नरेंद्र मोदी की वो पांच रणनीति, जिन्हें समझ नहीं पाए राहुल, मायावती, ममता, अखिलेश!

अफसर अहमद | News18Hindi
Updated: May 28, 2019, 3:10 PM IST
नरेंद्र मोदी की वो पांच रणनीति, जिन्हें समझ नहीं पाए राहुल, मायावती, ममता, अखिलेश!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीति भांपने में नाकाम रहा विपक्ष!

बीजेपी की प्रचंड जीत का एक बड़ा फैक्टर यह भी था कि यह मुकाबला देशभर में क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय पार्टी रहा. तकरीबन तीन सौ सीटों पर बीजेपी का आमने-सामने का मुकाबला क्षेत्रीय पार्टियों से था

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लोकसभा चुनाव के फैसले ने पार्टियों को ही नहीं उन राजनीतिक पंडितों को फिर से सोचने को मजबूर किया है जो जातियों की टू प्लस टू बराबर फोर की थियरी को मानकर चलते रहे हैं. आखिर ऐसा क्या हुआ कि बीजेपी ने सारे जातीय गणित को धता बताकर अपना कल्चरल मैथ लगाया और तकरीबन पूरे देश पर काबिज हो गई. क्या मोदी के काशी में दिए गए भाषण की यह बात कि अंकगणित को कैमिस्ट्री ने फेल कर दिया, पोल पंडितों की ओर इशारा करती है कि जीत का सच कहीं और गहरी तली छिपा बैठा है जिसे वो समझने में बुरी तरह नाकाम रहे.

फायदे चाहिए ज्ञान नहीं

बीजेपी की जीत डीकोड करने के कड़ी में पहला कदम वादों का है. गौर कीजिए 2014 में बीजेपी प्रचंड बहुमत से जीत कर सत्ता में आई थी. लेकिन जीत के कुछ ही महीनों में 2015 की शुरुआत में हुए दिल्ली के चुनाव में वह औंधे मुंह गिर गई और 70 सीटों वाली दिल्ली की विधानसभा में सिर्फ तीन सीटें ही लाई पाई जबकि केजरीवाल की पार्टी ने जोरदार जीत को हासिल कर सबको चौंका दिया. ऐसा क्यों हुआ. हमें इस बात पर गौर करने की जरूरत है. दरअसल केजरीवाल के रूप में दिल्ली की जनता को एक उम्मीद नजर आई, कुछ राहत मिलने की. जब केजरीवाल ने बिजली का बिल हाफ और पानी का बिल माफ करने का नारा दिया तो वह दिल्ली के मतदाताओं को दिल तक छू गया. नतीजा सबके सामने था. यानी राष्ट्रीय मुद्दे देश की राजधानी में ही नहीं चले. चला तो बिजली और पानी की मुद्दा. साफ है जनता रोजमर्रा की जिंदगी में बदलाव चाहती है. (ये भी पढ़ें:  अमित शाह: रिकॉर्ड रैलियां, शास्त्रीय संगीत और शतरंज के खिलाड़ी! )

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काम कर गईं छोटी-छोटी योजनाएं

अब 2019 में आते हैं. बीजेपी एक बार फिर यह समझाने में कामयाब रही है कि वह देश, राज्य, मंडल, जिले की ही नहीं बल्कि आम वोटर की जरूरत को भी पूरा करने का दम रखती है. गौर कीजिए उज्जवला योजना का विपक्ष ने काफी मखौल उड़ाया, आयुष्मान योजना पर भी सवाल उठाए लेकिन जमीन पर जिन्हें इसका लाभ मिला वो आम वोटर था, उसमें जाति या धर्म का भेद नहीं था. इसी तरह चुनाव से कुछ महीने पूर्व ही शुरू हुई किसान सम्मान निधि योजना का दरूगामी असर पड़ा. चुनावी दंगल से दूर जब एक किसान के खाते में सीधे दो हजार रुपये आए तो वो रकम किसी भी एजेंडे, प्रोपेगेंडे से ऊपर थी. यहां कुछ ऐसा हुआ जिसने आम वोटर को अहसास कराया कि सीधे लाभार्थी हम हैं. बीजेपी की मशीनरी ने सिर्फ इन योजनाओं का प्रचार किया लेकिन फर्ज कीजिए योजनाएं होती ही नहीं तो उस प्रचार से वोट मिलता क्या. यानी साफ हो कि बीजेपी वादों और स्कीम के मामले में बाकी पार्टियों से इक्कीस साबित हुई.

राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय
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बीजेपी की प्रचंड जीत का एक बड़ा फैक्टर यह भी था कि यह मुकाबला देशभर में क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय पार्टी रहा. तकरीबन तीन सौ सीटों पर बीजेपी का आमने-सामने का मुकाबला क्षेत्रीय पार्टियों से था. वोटर के सामने सीधा सवाल था कि क्षेत्रीय पार्टी किस तरह राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों को डील कर पाएगी. गौर कीजिए चुनाव से पहले विपक्षी दल एक साथ लड़ने पर एकराय बनाने में नाकामयाब रहे. सभी ने कहा कि जो जहां मजबूत है वह वहां बीजेपी का मुकाबला करे. यानी परिणाम के बाद संयुक्त विपक्ष बनेगा. यह आत्मघाती था. बीजेपी के सामने संयुक्त विपक्ष नहीं बल्कि विपक्ष के नामपर क्षेत्रीय पार्टियां ही थीं. उदाहरण के लिए यूपी में एसपी-बीएसपी, बिहार में आरजेडी, बंगाल में ममता. नतीजा सबके सामने है. बीजेपी ने महीनों पहले अपनी लाइन साफ कर दी थी लेकिन विपक्ष मिलकर एक संयुक्त एजेंडा तक बनाने में नाकाम रहा.

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राष्ट्रवाद

यह भी ठीक है कि बीजेपी ने पांच साल जो भी विकास कार्य किए हों लेकिन चुनाव के दौरान उनका प्रमुख मुद्दा राष्ट्रवाद ही था. मोदी ने एक रैली में कहा- हमने घर में घुस कर मारा. यह जनता को काफी अपील कर गया. पाकिस्तान के खिलाफ देश कमजोर नजर नहीं आना चाहता. बीजेपी ने उस नैरेटिव को पकड़ा और लोगों को अहसास कराया कि देश में ही नहीं सीमा पर भी उनकी सरकार पिछली सरकारों के मुकाबले मजबूत है. विपक्ष को अहसास था कि मोदी के इस धोबीपाट दांव का उनके पास कोई तोड़ नहीं है हालांकि कांग्रेस ने एक कमजोर कोशिश की वो लिस्ट जारी करे कि उनके कार्यकाल में कब-कब सर्जिकल स्ट्राइक हुए. यह कोशिश नक्कारखाने में एक तूती की तरह ही साबित हुई. विपक्ष यह समझने में सिरे से नाकाम रहा कि वह बीजेपी के राष्ट्रवाद के मुद्दे का कैसे मुकाबला करे. नतीजा सबके सामने है.

आक्रामक प्रचार

बीजेपी के आक्रामक प्रचार के आंकड़े किसी को भी चौंका सकते हैं. दो साल पहले 2016 में ही बीजेपी ने 2019 के चुनाव का खाका तैयार कर लिया था. विपक्षी प्रचार में तब उतरे जब आदर्श आचार संहिता लागू हो गई. बीजेपी ने बूथ स्तर के अपने कार्यकर्ता को हर तरह की प्रचार तैयारी से महीनों पहले ही लैस कर दिया था. बीजेपी का हर छोटा-बड़ा नेता एक तारतम्य में प्रचार कर रहा था और विपक्षी दिग्गज अपने बेटे-बेटियों के लिए अभियान में ही व्यस्त थे. अधिकतर विपक्ष परिवार के मोहजाल में फंसा नजर आया. नतीजा सामने है- आरजेडी बिहार में जीरो, यूपी में सपा को सिर्फ 5 सीटें, चौधरी परिवार की आरएलडी को जीरो, चौटाला फैमिली की दोनों पार्टियों को हरियाणा में जीरो. झारखंड में सोरेने फैमिली की जेएमएम अपनी दुमका सीट भी हारी. महाराष्ट्र में पवार फैमिली की एनसीपी को भी कोई फायदा नहीं हुआ.

साफ है जीत के लिए तैयारी हर स्तर पर जरूरी होती है. 2019 की हार से जरूर विपक्ष यह सबक सीखेगा अन्यथा 2024 भी विपक्ष का शायद आरोप लगाते हुए गुजरे.

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First published: May 28, 2019, 3:00 PM IST
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