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  • <font color=red>Exclusive:</font> ‘साहब! हर कोई यही क्यों पूछता है कि तुम इस धंधे में क्यों आईं?’

<font color=red>Exclusive:</font> ‘साहब! हर कोई यही क्यों पूछता है कि तुम इस धंधे में क्यों आईं?’

जी हां, दिल्ली के सबसे बड़े रेडलाइट एरिया जीबी रोड की यही बदकिस्मती है। ऐसी बदकिस्मती जिसने जीबी रोड को दिल्ली-एनसीआर ही नहीं तकरीबन पूरे उत्तर भारत में जिस्मफरोशी के बदनाम अड्डे की पहचान दिलाई है।

जी हां, दिल्ली के सबसे बड़े रेडलाइट एरिया जीबी रोड की यही बदकिस्मती है। ऐसी बदकिस्मती जिसने जीबी रोड को दिल्ली-एनसीआर ही नहीं तकरीबन पूरे उत्तर भारत में जिस्मफरोशी के बदनाम अड्डे की पहचान दिलाई है।

जी हां, दिल्ली के सबसे बड़े रेडलाइट एरिया जीबी रोड की यही बदकिस्मती है। ऐसी बदकिस्मती जिसने जीबी रोड को दिल्ली-एनसीआर ही नहीं तकरीबन पूरे उत्तर भारत में जिस्मफरोशी के बदनाम अड्डे की पहचान दिलाई है।

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नई दिल्ली।  अगर आपसे कोई पूछे कि दिल्ली में गारस्टिन बास्टिन रोड कहां है तो शायद ही आप कुछ बता पाएं लेकिन अगर इसी रोड के बारे में यही सवाल इसका संक्षिप्त नाम यानी जीबी रोड लेकर पूछा जाए तो हो सकता है कि आप पूछने वाले को एक हिकारत भरी नजर से देखें या फिर मुंह बिदका लें या ये भी हो सकता है कि ये सवाल सुनकर जवाब देने की बजाय आपके चेहरे पर अजीब सी शरारतपूर्ण मुस्कान नजर आने लगे।

जी हां, दिल्ली के सबसे बड़े रेडलाइट एरिया जीबी रोड की यही बदकिस्मती है। ऐसी बदकिस्मती जिसने जीबी रोड को दिल्ली-एनसीआर ही नहीं तकरीबन पूरे उत्तर भारत में जिस्मफरोशी के बदनाम अड्डे की पहचान दिलाई है। इस पहचान के आगे यहां काम कर रही सैकड़ों-हजारों महिलाओं की बेबसी, दर्द, मजबूरी और हालात के सवाल फीके लगते हैं और हमेशा अनसुने रह जाते हैं। खुद इन महिलाओं ने भी इस हकीकत के साथ जीना सीख लिया है, तभी तो जब कोई उनसे पूछता है कि इस धंधे में क्यों आईं, तो उनका जवाब होता है ‘टाइम क्यों खोटी कर रहे हो साहब?’

जीबी रोड को इसकी बदनामी से निजात दिलाने की एक अटपटी सी कोशिश 1965 में हुई थी, जब इसका नाम बदलकर स्वामी श्रद्धानंद मार्ग कर दिया गया लेकिन इसका परिणाम वही हुआ जो इस तरह की कोशिशों का अक्सर होता आया है, ये नाम सरकारी फाइलों और दस्तावेजों के अलावा कहीं नजर नहीं आता। बदलाव के नाम पर दशकों में अगर यहां कोई परिवर्तन आया है तो वो ये कि एक समय उत्तर भारत में इस धंधे का केंद्र रहा ये इलाका, आज जगह-जगह खुल चुके मसाज पार्लर, एस्कॉर्ट और डेटिंग सेवाओं के दौर में महज निचले तबके के पुरुषों की सेक्स कुंठाएं दूर करने के काम आता है।

एक अनुमान के मुताबिक जीबी रोड पर जिस्मफरोशी के सहारे जीवन गुजार रही महिलाओं की संख्या 4 से 5 हजार तक है। इनमें से अधिकतर पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र, बिहार और यूपी से यहां लाई गई हैं। भारत के बाद सबसे ज्यादा नेपाल की महिलाएं यहां सक्रिय हैं। जीबी रोड से गुजरने वाले ग्राहकों के लिए सड़क के दोनों ओर इमारतों की खिड़कियों से झांकती सजी-धजी लड़कियां शोकेस में रखे माल की तरह हैं तो नीचे घूमते उनके दलाल चलते-फिरते रेट कार्ड की तरह जिन्हें हर लड़की की उम्र, रंग, शारीरिक बनावट से लेकर घंटे के हिसाब से कीमत तक रटी हुई है।

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आईबीएनखबर के इस संवाददाता ने यहां देह व्यापार में लिप्त कुछ महिलाओं से बात की। एक महिला जोसेफ (परिवर्तित नाम) कहती हैं कि मैं 2003 में यहां आई थी और पिछले 11 साल में अगर कुछ बदला है तो उम्र के साथ आए ग्राहकों की संख्या में आई कमी। जोसेफ ठीक तरह से हिंदी नहीं बोल पाती लेकिन उनका कहना है कि इस बात से भी बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, यहां संवाद के लिए किसी भाषा की जरूरत नहीं है। जोसेफ कहती हैं कि पेड सेक्स के लिए इच्छा जाहिर करना या उसके लिए पैसे देने या लेने के काम में कुछ बुरा नहीं है क्योंकि इस दौरान कोई जबरदस्ती, हिंसा या डराने-धमकाने का मामला नहीं बनता है। वो कहती हैं कि अब मुझे इस जिंदगी की आदत हो चली है और उसके अधिकतर ग्राहक वफादार भी हैं। इस सवाल के जबाव में कि क्या उसे अजनबियों से डील करना अजीब नहीं लगता? वह कहती हैं कि देखिए हम लोग एक स्थापित नेटवर्क के जरिये काम करते हैं जो बिना किसी रुकावट के धंधे में मददगार है।

ऐसी ही एक अन्य महिला रिया (परिवर्तित नाम) यहां 7 साल से हैं और अब किसी बदलाव का इंतजार नहीं कर रही हैं। उनके लिए पिछले 7 साल में यहां कुछ नहीं बदला है। इस सवाल पर कि वो इस धंधे में क्यों आई? रिया चिढ़ते हुई कहती हैं कि जो भी यहां पहली बार आता है वो अपना 5 मिनट इसी फालतू सवाल पर खराब करता है जिसका कोई जवाब मेरे पास नहीं होता है। रिया कहती हैं कि यहां फेक सहानुभूति वाले लोग बहुत आते हैं जो क्रांतिकारी बदलाव की बात तो करते हैं लेकिन उनका मकसद भी एक ही होता है।

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बंगाल से आईं काजल कहती हैं कि वो पिछले 3 साल में कई एनजीओ से मिल चुकी हैं लेकिन कुछ खास बदलाव नहीं देख पाईं। अधिकतर एनजीओ यहां सिर्फ केस स्टडी के लिए आते हैं जिनका उनके हित से कोई सरोकार नहीं होता। काजल कहती हैं कि यहां बदलाव की बात कभी नहीं होती, यहां सुविधाओं की बात कभी नहीं होती। यहां बात होती है सिर्फ पुनर्वास की, जो हमें नहीं चाहिए। काजल कहती हैं कि दिल्ली में सरकार बदली तो बस बयान बदले मगर यहां सुविधाएं नहीं दी गईं। वैसे भी यहां से बाहर निकलने के बाद मुश्किलें कम नहीं होतीं बल्कि बढ़ ही जाती हैं। बाहर हमें घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। बेहतर यह है कि हमें यहीं अच्छा माहौल प्रदान किया जाए।

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जीबी रोड की इन महिलाओं के बयानों में नजर आने वाली संतुष्टि असली है या ये उनके हालात के सामने हार मानकर उसके साथ कर लिए गए समझौते का ऐलान है, इसे आसानी से समझा जा सकता है। वैसे भी शाम को सजने वाले इस बाजार में भारी मेकअप, सस्ते परफ्यूम, शराब की दुर्गंध, गुटखे-तंबाकू की पीक से सनी दीवारों और हलके म्यूजिक के बीच असलियत नजर आए भी तो कैसे। अंदर तो अंदर जीबी रोड पर बाहर खड़ी भीड़ जिस भूखी नजरों से खिड़की पर टकटकी लगाए रहती है, उसे देखकर पहली नजर में ही समझा जा सकता है कि यहां न रिश्तों की कोई जगह है और न मानवीय संवेदनाओं की। यहां ऊपर खिड़की में खड़ी महिला गर्म गोश्त भर है और नीचे खड़ा ग्राहक उसका खरीदार। वहां पर पिछले 15 साल से पान की दुकान करने वाले राय बहादुर बताते हैं कि दैनिक मजदूरी करने वाले कुछ लोगों पर नशा इस कदर हावी है कि वो पैसे के अभाव में कभी कभी पूरे दिन खिड़की के सामने टकटकी लगाए रहते हैं।

(शेष अगली किस्त में...)

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