पढ़ें: समझौता ब्लास्ट के 9 साल बाद कहां तक पहुंची है NIA की जांच?

भारत पाकिस्तान के बीच जब-जब बातचीत की पहल होती है किसी न किसी आतंकी घटना को अंजाम दे दिया जाता है।
भारत पाकिस्तान के बीच जब-जब बातचीत की पहल होती है किसी न किसी आतंकी घटना को अंजाम दे दिया जाता है।

भारत पाकिस्तान के बीच जब-जब बातचीत की पहल होती है किसी न किसी आतंकी घटना को अंजाम दे दिया जाता है।

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नई दिल्ली। भारत पाकिस्तान के बीच जब-जब बातचीत की पहल होती है किसी न किसी आतंकी घटना को अंजाम दे दिया जाता है। समझौता ब्लास्ट भी 2007 पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री महमूद कसूरी की भारत यात्रा से ठीक एक दिन पहले हुआ था। ये भी एक पैटर्न है जो लश्कर को इस हमले से जोड़ता है, लेकिन यूपीए सरकार के दौरान एनआईए ने असीमानंद को और उसके साथियों पर शिकंजा कसा।

 धमाके के 9 साल बाद कहां तक पहुंची है एनआईए की जांच--

स्वामी असीमानंद वो नाम, जो समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट का मुख्य आरोपी है। स्वामी असीमानंद को गिरफ्तार करने के बाद एनआईए ने इसे धमाके का मास्टरमाइंड बताया था। लेकिन आज सच्चाई है कि असीमानंद को समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट केस में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट से जमानत मिल चुकी है। इतने बरसों की जांच के बावजूद भी एनआईए इतने सबूत नहीं जुटा पाई कि वो असीमानंद को सलाखों के पीछे रख सके। सबूत के नाम पर एनआईए के पास सबसे पुख्ता आधार असीमानंद का इकबालिया ही बयान था।



एनआईए ने दावा किया था कि असीमानंद अपना गुनाह कबूल चुका है, लेकिन जब ये मामला कोर्ट में पहुंचा तो असीमानंद अपने बयान से मुकर गया। आपको बता दें कि समझौता ब्लास्ट केस में अब तक एनआईए तीन बार चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। उसने पहली चार्जशीट जून 2011 में दाखिल की थी। असीमानंद पर बम का बदला बम से लेने का साजिश रचने का आरोप लगाया गया था। असीमानंद के अलावा 4 और लोगों को इस केस का आरोपी बनाया गया था। इस केस के 165 में से 22 गवाह अब तक कोर्ट में मुकर चुके हैं।
एनआईए का दावा था कि असीमानंद देश में मंदिरों पर हुए आतंकी हमलों से बहुत दुखी था और इसलिए वो बदला लेना चाहता था। इसलिए उसने ना सिर्फ मक्का मस्जिद, अजमेर दरगाह बल्कि समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट की भी साजिश रची और अपने साथियों को पैसा और विस्फोटक मुहैया करवाया। एनआईए ने चार्जशीट में कहा था कि असीमानंद ने समझौता एक्सप्रेस को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उसमें ज्यादातर पाकिस्तानी नागरिक ही सफर करते थे। इस मामले में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की भूमिका की भी जांच की जा रही है। इतने दावों और खुलासों के बीच धमाके के सात साल बाद फरवरी 2014 में इस केस की सुनवाई शुरू हुई। ये प्रक्रिया अभी जारी ही है और इस बीच अब एनआईए लश्कर की भूमिका की जांच करने में जुट गई है।

लगातार पलटते हुए गवाहों की वजह से एनआईए की स्थिति इस केस में पहले से ही काफी कमजोर है। ज्यादातर गवाहों ने कोर्ट में ये भी आरोप लगाया है कि एनआईए ने उन पर असीमानंद के खिलाफ बयान देने का दबाव डाला था। फास्ट ट्रैक होने के बावजूद इस केस में अब भी डेढ़ सौ से ज्यादा गवाहों से पूछताछ होनी बाकी है। पिछले कई सालों से जांच की दिशा को लेकर आरोप झेल रही एनआईए की दलील रही है कि समझौता धमाके का कोई चश्मदीद नहीं था और इसलिए ये सारा केस सिर्फ परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित है।
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