बीजेपी ने कांग्रेस से कब और कैसे 'झटका' मंदिर और हिंदुत्व का मुद्दा?

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: January 4, 2019, 2:48 PM IST
बीजेपी ने कांग्रेस से कब और कैसे 'झटका' मंदिर और हिंदुत्व का मुद्दा?
अयोध्या में मंदिर-मस्जिद की जंग (file photo)

जानकार बताते हैं कि कैसे 1984 से 1990 के बीच बीजेपी ने कांग्रेस से मंदिर और हिंदुत्व का मसला हाइजैक किया और इसे राजनीतिक रूप दे दिया.

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  • 1948 का फैजाबाद विधानसभा उपचुनाव कांग्रेस ने हिंदुत्व के मुद्दे पर जीता. सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी आचार्य नरेंद्र देव को बाबा राघव दास नामक साधु ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर हरा दिया.

  • विवादित स्थल में 23 दिसंबर 1949 को जब रामलला की मूर्तियां रखी गईं उस वक्त कांग्रेस सरकार थी.

  • एक फरवरी 1986 को एक अहम फैसले के तहत स्थानीय कोर्ट ने विवादित स्थल पर हिंदुओं को पूजा की इजाजत दे दी और ताले दोबारा खोले गए तब कांग्रेस सत्ता में थी.


  • जब 9 नवंबर 1989 को विवादित स्थल के पास ही राम मंदिर निर्माण का शिलान्यास हुआ तब राजीव गांधी की सरकार थी.

  • राम मंदिर की आधारशिला रखे जाने के बाद राजीव गांधी ने अयोध्या से ही अपने चुनाव अभियान की शुरुआत की और देश में ‘रामराज्य’ लाने का वादा किया.


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इसके बावजूद हिंदुत्व और राम मंदिर का मुद्दा कांग्रेस के हाथ से बीजेपी ने कैसे छीन लिया? यह एक दिलचस्प सवाल है जिसका जवाब भी उतना दिलचस्प है.

पीछे मुड़कर देखें तो बीजेपी से पहले कांग्रेस का ही एक धड़ा हिंदुत्व का बड़ा समर्थक था. अयोध्या में रह रहे वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह के मुताबिक 1984 के आसपास राम मंदिर के साथ हिंदुत्व का मुद्दा कांग्रेस से  बीजेपी ने छीनना शुरू किया. इस समय चुनावी पिच पर हिंदुत्व की गाड़ी दौड़ रही है जिसकी वजह से कांग्रेस भी फिर से सॉफ्ट हिदुत्व की ओर लौट रही है. (ये भी पढ़ें: मैं अयोध्या)

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अयोध्या मामले के जानकारों के मुताबिक, साल 1984 की बात है. अप्रैल के पहले सप्ताह में विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) नेता अशोक सिंघल ने दिल्ली के विज्ञान भवन में धर्म संसद का आह्वान किया. लगभग 500 साधु-संतों ने इसमें हिस्सा लिया. इसमें ही पहली बार हिंदू धर्म की रक्षा और प्रचार-प्रसार के लिए राम मंदिर निर्माण का लक्ष्य तय किया गया.

सितंबर 1984 में परिषद ने सरयू किनारे धर्म संसद का आयोजन किया. वीएचपी कार्यकर्ताओं ने यह वचन लिया कि वो देश भर से हिंदुओं को जुटाकर राम मंदिर बनाएंगे. उन्होंने इसी साल 31 अक्टूबर को मंदिर निर्माण की नींव रखने की योजना तैयार कर रखी थी, लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या के बाद यह रणनीति आई-गई हो गई.

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साल 1984 के दिसंबर महीने में राजीव गांधी ने आम चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली. अप्रैल 1980 में बनी भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव में दो सीटों के साथ खाता खोल लिया जबकि कांग्रेस ने 533 में से 404 सीटों पर कब्जा किया था.

इस बीच 23 अप्रैल 1985 को सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला आया. यह फैसला था 62 वर्षीय एक मुस्लिम महिला शाहबानो को तलाक के बाद गुजारा भत्ता देने का. तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने पहले इस फैसले का स्वागत किया, लेकिन बाद में इस पर मुस्लिमों के रुख को देखते हुए मई 1986 में ही उन्हें झुकना पड़ा. मुसलमानों के दबाव में उनकी सरकार ने मुस्लिम महिला एक्ट 1986 पास कर दिया जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्क्रिय करने के लिए था.

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यह बीजेपी और दक्षिणपंथी संगठनों के लिए कांग्रेस को घेरने का अवसर था. हुआ भी ऐसा ही. बीजेपी और हिंदू संगठनों ने कांग्रेस सरकार की इस ‘तुष्टिकरण राजनीति’ की आलोचना शुरू कर दी.

जून 1989 में हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी हुई, जिसमें पार्टी ने पहली बार राम मंदिर बनाने का प्रस्ताव पारित किया. इसे रामजन्म भूमि आंदोलन का नाम दिया गया. इस संकल्प को बीजेपी ने पूरी ताकत से आगे बढ़ाया. इसे एक धार्मिक मुहिम बनाकर राजनीतिक रूप दे दिया गया.

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शाहबानो केस से एक तरफ कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लग रहे थे तो दूसरी ओर राम मंदिर को लेकर लगातार बन रहे राजनीतिक दवाब के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी नहीं चाहते थे कि उनकी हिंदू विरोधी छवि बने. ऐसे में सरकार ने बीच का रास्ता निकाला और विवादित स्थल के पास ही 9 नवंबर 1989 को मंदिर का शिलान्यास करा दिया गया. वीएचपी ये दावा कर रही थी कि शिलान्यास उसी जगह पर हुआ है जहां के लिए उसने एलान किया था.

सियासी जानकार बताते हैं कि तत्कालीन पीएम राजीव गांधी और यूपी के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की समझ यह थी कि शिलान्यास से हिंदू तो खुश होकर कांग्रेस के खेमे में आ ही जाएंगे, ‘निर्माण’ रोक देने से मुसलमान भी संतुष्ट ही रहेंगे. इस संतुलन से कांग्रेस के दोनों हाथों में लड्डू होंगे. तब शाहबानो के बावजूद चुनाव जीतने में दिक्कत नहीं होगी. लेकिन, राजीव गांधी का राम मंदिर और हिंदू प्रेम का दांव उल्टा पड़ गया. आडवाणी जैसे नेताओं के साथ बीजेपी पूरे मंदिर आंदोलन को अपनी राजनीतिक धारा में ले चुकी थी.

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राजीव गांधी सरकार ने मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास तो करा दिया, लेकिन 1989 के आम चुनाव में ये मुद्दा धार्मिक के साथ-साथ राजनीतिक भी हो गया. क्योंकि विश्व हिंदू परिषद तो दबाव बना ही रही थी, साथ ही पालमपुर में मंदिर का प्रस्ताव पास करने के बाद इसमें बीजेपी भी कूद चुकी थी.

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक राजीव गांधी की कुछ सियासी गलतियों की वजह से बीजेपी ने अयोध्या आंदोलन को पूरी तरह से हाईजैक कर लिया. जून 1989 में बीजेपी ने वीएचपी को औपचारिक समर्थन देना शुरू किया. इससे मंदिर आंदोलन को तो नया जीवन मिला ही, मंदिर आंदोलन ने बीजेपी को भी बड़ा सहारा दिया.

1984 में सिर्फ 2 लोकसभा सीटों वाली पार्टी मंदिर मुद्दे पर अपने रुख से हिंदू वोटबैंक को अपनी ओर करने में कुछ हद तक कामयाब रही. उसे 1989 में 85 सीटें मिलीं. फिर इसे और धार देने के लिए लालकृष्ण आडवाणी ने रथ-यात्रा की शुरुआत की.

चुनाव के परिणामों में राजीव गांधी की सरकार सत्ता से बाहर हो गई और बीजेपी के गठबंधन से विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के प्रधानमंत्री बन गए. सत्ता में बदलाव के बाद राम मंदिर आंदोलन धीरे-धीरे विश्व हिंदू परिषद के हाथ से निकल कर भारतीय जनता पार्टी के हाथ में आ गया.

राम मंदिर आंदोलन के बहाने हुए हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के बाद बीजेपी और उसके तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी इस मुद्दे को किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते थे. आडवाणी ने संतों के इस आंदोलन को बीजेपी का आंदोलन बताते हुए 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ से राम रथयात्रा शुरू की. अयोध्या पहुंचकर वह राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण शुरू कराना चाहते थे.

अब, मंदिर आधिकारिक तौर पर अब चुनावी मुद्दा हो गया. दूसरी ओर संत भी इस आंदोलन को छोड़ना नहीं चाहते थे. योजना थी कि आडवाणी का रथ 30 अक्टूबर 1990 को (देवोत्थान एकादशी पर) अयोध्या में उसी दिन प्रवेश करे, जिस दिन विश्व हिंदू परिषद ने कारसेवा का एलान किया था. कारसेवा की यह तारीख 24 मई 1990 को हरिद्वार में हुए हिंदू सम्मेलन में संतों ने तय की थी. रथयात्रा के बाद 1991 में हुए आम चुनाव में बीजेपी की सीटें 85 से बढ़कर 120 सीट हो गईं.

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‘24 अकबर रोड’ नामक किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई के मुताबिक “कांग्रेस में हमेशा से एक धड़ा हिंदुत्ववादी और दूसरा मार्क्सवादी, समाजवादी सोच का रहा है. हिंदुत्ववादी सोच के नेताओं में गोविंदबल्लभ पंत और पुरुषोत्तम दास टंडन प्रमुख थे, जो आस्था के प्रखर समर्थक थे. आचार्य नरेंद्र देव के विचार उनसे मेल नहीं खाते थे तो वे अलग हो गए. हालांकि कांग्रेस का हिंदुत्व भाजपा के हिंदुत्व से अलग था.”

किदवई के मुताबिक “इंदिरा गांधी तो दोनों सोच के नेताओं को बैलेंस करके चलती थीं. लेकिन सोनिया गांधी तक आते-आते कांग्रेस का चेहरा बिल्कुल हिंदू विरोधी के तौर पर उभरा. इसमें परिस्थितियां भी जिम्मेदार थीं. बीजेपी ने इसे भुनाया और खुद को सबसे बड़े हिंदू हितैषी पार्टी के रूप में खड़ा किया.”

जब मंदिर बनाने को कांग्रेस लाई अध्यादेश, बीजेपी ने किया विरोध

जनवरी, 1993 में कांग्रेस राम मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश लाई थी और बीजेपी ने इसका विरोध किया था. उस वक्त पीवी नरसिम्हाराव देश के प्रधानमंत्री थे. 7 जनवरी, 1993 को राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने भी इसे मंजूरी दे दी थी. बाद में एक तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने इस बिल को मंजूरी के लिए लोकसभा के सामने रखा था. पास होने के बाद इसे अयोध्या अधिनियम कहा गया था. बिल को पेश करते हुए तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने कहा था, "देश के लोगों में सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की भावना बनाए रखना जरूरी है.

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नरसिम्हा राव सरकार इस अधिनियम के जरिए 2.77 एकड़ की विवादित भूमि ही नहीं बल्कि इसके चारों ओर की 60.70 एकड़ जमीन भी अधिग्रहीत कर रही थी. इस पर कांग्रेस सरकार राम मंदिर, एक मस्जिद, म्यूजियम और अन्य सुविधाओं का निर्माण करना चाहती थी. बीजेपी ने उस वक्त प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव का खुलकर विरोध किया था. तत्कालीन बीजेपी उपाध्यक्ष एसएस भंडारी ने इस कानून को पक्षपातपूर्ण, तुच्छ और प्रतिकूल बताते हुए खारिज कर दिया था. बीजेपी के साथ मुस्लिम संगठनों ने भी इस कानून का विरोध किया था.

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First published: January 4, 2019, 10:39 AM IST
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