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OPINION: बीजेपी की राज्‍यों में की गई गलतियों का सुधार है बाबूलाल मरांडी की पार्टी में वापसी

News18Hindi
Updated: February 18, 2020, 3:42 PM IST
OPINION: बीजेपी की राज्‍यों में की गई गलतियों का सुधार है बाबूलाल मरांडी की पार्टी में वापसी
झारखंड के कद्दारवर नेता और झाविमो प्रमुख बाबू लाल मरांडी ने अपनी पार्टी का बीजेपी में विलय कर दिया.

बीजेपी (BJP) में बाबूलाल मरांडी (Babulal Marandi) की वापसी ने इस तथ्‍य की पुष्टि कर दी है कि अपने चुनाव क्षेत्र (Constituency) में लगातार मौजूद रहने वाले और लोगों की आवाज उठाने वाले नेता बिना सत्‍ता के भी लंबे समय तक प्रासंगिक (Survive) बने रहने में कामयाब हो सकते हैं. सबसे पहले आलाकमान के हस्‍तक्षेप की परंपरा कांग्रेस (Congress) में देखी गई थी. बाद में बीजेपी ने भी इस परंपरा को अपना लिया. अब इसमें सुधार होता दिख रहा है.

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  • Last Updated: February 18, 2020, 3:42 PM IST
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सुमित पांडे

नई दिल्‍ली. झारखंड बनने के बाद राज्‍य में पहले विधानसभा चुनाव साल 2005 में हुए. नए राज्‍य झारखंड (Jharkhand) के मतदाताओं ने किसी पार्टी को बहुमत नहीं दिया. नतीजा त्रिशंकु के तौर पर सामने आया. इसके बाद सत्‍ता पर काबिज होने का संघर्ष शुरू हो गया. झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के नेता शिबु सोरेन (Shibu Soren) विधानसभा में बहुमत साबित करने में नाकाम रहे. इसके बाद मार्च के दूसरे सप्‍ताह में बीजेपी (BJP) विधायकों ने रांची में अपना नेता चुनने के लिए बैठक की. दिल्‍ली से तीन शीर्ष नेता बीजेपी विधायक दल के नेता के चुनाव की निगरानी के लिए झारखंड पहुंचे. बीजेपी के तत्‍कालीन महासचिव और झारखंड के प्रभारी राजनाथ सिंह (Rajnath Singh) के साथ वेंकैया नायडू (Venkaiah Naidu) व संजय जोशी (Sanjay Joshi) भी थे.

अर्जुन मुंडा को बना दिया गया झारखंड का मुख्‍यमंत्री
बाबू लाल मरांडी (Babulal Marandi) के समर्थकों के दावों और प्रदर्शनों के बीच विधायकों को बताया गया कि बीजेपी आलाकमान अर्जुन मुंडा (Arjun Munda) को मुख्‍यमंत्री बनाए जाने के पक्ष में हैं. मरांडी के करीबी विधायक प्रदीप यादव समेत कुछ विधायकों ने सीएम के चुनाव के लिए पार्टी के भीतर मतदान पर जोर दिया. विधायकों के एतराज के बावजूद केंद्रीय पर्यवेक्षक (Central Observers) बैठक से बाहर आए और मुंडा के निर्विरोध मुख्‍यमंत्री चुने की घोषणा कर दी. पिछले तीन दशक में बीजेपी का जिस तरह से उभार हुआ, उसमें उस बैठक को एक मामूली घटना के तौर पर लिया गया. हालांकि, उस बैठक के घटनाक्रम से साफ हुआ की पार्टी विद डिफरेंस की बात करने वाली बीजेपी में भी आलाकमान परंपरा शुरू हो गई है.



कांग्रेस से शुरू हुई आलाकमान के हस्‍तक्षेप की परंपरा
बीजेपी में आलाकमान की परंपरा ठीक दो साल बाद उत्‍तराखंड (Uttarakhand) में तब दिखाई दी, जब भगत सिंह कोश्‍यारी (Bhagat Singh Koshyari) के सीएम पद की दावेदारी को दरकिनार कर बीसी खंडूड़ी (BC Khanduri) के पक्ष में फैसला लिया गया. खंडूरी को लेकर कहा गया कि वह पार्टी आलाकमान की पसंद हैं. पार्टी आलाकमान या केंद्रीय नेतृत्‍व की ओर से क्षेत्रीय राजनीति या फैसलों में हस्‍तक्षेप की संस्‍कृति सबसे पहली बार कांग्रेस (Congress) में देखी गई थी. कांग्रेस में ये परंपरा पहले आम चुनाव के डेढ़ दशक के भीतर शुरू हो गई थी. कांग्रेस के क्षेत्रीय नेताओं ने अपने झगड़ों के लिए समय-समय पर शीर्ष नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू (Pt. Jawahar Lal Nehru), लाल बहादुर शास्‍त्री (Lal bahadur Shastri) और के. कामराज (K. Kamraj) के हस्‍तक्षेप की मांग की.

 

बाबूलाल मरांडी ने 2006 में अपनी अलग पार्टी बनाने के लिए बीजेपी से किनारा कर लिया था.


वफादारी पर क्षेत्रीय नेताओं को मिला सियासी संरक्षण
कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने भी क्षेत्रीय राजनीति में अपने वफादार समर्थक तैयार करने के लिए इस परंपरा को बढ़ावा दिया. शीर्ष नेताओं के प्रति वफादारी (Loyalty) और समर्थन (support) के बदले क्षेत्रीय नेताओं को सियासी संरक्षण दिया गया. हालांकि, 60 का दशक खत्‍म होने तक कांग्रेस में पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था (Inter-Part Democracy) कुछ हद तक बनी रही. राज्‍यों में मुख्‍यमंत्री पद के लिए विधायक दल के नेता का गोपनीय या खुले मतदान के जरिये चुनाव किए जाने का सिलसिला चलता रहा. यहां तक कि संगठन में विभिन्‍न पदों के लिए चुनाव की प्रक्रिया अपनाई जाती रही.

यूपी कांग्रेस ने नेहरू को दिया था तगड़ा झटका
उत्तर प्रदेश (UP) के कद्दावर नेता चंद्र भानु गुप्ता कभी भी नेहरू या शास्त्री के मुताबिक खुद को नहीं ढाल पाए. बावजूद इसके वह तीन बार उनके प्रतिद्वंद्वियों को उत्‍तर प्रदेश का मुख्‍यमंत्री बनवाने में सफल रहे. गुप्‍ता ये यूपी कांग्रेस (UP Congress) में अपने पक्ष में तगड़े समर्थन के दम पर कर पाए. आचार्य कृपलानी की पत्नी सुचेता कृपलानी के मुख्‍यमंत्री के तौर पर चुने जाने को गुप्ता समूह की ओर से नेहरू के लिए एक तगड़े झटके के तौर पर देखा गया था. बता दें कि नेहरू के बड़े आलोचक गांधीवादी आचार्य कृपलानी ने आजादी के बाद अपनी अलग पार्टी बनाने के लिए कांग्रेस छोड़ दी थी. वहीं, उनकी पत्‍नी ने कांग्रेस में ही रहने का फैसला किया था.

बाबूलाल मरांडी झारखंड के उन आदिवासी नेताओं में शामिल थे, जिन्‍हें राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (RSS) ने तैयार किया था.


मरांडी ने अलग पार्टी बनाने को छोड़ी थी बीजेपी
पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्‍त्री के निधन के बाद इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) को प्रधानमंत्री बनाए जाने का मोरारजी देसाई (Morarji Desai) ने विरोध किया था. भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी के सिंडिकेट सिस्‍टम और फिर इस व्‍यवस्‍था को हाशिए पर धकेल देने को क्षेत्रीय संगठनों को वैधता के तौर पर देखा गया. इसी तरह बाबूलाल मरांडी ने 2006 में अपनी अलग पार्टी बनाने के लिए बीजेपी छोड़ दी थी. मरांडी, करिया मुंडा (Karia Munda), जुआल ओरम (Jual Oram) और नंद कुमार साई (Nand Kumar Sai) उन आदिवासी नेताओं में शामिल थे, जिन्‍हें राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (RSS) ने तैयार किया था. पिछले छह साल में बीजेपी ने भी राज्‍यों में नए तरह के नेतृत्‍व को लेकर कई प्रयोग किए हैं.

प्रयोगों के बाद भी राज्‍यों में असफल रही बीजेपी
बीजेपी में हर बात के लिए राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेतृत्‍व से मंजूरी लेने का चलन बदस्‍तूर जारी रहा. इसके बाद भी राज्‍यों में बीजेपी को लगातार नाकामी हाथ लग रही है. सत्‍ता में राज्‍यों की प्रमुख जातियों को बड़ी हिस्‍सेदारी देने के सिद्धांत को किनारे कर दिया गया. इसके बाद भी हरियाणा (Haryana) में बीजेपी सरकार चलाने के लिए एक क्षेत्रीय दल पर निर्भर हो गई है. महाराष्‍ट्र (Maharashtra) और झारखंड में बीजेपी के हाथ से सत्‍ता छिन चुकी है. ऐसे में बाबूलाल मरांडी की वापसी को बीजेपी की ओर से अब तक की गई गलतियों में सुधार के तौर पर देखा जा रहा है. इससे इस तथ्‍य की भी पुष्टि हुई है कि अपने चुनाव क्षेत्र (Constituency) में लगातार मौजूद रहने वाले और लोगों की आवाज उठाने वाले नेता बिना सत्‍ता के भी लंबे समय तक प्रासंगिक (Survive) बने रहने में कामयाब हो सकते हैं.

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First published: February 18, 2020, 3:34 PM IST
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