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OPINION: बिहार जीतने के लिए मुस्लिम-यादव समीकरण छोड़ हर वर्ग को साधने में जुटे तेजस्‍वी

News18Hindi
Updated: February 20, 2020, 6:56 AM IST
OPINION: बिहार जीतने के लिए मुस्लिम-यादव समीकरण छोड़ हर वर्ग को साधने में जुटे तेजस्‍वी
राजद नेता तेजस्‍वी यादव पिता लालू प्रसाद यादव के मुस्लिम-यादव समीकरण से किनारा कर रहे हैं.

राजद नेता तेजस्‍वी यादव (Tejaswi Yadav) अपने पिता और पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) के मुस्लिम-यादव समीकरण (M-Y Equation) को छोड़कर सभी वर्गों को साधने की नई रणनीति की ओर बढ़ रहे हैं. अगर वह ऐसा करते हैं तो यह राजद (RJD) की अब तक अपनाई गई रणनीति में बड़ा बदलाव होगा.

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  • Last Updated: February 20, 2020, 6:56 AM IST
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अशोक मिश्रा

पटना. राष्‍ट्रीय जनता दल (RJD) को मुस्लिमों और यादवों (M-Y) की पार्टी माना जाता है. अब राजद नेता तेजस्‍वी यादव (Tejaswi Yadav) अपने पिता और पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) की मुस्लिम-यादव समीकरण की राजनीति को छोड़ अगड़ी जातियों समेत समाज के सभी वर्गों को साधने की रणनीति को अपनाने की ओर बढ़ रहे हैं. राजद पर आरोप लगते रहे हैं कि पार्टी ने बिहार में पिछड़ी जातियों को अपने पक्ष में करने के लिए हर सियासी हथकंडा अपनाया. अब अगर तेजस्‍वी यादव के नेतृत्‍व में पार्टी नई रणनीति पर आगे बढ़ती है तो राजद की अब तक अपनाई गई सामाजिक सिद्धांत और जातीय समीकरण की राजनीति में बड़ा बदलाव होगा.

तेजस्‍वी ने पदाधिकारियों की बैठक में कहा- हर वर्ग की पार्टी है
तेजस्‍वी यादव ने हाल में नियुक्‍त किए गए जिला अध्‍यक्षों और माहसचिवों की बैठक में कहा कि राजद सिर्फ मुस्लिमों और यादवों की पार्टी नहीं है. पार्टी का आधार बहुत बड़ा है और ये समाज के हर वर्ग की पार्टी है. हमारा परिवार बहुत बड़ा है, जिसमें समाज के हर वर्ग को पूरा सम्‍मान और उचित प्रतिनिधित्‍व दिया जाता है. इससे पहले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में राजद टिकट बांटने में मुस्लिम-यादव समीकरण को ही आधार बनाकर फैसले लेती थी. यही नहीं, संगठन पदाधिकारियों और राज्‍यसभा व विधान परिषद में प्रत्‍याशी उतारने के मामले में भी इसी समीकरण को आधार बनाया जाता था. पार्टी अन्‍य जातियों के बहुत ही कम प्रत्‍याशियों को मैदान में उतारती थी.



लालू प्रसाद यादव ने बिहार में मुस्लिम-यादव वोट बैंक को अपने पक्ष में करने के लिए एम-वाई (मुस्लिम-यादव) फार्मूला बनाया था.


बिहार में 12 फीसदी यादव तो 18 फीसदी मुस्लिम आबादी है
लालू प्रसाद यादव ने बिहार (Bihar) में मुस्लिम-यादव वोट बैंक को अपने पक्ष में करने के लिए एम-वाई (मुस्लिम-यादव) फार्मूला बनाया था. बिहार में कुल 18 फीसदी मुस्लिम और 12 फीसदी यादव हैं. इसी 30 फीसदी वोट बैंक के दम पर वह लगातार चुनाव जीतते रहे. लालू प्रसाद यादव ने 15 साल बिहार पर शासन किया. राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पिछड़ा वर्ग को अन्‍य पिछड़ा वर्ग के साथ जोड़ दिए गए हैं, लेकिन बिहार में उन्‍हें अति पिछड़ावर्ग और पिछड़ा वर्ग में बांट दिया गया है. अति पिछड़ा वर्ग में 120 जातियां हैं, जबकि पिछड़ा वर्ग में यादव, कुर्मी, कुशवाह और वैश्‍य को रखा गया है. अनुसूचित जाति में 22 जातियों को रखा गया है, जबकि आदिवासी राज्‍य की कुल जनसंख्‍या के एक फीसदी हैं.

लालू यादव ने मंडल कमीशन की सिफारिशों का उठाया फायदा
आदिवासी समुदाय के लोग झारखंड (Jharkhand) और नेपाल (Nepal) की सीमा से लगते बिहार के इलाकों में सिमटे हुए हैं. 90 के दशक की शुरुआत में जब तत्‍कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह (Former PM VP Singh) के नेतृत्‍व में केंद्र सरकार (Central Government) ने पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों (Government Jobs) में 50 फीसदी आरक्षण (Reservation) की मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किया तो वंचित तबके का एकीकरण अपने चरम पर पहुंच गया. बिहार के तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने इसका भरपूर फायदा उठाया. वह तब तक बिहार की सत्‍ता पर कायम रहे, जब तक उनके खिलाफ चारा घोटाला में आरोपपत्र दायर नहीं हुआ. इस घोटाले के सामने आने के बाद बिहार की जनता ने उन्‍हें सत्‍ता से बेदखल कर दिया.

नीतीश कुमार ने भी दलितों की उपजातियों को अपने साथ जोड़ने के लिए महादलित समुदाय बनाया और उनके लिए कई कल्‍याणकारी योजनाएं शुरू कीं.


नीतीश ने महादलित समुदाय के लिए शुरू कीं योजनाएं
गैर-यादव समुदाय के लोगों की महत्‍वाकांक्षाएं बढ़ती गईं और वे तब की समता पार्टी (Samta Party) के नेता नीतीश यादव (Nitish Yadav) के साथ जुटने शुरू हो गए. बाद में यही समता पार्टी जनता दल यूनाइटेड (JD-U) बन गई. नीतीश कुमार ने भी दलितों की उपजातियों को अपने साथ जोड़ने के लिए महादलित (Mahadalit) समुदाय बना दिया. उन्‍होंने महादलित समुदाय के लिए कई कल्‍याणकारी योजनाएं शुरू कीं. इसके अलावा कुर्मी, कोरी और वैश्‍य भी मुस्लिम-यादव समीकरण को तरजीह देने के कारण राजद से दूर होने लगे. इन जातियों से जुड़े समूह अपनी सुविधा के मुताबिक जदयू, लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) और अन्‍य दलों के पीछे खड़े हो गए.

बिहार अब भी ढो रहा है जाति की राजनीति का बोझ
देश में किसी भी पार्टी के चुनाव जीतने के लिए जातीय समीकरणों को समझकर फैसले लेना जरूरी माना जाता है. इसका बिहार से ज्‍यादा किसी दूसरे राज्‍य में इस्‍तेमाल नहीं किया गया. बिहार की हर पार्टी का मूलमंत्र 'सोशल इंजीनियरिंग' ही है. बिहार की सभी पार्टियां जातीय संतुलन साधने में जुटी रहती हैं. मौजूदा समय में देश के ज्‍यादातर राज्‍यों में विकास की राजनीति की बात हो रही है. वहीं, बिहार अब भी जाति की राजनीति का बोझ ढो रहा है. वहां आज भी हर विधानसभा क्षेत्र में जातीय समीकरणों के आधार पर टिकट बांटे जाते हैं. ऐसे में राजद ने 2005 में सत्‍ता छिनने के बाद अब राज्‍य के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की रणनीति का रुख किया है. पार्टी ने संगठन पदाधिकारियों में अतिपिछड़ा वर्ग और दलितों को 45 फीसदी जगह दी है. माना जा रहा है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में भी यही फार्मूला अपनाया जा सकता है.
(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. लेख उनके निजी विचार हैं.)

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First published: February 20, 2020, 1:31 AM IST
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