स्मृति शेष: भारतीय राजनीति के असल 'चाणक्य' थे अरुण जेटली

भूपेंद्र चौबे | News18Hindi
Updated: August 25, 2019, 5:15 PM IST
स्मृति शेष: भारतीय राजनीति के असल 'चाणक्य' थे अरुण जेटली
पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली का शनिवार दोपहर निधन हो गया.

अरुण जेटली (Arun Jaitley) का सर्किल कॉरपोरेट टायकून से लेकर पत्रकार, क्रिकेटर से लेकर कलाकार और जुरिस्ट तक (थोड़ा आश्चर्यजनक) फैला था. ऐसे में आप के लिए यह मुश्किल थी आप उसमें कैसे फिट होते हैं.

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आप अरुण जेटली को कैसे याद करेंगे? 'दिल्ली के अंदरूनी हिस्सों' का एक सर्वोच्च शख्स जो सबके बारे में सब कुछ जानता था? कॉरपोरेट टायकून से लेकर पत्रकार, क्रिकेटर से लेकर कलाकार और  जुरिस्ट तक (थोड़ा आश्चर्यजनक) जेटली का सर्किल का बहुत बड़ा था. ऐसे में आप के लिए यह मुश्किल थी आप उसमें कैसे फिट होते हैं. आज जब मैं स्टूडियो में बैठकर उनकी पार्टी के साथियों और उन लोगों से बात की जिनका जुड़ाव जेटली से था, मैंने यह निष्कर्ष निकाला वह एक ऐसे राजनेता थे, जिनके पास एक ही समय में कई लोगों को विशेष महसूस कराने की अनोखी क्षमता थी.

सोशल मीडिया पर आप देखें तो संपादकों से लेकर जूनियर रिपोर्टर्स तक के पास जेटली की एक कहानी है. मेरे पास भी अपनी कहानी है, लेकिन वह फिर कभी. क्या हमें जेटली को उदारवादी चेहरे के रूप में देखना चाहिए, जिन्होंने 'कट्टर राष्ट्रवाद' के रूप में रणनीति बदल दी, जो साल 2014 के बाद का राजनीतिक स्वाद बन गया?

एक साथ दो नावों की सवारी
सबरीमाला मामले पर जेटली ने कहा था कि 'एक संविधानविद् का मानना होगा कि सुप्रीम कोर्ट पहले आता है, लेकिन ईश्वर पर विश्वास करने वाले लोग कुछ और मानेंगे.' जेटली एक साथ दो नावों की सवारी करने में हमेशा ही कामयाब रहे. जरूरत पड़ने पर खुद को लगातार विकसित करना और फिर से तैयार करना उनकी अद्वितीय राजनीतिक विशेषता रही. शायद यही वह लक्षण है कि उनके हर ओर दोस्त रहे हैं.



देश को कमजोर कर रहे हैं...
वह अक्सर मुझसे कहते थे कि जो लोग हर छोटी-छोटी बात पर मानवाधिकारों के लिए लड़ने सुप्रीम कोर्ट जाते हैं, वे अंततः देश को कमजोर कर रहे हैं, लेकिन यह बात तब की है जब वे सरकार में थे. विपक्ष में रहते हुए उन्होंने साल 2012-13 में जंतर-मंतर जाने से पहले ज़रा नहीं सोचा था, जब अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन चरम पर था. अरविंद केजरीवाल आगे चलकर एक प्रतिद्वंद्वी बन गए, लेकिन उस समय जेटली सरकार की विरोधी आवाज़ों की एक सीमा से जुड़ने से नहीं कतराते थे.
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जेटली की श्रद्धांजलि खाने के लिए उनके प्यार का जिक्र किए बिना अधूरी होगी. जैसा कि अभिषेक मनु सिंघवी ने न्यूज 18 पर मुझसे बात करते हुए कहा, 'अरुण जेटली के बारे में सिर्फ खाने-पीने की चीजें नहीं हैं. उनका पसंदीदा रेस्तरां, दूतावास का रेस्तरां जहां से उन्हें अक्सर मटन रर्रा या दाल, छोले भटूरे के लिए उनका प्यार, या शहर में सबसे अच्छा कीमा मिलने वाली जगह का पता... आपको उनसे यह सब जानकारी मिल सकती थी.'

तो एक उत्कृष्ट संपादक बन सकते थे...
जेटली के साथ दोपहर बिताने के दौरान क्रिकेट से लेकर सूट-टाई तक की बातचीत से लेकर दिल्ली के न्यूज रूम्स तक की न्यूनतम गपशप तक शामिल है. मैं अक्सर उनके साथ मजाक करता कि अगर वह एक राजनीतिज्ञ नहीं होते तो एक उत्कृष्ट संपादक बन सकते थे. एक ऐसी कहावत, जिसे उनके आलोचक अक्सर मीडिया के साथ उनकी गतिशीलता पर हमला करते थे, उन्हें 'मीडिया ब्यूरो प्रमुख' कहा जाता था और उन्हें हमेशा बहुत गर्व होता था.

अरुण जेटली की विविध क्षेत्रों से जुड़ने की क्षमता ने उन्हें एक पंथ का दर्जा दिया, जो किसी भी समकालीन राजनेता के लिए प्रबंधन करना मुश्किल है. उन्होंने अपने जीवन में भले ही लोकसभा चुनाव नहीं जीता हो, लेकिन यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि उनके पार्टी के सहयोगी कई जीते.

हालांकि, दिल्ली के सत्ता के गलियारो में विरोधियों के साथ भी एक रास्ता खुला रखने की वजह से भी उन्हें काफी याद किया जाएगा.

चिदंबरम के साथ जेटली का मौखिक द्वंद्व
साल 2013 में वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम के साथ उनका मौखिक द्वंद्व याद रखने योग्य है. जब कार्ति चिदंबरम से संबंधित मामले ने सबसे पहले सुर्खियां बटोरीं, तो जेटली ही थे जिन्होंने कहा कि भाजपा के पास राजनेताओं के 'बच्चों को खींचने' की कोई योजना नहीं थी, बशर्ते वे जिस व्यवसाय में शामिल थे, वह साफ-सुथरे रहें.

जेटली को कट्टर विरोधियों से निपटने के दौरान एक 'लक्ष्मण रेखा' का पालन करने के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाएगा. उनके निधन से भाजपा ने अपने बेहतरीन रणनीतिकार, भारतीय राजनीति के अंतिम चाणक्य को खो दिया है.

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First published: August 25, 2019, 1:08 PM IST
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