ऐसे तो मंजूर नहीं होगा तीन तलाक पर बना कानून

नासिर हुसैन
Updated: August 10, 2018, 12:26 PM IST
ऐसे तो मंजूर नहीं होगा तीन तलाक पर बना कानून
(सांकेतिक तस्वीर)

पहले भी ये बिल राज्यसभा में रखा गया था. लेकिन समर्थन न मिलने के चलते ये पास नहीं हो पाया था. उस दौरान बिल में संशोधन की मांग की गई थी.

  • Last Updated: August 10, 2018, 12:26 PM IST
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तीन तलाक पर संशोधित बिल कैबिनेट में पास हो चुका है. बिल आज राज्यसभा में रखा जाएगा. लोकसभा में पास होने के बाद एक बार पहले भी ये बिल राज्यसभा में रखा गया था. लेकिन समर्थन न मिलने के चलते ये पास नहीं हो पाया था. उस दौरान बिल में संशोधन की मांग की गई थी. उसी मांग को पूरा करते हुए अब संशोधित बिल राज्यसभा में रखा जा रहा है.

आइए पहले जानते हैं कि वो तीन आपत्तियां कौन सी हैं जिन्हें दूर करके संशोधित बिल लाया गया है.

मुकद्मे में जमानत- बिल में संशोधन के अनुसार अब तीन तलाक के आरोपी पति को जमानत मिल सकती है. जबकि मूल विधेयक में यह गैर-जमानती अपराध था. अब मजिस्ट्रेट जमानत दे सकता है.

हर कोई नहीं करा सकेगा एफआईआर- मूल विधेयक में किसी पड़ोसी को भी तीन तलाक के मामले में आरोपी के खिलाफ पुलिस में शिकायत करने का अधिकार था. लेकिन अब एफआईआर कराने का अधिकार पत्नी या उसके रक्त संबंधी रिश्तेदारों तक सीमित कर दिया गया है.

समझौते के प्रयास- तीसरे संशोधन के तहत तीन तलाक मामले में आपराधिक प्रक्रिया शुरू करने के पहले समझौता का विकल्प खोला गया है. जबकि पहले ऐसा नहीं था. इसके तहत यदि पति-पत्नी दोनों चाहे तो मजिस्ट्रेट के सामने आपसी समझौते से तीन तलाक को खत्म करने का समझौता कर सकते हैं. समझौते के बाद आपराधिक कार्रवाई नहीं होगी.

लेकिन इस बारे में लखनऊ के रहने वाले इंजीनियर अंसार कहते हैं कि अगर सरकार चाहती है कि तीन तलाक के मामले में कानूनी कार्रवाई शुरु होने से पहले पति-पत्नी के बीच सुलह हो जाए तो पहले पति के खिलाफ मुकद्मा न लिखा जाए. क्योंकि एक बार जब मुकद्दा लिख दिया जाता है और पुलिस की कार्रवाई हो जाती है तो समझौते की गुंजाइश कम हो जाती है.

वहीं मेरठ निवासी मौलाना सलीम अख्तर बताते हैं कि पति और उसके घर वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का अधिकार बिना दूसरे पक्ष की बात सुने लड़की सहित उसके घर वालो को देना गलत है. दूसरा पक्ष जानने के बाद ही एफआईआर दर्ज करने का निर्णय लिया जाए.
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दूसरी ओर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्वालय के शमीम अहमद का कहना है कि अगर कानून के तहत समझौत का अधिकार मजिस्ट्रेट को दे दिया जाए तो ज्यादा अच्छा होगा. मजिस्ट्रेट के सामने समझौता होने की उम्मीद ज्यादा रहेगी. अगर इसके बाद आपको लगता है कि समझौता नहीं हो पा रहा है तो फिर एफआईआर दर्ज की जा सकती है.

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First published: August 10, 2018, 12:26 PM IST
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