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सबरीमाला मामला: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, कानून के सवालों को वृहद पीठ को भेज सकते हैं

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Updated: February 10, 2020, 12:36 PM IST
सबरीमाला मामला: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, कानून के सवालों को वृहद पीठ को भेज सकते हैं
सबरीमाला मामले में 12 फरवरी से प्रतिदिन सुनवायी होगी

चीफ जस्टिस एस ए बोबडे (S.A. Bobde) की अगुवाई वाली पीठ ने संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता एवं आस्था संबंधी मामलों पर सात प्रश्न तैयार किए, जिनकी सुनवाई नौ न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ करेगी.

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  • Last Updated: February 10, 2020, 12:36 PM IST
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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार को कहा कि उसकी पांच जजों की पीठ सबरीमाला मामले (Sabarimala Case) में पुनर्विचार अधिकार क्षेत्र के तहत अपनी सीमित शक्ति का इस्तेमाल करते हुए कानून के प्रश्नों को वृहद पीठ को भेज सकती है. चीफ जस्टिस एस ए बोबडे की अगुवाई वाली पीठ ने संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता एवं आस्था संबंधी मामलों पर सात प्रश्न तैयार किए, जिनकी सुनवाई नौ जजों की संवैधानिक पीठ करेगी.

पीठ ने कहा कि उसकी नौ जजों की पीठ संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के अधिकार के साथ इसके परस्पर प्रभाव एवं संबंध के मामले पर सुनवाई करेगी. यह पीठ धार्मिक प्रथाओं के संबंध में न्यायिक पुनरीक्षा की सीमा और संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) में हिंदुओं के वर्गों के अर्थ पर भी सुनवाई करेगी.

पीठ किसी विशेष धर्म या धर्म के सम्प्रदाय से संबंध नहीं रखने वाले व्यक्ति के जनहित याचिका दायर करके उस विशेष धर्म की धार्मिक आस्थाओं पर सवाल करने के अधिकार को लेकर भी सुनवाई करेगी.

नौ न्यायाधीशों वाली पीठ ने कहा कि वह उन मुद्दों पर 12 फरवरी से दिन प्रतिदिन सुनवायी करेगी जिन्हें 14 फरवरी, 2019 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ द्वारा भेजा गया था. सबरीमाला मामले के अलावा, फैसले में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिदों और दरगाहों में प्रवेश और गैर पारसी पुरुषों से विवाह करने वाली पारसी महिलाओं के पवित्र अग्नि स्थल अगियारी में जाने पर पाबंदी से जुड़े मुद्दों को वृहद पीठ को भेजा गया था.

उन्होंने सबरीमाला मामले में पांच-न्यायाधीशों की पीठ के 2018 के निष्कर्षों का उल्लेख किया और कहा कि भगवान अयप्पा के अनुयायी एक अलग धार्मिक संप्रदाय के तहत नहीं आते जो संविधान के तहत संरक्षण के हकदार हैं ताकि वे वह पुरानी परंपरा जारी रख सकें जिसमें महिलाओं के कुछ आयु समूह को मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश पर रोक है.

पीठ ने कहा कि सबरीमाला पुनरीक्षा याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत को यह पता चला उसके समक्ष इसी तरह के मुद्दे लंबित थे. इसलिए, इसने पहले एक प्राधिकृत फैसला देने और फिर इन सभी मुद्दों से निपटने का फैसला किया जो अनुच्छेद 25 और 26 (धर्म के अधिकार) की व्याख्या से संबंधित हैं. (भाषा इनपुट के साथ)

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First published: February 10, 2020, 12:32 PM IST
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