साध्वी प्रज्ञा के यू टर्न के बाद रिटायर्ड IPS ने उठाया सवाल - अब पॉलिटिकल ट्रायल होंगे?

राउंड-अप: 26/11 के आतंकी हमले में बलिदान देने वाले पुलिस अफसर हेमंत करकरे पर विवादास्पद बयान देने के बाद भोपाल सीट से बीजेपी प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर को आलोचना मिली, तो आखिरकार उन्होंने माफी मांगी, लेकिन पूरा दिन सियासी तूफान उठता रहा.

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: April 19, 2019, 10:34 PM IST
Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: April 19, 2019, 10:34 PM IST
भाजपा प्रत्याशी के तौर पर प्रज्ञा ठाकुर लोकसभा के चुनावी रण में उतरीं, तो भोपाल ही नहीं, बल्कि देश भर के सियासी हलकों में जैसे भूचाल आ गया. प्रज्ञा ने 26/11 के आतंकी हमले में जान गंवाने वाले अफसर हेमंत करकरे के बारे में बोलकर देश की सियासत में भूचाल ला दिया. दिन भर की प्रतिक्रियाओं के बाद भाजपा को प्रज्ञा के बयान से पल्ला झाड़ना पड़ा और प्रज्ञा को भी यू टर्न लेना पड़ा. लेकिन, शब्द जो मुंह से निकल गए, वो लौटते नहीं. अब सवाल है कि क्या यह पॉलिटिकल ट्रायल का संकेत है?

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लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र भोपाल सीट से कांग्रेस ने मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को प्रत्याशी के तौर पर खड़ा कर एक बड़ा दांव खेला था. कई दिनों तक भाजपा इसी कश्मकश में रही कि दिग्विजय के मुकाबले वह किसे चुनाव मैदान में उतारे. दिग्विजय राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं और कहा जाता है कि संघ के भीतर भी उनकी अच्छी घुसपैठ रही है इसलिए भाजपा के लिए चयन आसान नहीं था और संघ के साथ लगातार बातचीत इसी पसोपेश को लेकर चली.

प्रज्ञा ऐसे आईं चुनाव मैदान में

कम से कम एक दर्जन नामों पर विचार किया गया और फिर मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती का नाम 24 घंटे से ज़्यादा विचाराधीन रहा क्योंकि उमा 15 साल पहले दिग्विजय सरकार को पटखनी देकर मध्य प्रदेश में भाजपा राज कायम करने की मुख्य भूमिका अदा कर चुकी थीं. लेकिन, उमा के पीछे हट जाने के बाद एक ऐसा चेहरा भाजपा को चाहिए था, जो हिंदुत्व का चेहरा हो और दिग्विजय से टक्कर लेने का माद्दा भी रखता हो. दो दिन पहले ही साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के नाम पर भाजपा ने मुहर लगाई.

सियासत के माहिर दिग्विजय ने प्रज्ञा ठाकुर का नाम घोषित होते ही इशारों में यह कह दिया था कि भोपाल की सियासत में तूफान आने वाला है. इसके बाद सिर्फ एक दिन की शांति के बाद प्रज्ञा ने आपबीती सुनाते हुए महाराष्ट्र में एटीएस के पूर्व चीफ हेमंत करकरे पर गंभीर आरोप लगाए और ऐसा बयान दिया, जिसने खलबली मचा दी. मालेगांव ब्लास्ट केस में जमानत मिलने के बाद रिहा हुई साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का बयान ये था:

एटीएस मुझे 10 अक्टूबर 2008 को सूरत से मुंबई लेकर गई. 13 दिन बंधक बनाकर रखा. पुरुष एटीएसकर्मियों ने मुझे खूब प्रताड़ित किया. सुरक्षा आयोग के सदस्य जांच अधिकारी ने हेमंत करकरे को बुलाया और कहा कि साध्वी को छोड़ दो. लेकिन करकरे ने कहा कि मैं कुछ भी करके इसके खिलाफ सबूत लाऊंगा. करकरे को संन्यासियों का श्राप लगा और मेरे जेल जाने के करीब 45 दिन बाद ही वह 26/11 के आतंकी हमले का शिकार हो गए.
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इस बयान के बाद शुक्रवार को एक के बाद एक आलोचनात्मक प्रतिक्रियाएं आना शुरू हुईं. एक तरफ, उत्तर प्रदेश के महागठबंधन में मायावती और मुलायम सिंह यादव 26 साल बाद एक मंच पर होने की वजह से सुर्खियों में थे, तो दूसरी तरफ करीब 11 साल पुरानी बात छेड़कर प्रज्ञा दिन भर सुर्खियों में रहीं.

न्यायपालिका के होते अब क्या पॉलिटिकल ट्रायल होंगे?
सियासी हलकों से किस तरह प्रतिक्रियाएं आईं और कैसे बात यहां तक पहुंची कि प्रज्ञा को माफी मांगनी पड़ी, इससे पहले इस गंभीर बयान पर देश के दो रिटायर्ड आईपीएस अफसरों की प्रतिक्रियाओं को समझना ज़रूरी है.

ऐसे बयानों से चुनाव दुर्भाग्यपूर्ण हो जाता है. मुझे नहीं पता कि सच क्या है लेकिन पुलिस ने किसी अंडरट्रायल आरोपी के साथ कोई ज़्यादती की भी हो, तो न्याय प्रणाली में उसके लिए व्यवस्था है. उसकी सुनवाई के लिए एक पूरी प्रक्रिया है. इस तरह जनता के सामने रोकर आपबीती सुनाना और किसी पर इल्ज़ाम लगाना तर्कसंगत नहीं है. यह एपिसोड संकेत हो सकता है कि मीडिया ट्रायल के बाद क्या अब पॉलिटिकल ट्रायल होंगे? हमें सिस्टम की खामियों को दूर करना होगा लेकिन सिस्टम में खामियां बनी हुई हैं तो इसकी वजह क्या है और कौन ज़िम्मेदार है, ये भी समझना होगा.
- विजय वाते, रिटायर्ड आईपीएस एवं पूर्व एडीजीपी, मध्य प्रदेश


इससे पहले आईपीएस अफसरों की एसोसिएशन ने भी ट्वीट करते हुए प्रज्ञा के बयान की आलोचना की थी. इस ट्वीट के बाद न्यूज़ 18 के साथ खास बातचीत करते हुए रिटायर्ड आईपीएस अफसरों ने इस मामले पर विचार साझा किए.

मुझे नहीं पता कि उनके पास किस तरह की अलौकिक शक्तियां हैं, लेकिन हैं तो उन्होंने अपनी शक्तियों का प्रयोग तब क्यों नहीं किया जब वो पीड़ा से गुज़र रही थीं, जिनका वो ज़िक्र कर रही थीं. बहरहाल, मैं हेमंत करकरे से कभी नहीं मिला लेकिन सीनियर प्रतिष्ठित अफसरों से हमेशा उनकी तारीफ सुनी. किसी से भी उनके बारे में कोई नकारात्मक बात नहीं सुनी. उनके बारे में इस अपमानजनक टिप्पणी की आलोचना होना चाहिए. एक राजनीतिक पार्टी को अपने लोगों के बीच अनुशासन बनाना चाहिए. कोई भी समझदार व्यक्ति इस बयान को जायज़ नहीं ठहरा सकता. मुझे उम्मीद है कि प्रज्ञा में माफी मांग लेने की समझ होगी, कम से कम इतना तो वो कर ही सकती हैं.
- प्रकाश सिंह, रिटायर्ड आईपीएस एवं पूर्व डीजीपी, उत्तर प्रदेश


विपक्ष हुआ हमलावर तो बीजेपी ने किया मामूली बचाव
राजनीतिकों की तरफ से आई प्रतिक्रियाओं को देखें तो सबसे पहले मध्य प्रदेश से ही प्रतिक्रियाएं आना शुरू हुईं. दिग्विजय सिंह ने करकरे को शहीद बताते हुए कहा कि देश के लिए बलिदान देने वाले एक अफसर का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए. फिर कांग्रेस ने मोर्चा संभालकर साध्वी प्रज्ञा पर एक्शन लिये जाने की मांग कर डाली.

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस बयान की निंदा करते हुए कहा कि ये चुनाव दो विचारधाराओं का युद्ध है और जीत सच की ही होगी. कांग्रेस के खेमे से तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हुईं तो बीजेपी के केंद्रीय मंत्री नरेंद्रसिंह तोमर ने इसका जवाब देने की कोशिश की और कहा कि 'धर्म और अधर्म इस चुनाव में भी है. कांग्रेस अधर्म के रास्ते पर चल रही है इसलिए राहुल गांधी को अपना जनेऊ दिखाना पड़ता है. हमारी पार्टी की आस्था राष्ट्रवाद में है और हमारा राष्ट्रधर्म है'.

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इसी बीच, मेहबूबा मुफ्ती ने भी प्रज्ञा के बयान के​ खिलाफ ट्विटर पर टिप्पणियां जारी रखीं. उन्होंने पहला सवाल किया कि क्या बीजेपी प्रज्ञा के खिलाफ एक्शन लेगी? दूसरा सवाल किया कि न्यूज़ चैनल इस मुद्दे पर मौन क्यों हैं? और फिर कहा कि बीजेपी ने प्रज्ञा के इस बयान से पल्ला झाड़कर कहा है कि मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलने के कारण शायद प्रज्ञा ने ये बयान दिया तो क्या मानसिक रूप से परेशान किसी व्यक्ति को संसद में भेजने का फैसला ठीक है?

फिर भाजपा ने पल्ला झाड़ा तो प्रज्ञा ने भी लिया यू टर्न
इस बहस में शुक्रवार शाम तक राहुल गांधी भी शामिल हुए और उन्होंने सिर्फ इतना ही ट्वीट किया कि 'हेमंत करकरे ने अपना जीवन राष्ट्र की सुरक्षा के लिए कुर्बान किया, उनका सम्मान किया जाना चाहिए'. इस पूरे एपिसोड के चलते भाजपा ने एक औपचारिक बयान जारी करते हुए साफ कह दिया कि इस बयान का समर्थन पार्टी नहीं करती, यह प्रज्ञा का निजी बयान है.

कुछ देर बाद ही प्रज्ञा ने यू टर्न लेते हुए कहा कि 'मुझे लगता है कि इससे (हेमंत करकरे से जुड़ा बयान) देश के दुश्‍मनों को फायदा हो रहा है, इसलिए मैं अपना बयान वापस लेती हूं और माफी मांगती हूं. यह मेरी निजी पीड़ा थी.' ये पूरा एपिसोड यहीं खत्म नहीं हुआ है क्योंकि चुनाव आयोग से इस बयान की शिकायत की गई है और चुनाव आयोग इस मामले को देख रहा है. अभी आयोग की तरफ से इस मामले पर प्रतिक्रिया या एक्शन बाकी है.

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सियासी और पुलिस अधिकारियों की प्रतिक्रियाओं के बीच एक भावुक प्रतिक्रिया उस पीड़िता की आई, जो मुंबई में हुए आतंकी हमले की शिकार थी और उस वक्त केवल नौ साल की थी. 26/11 के आतंकी हमले के ट्रायल में मुख्य गवाह रही देविका रोटावन ने भावुक होकर उस रात की यादें न्यूज़ 18 के साथ साझा कीं और कहा कि 'प्रज्ञा ने अगर श्राप दिया था, तो वह केवल करकरे को नहीं बल्कि कई बेकसूर लोगों को भी लगा'.

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आखिरकार प्रज्ञा के माफीनामे के बाद भोपाल का चुनावी माहौल धर्म का अखाड़ा तब बन गया जब प्रज्ञा ने डैमेज कंट्रोल की रणनीति अपनाकर फिर एक बयान दिया और धर्म की बातें करते हुए दिग्विजय सिंह को महिषासुर करार दिया और खुद को देवी दुर्गा का रूप, जो महिषासुर का संहार करने आई है. प्रज्ञा पर क्या एक्शन लिये जाएंगे, यह तो समय ​बताएगा लेकिन भोपाल सीट पर चुनावी सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं और कांग्रेस व भाजपा के बीच मुकाबला रोमांचक हो चुका है.

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