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भारत-पाक के बीच सीजफायर समझौते से ग्रामीणों को आस, चाहते हैं शुरू हो बस सेवा

तस्वीर उरी शहर ही है. (उबीर नाकुशबंदी)

तस्वीर उरी शहर ही है. (उबीर नाकुशबंदी)

India-Pakistan Ceasefire: सीजफायर की खबर सुनकर मोहम्मद युनिस अवान भी खुश हैं. 50 साल के अवान को यह शांति की ओर एक कदम लगता है. बीते डेढ़ साल में उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 16, 2021, 2:08 PM IST
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(उबीर नक्शबंदी)


उरी. हाल ही में भारत (India) और पाकिस्तान (Pakistan) के बीच सीजफायर (Ceasefire) को लेकर एक समझौता हुआ है. इस फैसले से सीमा पर मौजूद जवान ही नहीं, बल्कि आसपास के ग्रामीणों को भी काफी आस है. उनका मानना है कि इसके बाद दोनों देशों के बीच हालात बेहतर हो सकते हैं. किसी को नियंत्रण रेखा (Line of Control) पार बंद पड़ी बस सेवा शुरू होने की उम्मीद है, तो कोई जल्द ही सीमापास कारोबार शुरू होने का अनुमान लगा रहा है.

कारवां-ए-अमन सेवा साल 2005 में शुरू हुई थी, लेकिन अनुच्छेद 370 हटने के बाद हुए तनाव के चलते 2019 में रद्द कर दी गई थी. इस सेवा के जरिए बारामूला जिले में रहने वाले अयातुल्लाह हंदू ने सालों बाद 2006 में नियंत्रण रेखा के दूसरी तरफ रहने वाले रिश्तेदारों से मुलाकात की थी. वो कहते हैं कि अब जब दोनों देश सीजफायर के लिए राजी हो गए हैं, तो उन्हें एक और कदम उठाकर ऐतिहासिक बस सेवा शुरू कर देनी चाहिए.
उन्होंने कहा, '2006 में विभाजन के बाद पहली बार अपने रिश्तेदारों से मिलना मैं नहीं भूल सकता. वहां वे लोग थे, जो उस दौर में पैदा हुआ थे. वे सभी रात में मेरे आसपास जागकर ऐसे बैठे हुए थे, जैसे मैं कोई खजाना हूं.' कारवां-ए अमन सेवा एक ऐसी यात्रा थी, जहां अंतरराष्ट्रीय पासपोर्ट के बजाए यात्रा परमिट की जरूरत होती थी. इस परमिट को दोनों ओर मौजूद एजेंसियों की तरफ से क्लीयरेंस मिलती थी.



यह भी पढ़ें: LoC पर शांति की उम्मीद, भारत-पाक के DGMO ने की बात, पुराने समझौतों पर बनी सहमति

व्यापार के लिए भी जरूरी
सीजफायर की खबर सुनकर मोहम्मद युनिस अवान भी खुश हैं. 50 साल के अवान को यह शांति की ओर एक कदम लगता है. बीते डेढ़ साल में उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा है. वो कहते हैं, 'अगर मेरे दो बेटों को कुछ काम नहीं मिलता, तो मेरे लिए चीजें काफी मुश्किल हो जातीं.' अवान सलामाबाद गांव में रहते हैं. क्रॉस बॉर्डर व्यापार अवान जैसे कई लोगों के लिए उम्मीद की एक किरण है. ये उन लोगों के लिए और भी खास है, जिन्होंने ट्रेड फेसिलिटेशन सेंटर के निर्माण में अपनी जमीन गंवा दी है.

सितंबर 2008 में भारत-पाकिस्तान ने 21 अक्टूबर से व्यापार के शुरुआत की औपचारिक घोषणा की थी. इसके शुरू होने से बंद होने तक मजदूरों को व्यापारियों की मदद से 700-750 रुपये की मजदूरी के साथ 92 हजार दिनों का काम मिला. सरकारी योजनाओं से मिलने वाले 250-300 रुपये के मुकाबले यह आंकड़ा काफी ज्यादा है. कश्मीर डिवीजनल कमिश्नर पाडुरंग कोंडबराओ ने कहा कि व्यापार के क्षेत्र में अभी कोई ताजा जानकारी नहीं है. उन्होंने कहा है कि अगर इससे जुड़ी कोई खबर आती है, तो जरूर शेयर करेंगे.

(अंग्रेजी में पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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