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'मेरी ज़रूरतें कम हैं इसलिए मेरे ज़मीर में दम है', पर्रिकर ने बख़ूबी जी ये मिसाल

News18Hindi
Updated: March 18, 2019, 3:33 PM IST
'मेरी ज़रूरतें कम हैं इसलिए मेरे ज़मीर में दम है', पर्रिकर ने बख़ूबी जी ये मिसाल
मनोहर पर्रिकर

गोवा में ईसाई समुदाय और संघ की विचारधारा के बीच सेतु बनने वाले मनोहर पर्रिकर का निधन भाजपा के सामने विकल्प को लेकर सवाल खड़े कर गया है. गोवा जैसे छोटे से राज्य से केंद्र तक पर्रिकर के राजनीतिक सफर की कहानी.

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दिसंबर 92 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक के कारसेवक के तौर पर काम करने से लेकर गोवा में स्थानीय कैथोलिकों की मदद से पार्टी को मज़बूत करने वाले मनोहर पर्रिकर इकलौते ऐसे नेता रहे, जिन्होंने संतुलन बनाने वाली व्यावहारिक राजनीति के नये आयाम स्थापित किए.

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देश में और कहीं क्या आपने सुना है कि कमल के फूल वाली पार्टी के छह कै​थोलिक विधायक चुने गए हों? पर्रिकर ने यह गोवा में संभव कर दिखाया था. हिंदुत्व को छोड़े बगैर, स्थानीय ईसाइयों की मदद से लगातार पार्टी का आधार मज़बूत करते हुए पर्रिकर ने उनका भी भरोसा जीता था.



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एक राजनेता के तौर पर, पर्रिकर की एक काबिले तारीफ विशेषता यह थी कि वह हमेशा खुद को बदलने के लिए तत्पर रहे. चूंकि वह आरएसएस की विचारधारा से आते थे, इसलिए गुड फ्राइडे को अवकाश घोषित करने के पक्ष में नहीं थे. लेकिन, गोवा में काम करते हुए उन्होंने जल्द ही अपनी गलती का एहसास किया और माफी मांगते हुए सद्भावना यात्रा निकाली. वह चर्चों में गए, पादरियों से मिले और गोवा में ईसाई समुदाय के बीच एक ऐसा माहौल कायम किया, जो भाजपा ने पहले कभी नहीं किया था.

अगर वह एक असंतुष्ट राजनीतिक, निर्वाचित प्रतिनिधि और असंतुष्ट मुख्यमंत्री या रक्षा मंत्री न होते, तो शायद उनकी उप​लब्धियां और बेहतर हो सकती थीं. लेकिन, उनका वह समय भी याद आता है जब वह रक्षा मंत्री रहते हुए गोवा आया करते थे और कहते थे कि उन्हें वहां की फिश करी और चावल कितना याद आता था. वह हमेशा गोवा लौटना चाहते थे. और वह लौटे भी.

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मनोहर पर्रिकर


उनकी राह में कई बार कई रोड़े आए लेकिन हर बार वह आगे बढ़े. उनका गौड़ सारस्वत ब्राह्मण होना उनके राजनीतिक करियर में रोड़ा था. कई लोग कहा करते थे कि उच्च जाति की संख्या कम होने के कारण वह कभी गोवा के सीएम नहीं बन सकते. पर्रिकर ने इस बात को गलत साबित किया और वह गोवा के पहले ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने. वास्तव में, वह गोवा के पहले ऐसे मुख्यमंत्री भी थे, जिन्होंने कार्यकाल पूरा किया.

गोवा की राजनीति में पर्रिकर के उभरने के दौरान राज्य का सियासी माहौल किसी बूचड़खाने जैसा था. विधायकों के लिए जैसे घूमते दरवाज़ों की नीति थी, सत्ता से विपक्ष में, एक पार्टी से दूसरी पार्टी में विधायक और नेता गुलाटी मारते रहते थे. पर्रिकर के आने से पहले गोवा के मुख्यमंत्री सुबह दफ्तर आया करते थे और शाम तक अपने गांव लौट जाते थे.

ऐसे माहौल में जब पर्रिकर आए तो उन्होंने ये पूरा ढर्रा बदला. सीएम दफ्तर में रुककर उन्होंने सबकी जवाबदारियां तय कीं. लोगों ने मिलना, काम को अंजाम देना, इस तरह उन्होंने उदाहरण पेश किए और राजनीति में एक अनुशासन और प्रोफेशनलिज़्म लेकर आए. उन्होंने जो मिसाल कायम की, उस राह पर धीरे धीरे सब चल पड़े. और शायद यही कामयाबी कारण था कि पर्रिकर की शोहरत और साख केंद्र तक पहुंच गई.

गोवा की राजनीति में उनका महत्व इस बात से समझा जा सकता था कि लोकसभा में सिर्फ दो सांसद भेजने वाले राज्य से न केवल एक रक्षा मंत्री बल्कि एक स्वास्थ्य मंत्री भी देश को मिला. यह खोजना भी दिलचस्प हो सकता है कि क्या पर्रिकर के समय से पहले गोवा से कोई राजनेता केंद्र की कैबिनेट में शामिल हुआ था. याद रखें कि यहां एक ऐसे राज्य की बात हो रही है जहां महाराष्ट्र के ज़्यादातर ज़िलों से कम आबादी है.

गोवा में फुलटाइम आरएसएस कार्यकर्ताओं के पहले बैच में पर्रिकर को गिना जाता था. उनसे पहले, गोवा में आरएसएस कार्यकर्ता या तो कोंकणी हुआ करते थे या मुंबई मूल के लोग. पर्रिकर उन चुनिंदा चार कार्यकर्ताओं में थे, जिन्हें आरएसएस ने नेतृत्व क्षमता के लिए चीन्हा था. इनकी प्रतिभा के कारण संघ ने इन्हें मुख्य धारा की राजनीति में लाने की वकालत की थी और इस तरह पर्रिकर भाजपा की टॉप लीडरशिप में आए.

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कड़ी मेहनत के अलावा, पर्रिकर की एक और काबिले तारीफ विशेषता थी, उनकी सरलता. वह समय कौन भूल सकता है कि फ्रांस से प्रधानमंत्री राफेल जेट डील की घोषणा कर रहे थे और गोवा के पणजी में पर्रिकर एक मछली विक्रेता के ठेले का उद्घाटन कर रहे थे. अगले दिन जहां देश के अखबारों में राफेल डील सुर्खियों में थी, वहीं पणजी के संस्करणों में पर्रिकर का कोट मुख्य खबर था कि हर गांव में मछली सस्ते दामों पर मिल सकेगी.

पर्रिकर के सरल स्वभाव के बारे में पूरे गोवा में कई कहानियां बिखरी हुई हैं. कैसे वो अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने जाते थे, ऑटो रिक्शा में घूमते थे, हाथों में प्लेट लिये कैसे किसी शादी में लाइन में खड़े दिखते थे. सत्ता का नशा कभी उनके सिर नहीं चढ़ा. वो हमेशा आसानी से उपलब्ध रहे, सभ्य रहे और 24x7 राजनेता रहे. गोवा के लोगों ने ये सब कभी नहीं देखा था और सरलता ही उन्हें आम जनता के करीब लाई.

पर्रिकर आखिर तक गोवा के लोगों के लिए काम करते रहे. निधन से कुछ ही दिन पहले उन्होंने पणजी में एक ब्रिज का उद्घाटन किया. वह भी ऐसी हालत में, जिसमें लोग बिस्तर से उठना भी गवारा नहीं करते. पर्रिकर का निधन भाजपा के लिए कई सवाल खड़े कर गया है. पर्रिकर का विकल्प राज्य में भाजपा खोज पाएगी, यह अभी कहा नहीं जा सकता.

बॉलीवुड फिल्म सिंघम में एक संवाद है, जिसमें नायक कहता है, 'मेरे ज़मीर में दम है, क्योंकि मेरी ज़रूरतें कम हैं.' कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पर्रिकर ने इस वाक्य को जीकर दिखाया.

लेख : सचिन परब, गोवा बेस्ड पत्रकार
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First published: March 18, 2019, 2:25 PM IST
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