1997 में खरीदा था. सरकारों से उन्हें वादे उम्मीदों के सिवा कुछ नहीं मिला. मौजूदा सरकार और आर्टिकल 370 हटने के बाद के बदले हालात से कुछ उम्मीद जरूर बंधी है कि वो अपने कश्मीर, अपनी माटी में लौट सकेंगे. आज भी कौल खानदान और लाखों कश्मीरी पंडितों को सरकारों के वादों के वफा होने का इंतजार है.

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First published: January 19, 2020, 7:34 PM IST
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