जब बनारस का आधिकारिक नाम काशी करना चाहते थे सरदार

बनारस के तत्कालीन महाराजा विभूतिनारायण सिंह ने अपनी रियासत के भारत के साथ रहने वाले समझौते पर 15 अगस्त 1947 तक हस्ताक्षर कर दिये थे. पढ़िए, बनारस का पूरा इतिहास.

Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor | News18Hindi
Updated: July 5, 2019, 9:24 AM IST
जब बनारस का आधिकारिक नाम काशी करना चाहते थे सरदार
आजादी के पहले जब भारत में करीब पांच सौ पैंसठ देशी रजवाड़े अस्तित्व में थे, उनमें से एक था बनारस. बनारस के राजा काशी नरेश के तौर पर भी संबोधित किये जाते थे
Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor
Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor | News18Hindi
Updated: July 5, 2019, 9:24 AM IST
भारत के सबसे प्राचीन शहर के तौर पर वाराणसी का जिक्र होता है, जिसे धार्मिक ग्रंथों में काशी के तौर पर उल्लिखित किया गया है. इसी शहर में है काशी हिंदू विश्वविद्यालय, जिसके कुलगीत में काशी को तीनों लोकों से न्यारी कहा गया है. लेकिन विश्वविद्यालय का नाम जब अंग्रेजी में लिखा जाता है, तो इसे बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी लिखा जाता है. सवाल ये है कि आखिर हिंदी में काशी और अंग्रेजी में लिखते समय बनारस क्यों. काशी या फिर वाराणसी ही क्यों नहीं, जो ज्यादा संस्कृतनिष्ठ नाम हैं. इसकी कहानी खासी रोचक है.

दरअसल आजादी के पहले जब भारत में करीब पांच सौ पैंसठ देशी रजवाड़े अस्तित्व में थे, उनमें से एक था बनारस. बनारस के राजा काशी नरेश के तौर पर भी संबोधित किये जाते थे और बनारस राज को काशी राज भी कहा जाता था. हालांकि आधिकारिक तौर पर इस रजवाड़े का नाम बनारस ही था और यहां के शासक आधिकारिक तौर पर महाराजा बनारस के तौर पर संबोधित किये जाते थे.

जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ने का फैसला किया और देश को सांप्रदायिक आधार पर, मुस्लिम लीग की मांग को मानते हुए, हिंदुस्तान और पाकिस्तान दो देशों में बांटने का फैसला किया, तो देशी रजवाड़ों को ये विकल्प दिया गया कि वो चाहें तो भारत और पाकिस्तान किसी के साथ भी जुड़ सकते हैं, क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने अपने साथ हुए रियासतों के समझौतों को भी आजादी के साथ समाप्त करने का फैसला किया था. ऐसे में सरदार पटेल के अथक प्रयासों से ज्यादातर रजवाड़ों ने भारत के साथ ही रहने का फैसला किया और जब 15 अगस्त 1947 के दिन स्वतंत्र भारत अस्तित्व में आया, तो उसके साथ जम्मू-कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद को छोड़कर जो बाकी पांच सौ बासठ रजवाड़े भारत के साथ आ चुके थे, उनमें से एक बनारस भी था. बनारस के तत्कालीन महाराजा विभूतिनारायण सिंह ने अपनी रियासत के भारत के साथ रहने वाले समझौते पर 15 अगस्त 1947 तक हस्ताक्षर कर दिये थे.



आजादी के बाद ऐसे बदला बनारस का इतिहास
आजादी के कुछ महीनों के बाद ही इस बात पर विचार होने लगा कि प्रशासनिक सहूलियत के हिसाब से ज्यादातर रजवाड़ों का किसी न किसी प्रांत में विलय कर दिया जाए या फिर कई रजवाड़ों को मिलाकर नये प्रांत ही बना दिये जाएं. इसी सोच-विचार और प्रक्रिया के तहत आखिरकार तत्कालीन उत्तर प्रदेश, जो ब्रिटिश काल में यूनाइटेड प्रॉविंस के तौर पर जाना जाता था, के साथ टिहरी गढ़वाल, रामपुर और बनारस राज का विलय करने का फैसला किया गया. इस सिलसिले में तत्कालीन महाराजा विभूति नारायण सिंह के साथ न सिर्फ सरदार पटेल की बैठकें हुई, बल्कि गृह मंत्रालय के अंदर देशी रजवाड़ों के विभाग को संभालने वाले सचिव वीपी मेनन के साथ भी. 1949 के जुलाई से लेकर सितंबर तक बातचीत का ये सिलसिला चलता रहा.

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बनारस राज का उत्तर प्रदेश में विलय करने संबंधी बातचीत की खबर जब सार्वजनिक हुई, तो क्या आम और क्या खास, सब इसके भविष्य को लेकर चिंतित हुए. बनारस के वो लोग भी जो काशीराज के इलाके में नहीं आते थे, वो भी सदियों पुरानी परंपरा के तहत बनारस के महाराजा के साथ अपने को जोड़कर देखते थे. काशी विश्वनाथ के बाद अगर शहर में किसी को सबसे अधिक सम्मान दिया जाता था, तो वो महाराजा बनारस ही थे, जिन्हें आम तौर पर काशी नरेश के तौर पर संबोधित किया जाता था.

ऐसे में ये चिंता सताने लगी कि विलय के बाद काशीराज या फिर काशीनरेश जैसे शब्द अतीत का हिस्सा तो नहीं बन जाएंगे. ये चिंता सिर्फ शहर के आम लोगों में नहीं थी, बल्कि उन लोगों में भी थी, जो समाज जीवन में बड़ी भूमिका निभा रहे थे. ऐसे दो प्रमुख लोगों में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति गोविंद मालवीय और असम के तत्कालीन राज्यपाल और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्रीप्रकाश भी थे, जिनका संबंध बनारस राज परिवार से कई पीढ़ियों से था.



इन दो शब्दों को बचाने की लगी थी होड़
23 जुलाई 1949 को विलय के मसले पर महाराजा की सरदार पटेल से होने वाली मुलाकात के ठीक दो दिन पहले गोविंद मालवीय ने 21 जुलाई 1949 को सरदार पटेल को चिट्ठी लिखी थी. इस चिट्ठी में सरदार पटेल से खास तौर पर अपील की गई थी कि बनारस राज का उत्तर प्रदेश में विलय होने की स्थिति में वो इस बात का खास तौर पर ध्यान रखें कि किसी तरह काशी राज्य और काशी नरेश जैसे प्राचीन नाम विलुप्त न हो पाएं. मालवीय ने ये भी लिखा कि अगर सरदार इन नामों को सुरक्षित रखने के लिए कोई कारगर कदम उठाते हैं तो प्रत्येक हिंदू और खास तौर पर बनारस के लोग उनके आभारी रहेंगे, क्योंकि काशीराज और भारत एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं और भारतवर्ष में ये नाम हमेशा बना रहना चाहिए.

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ऐसा ही एक पत्र असम की तत्कालीन राजधानी शिलौंग से राज्यपाल श्रीप्रकाश ने भी लिखा. 27 जुलाई 1949 को लिखे इस पत्र में श्रीप्रकाश ने रेडियो पर सुनी हुई उस घोषणा का जिक्र भी किया, जिसमें सरदार ने बनारस राज का विलय उत्तर प्रदेश में करने का फैसला महाराजा से बातचीत के बाद किया था. श्रीप्रकाश ने अपने पत्र में काशी के धार्मिक महत्व का विस्तार से जिक्र तो किया ही था, ये भी बताया था कि किस तरह खुद भागवत गीता में काशीनरेश का जिक्र है, जो कुरुक्षेत्र की लड़ाई के दौरान पांडवों के पक्ष में मैदान में उतरे थे. गोविंद मालवीय की तरह ही श्रीप्रकाश की गुहार भी यही थी कि उत्तर प्रदेश में बनारस का विलय होने के बावजूद ऐसी कोई स्थाई व्यवस्था की जानी चाहिए, जिससे काशी और काशीनरेश ये दोनों शब्द और नाम लुप्त न हो जाएं.

श्रीप्रकाश के इस पत्र का जवाब तीन रोज बाद ही सरदार पटेल ने एक पत्र के जरिये दिया था. 30 जुलाई 1949 को लिखे इस पत्र में सरदार ने लिखा था कि वो और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत भारतीय परंपराओं और इतिहास में काशी के महत्व को लेकर भली-भांति सचेत हैं और वो ये कोशिश करेंगे कि काशी के इस समृद्ध इतिहास को किसी तरह से जोड़कर रखा जाए. इसी संबंध में सरदार पटेल ने श्रीप्रकाश से ये पूछा था कि अगर बनारस नाम को ही बदलकर काशी कर दिया जाए, तो कैसा रहेगा.



श्रीप्रकाश के सुझाव के बावजूद बनारस का नाम आखिरकार बदला
सरदार के पत्र और उसमें दिये गये नाम परिवर्तन के सुझाव पर सात अगस्त 1949 को श्रीप्रकाश ने फिर से एक विस्तृत पत्र लिखा. उस समय श्रीप्रकाश खुद असम के पासीघाट इलाके में मौजूद थे, तो सरदार मुंबई में. श्रीप्रकाश ने अपने पत्र में काशी, वाराणसी और बनारस नाम के उदभव के बारे में लिखा. श्रीप्रकाश के मुताबिक, बनारस वाराणसी का बिगड़ा हुआ नाम नहीं है, बल्कि संक्षिप्त नाम है. जहां तक वाराणसी का सवाल है, वो वरुणा और अस्सी, दो नदियो के बीच बसे स्थल के तौर पर प्रचलन में आया. जहां तक काशी का सवाल है, श्रीप्रकाश ने लिखा कि वाराणसी का जो मुख्य हिस्सा है, वो काशी के तौर पर जाना जाता है और काशी शब्द का अर्थ उज्वल या दैदिप्यमान है.

इन सभी की चर्चा करते हुए श्रीप्रकाश ने बनारस का नाम काशी किये जाने से इसलिए मना किया, क्योंकि एक तो बनारस नाम भी लंबे समय से प्रचलन में था और दूसरा कारण ये कि बनारस के अंदर न सिर्फ काशी, बल्कि गंगा पार का इलाका भी शामिल था. श्रीप्रकाश का ये पत्र मिलने के बाद सरदार पटेल ने 22 अगस्त 1949 को तत्कालीन संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को पत्र लिखा, जिसमें ये कहा कि विलय के बाद बनारस के बारे में उपयुक्त नाम सोचते समय वो श्रीप्रकाश के पत्र का ध्यान रखें.

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इन पत्राचारों के कुछ समय बाद ही पांच सितंबर 1949 को बनारस के महाराजा और भारत सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर वी पी मेनन ने उस समझौते पर हस्ताक्षर किये, जिसके तहत निर्धारित किये गये दो लाख अस्सी हजार रुपये सालाना के प्रीवी पर्स और निजी संपत्ति पर हक के एवज में बनारस राज का विलय संपूर्ण तौर पर उत्तर प्रदेश में करने के लिए सहमति बनी. इसी समझौते के तहत 15 अक्टूबर 1949 को आधिकारिक तौर पर बनारस उत्तर प्रदेश का हिस्सा बन गया.

लेकिन श्रीप्रकाश के सुझाव के बावजूद बनारस का नाम आखिरकार बदला गया और 24 मई 1956 को बनारस का नाम बदलकर वाराणसी कर दिया गया. उस समय उत्तर प्रदेश में संपूर्णानंद मुख्यमंत्री थे और उनका खुद का रिश्ता बनारस से था. संस्कृत के विद्वान इस नेता, जिनके नाम पर शहर में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय है, उन्होंने बनारस की जगह ज्यादा संस्कृतनिष्ठ नाम वाराणसी का चयन किया.



काशी आज भी दिल और जुबान दोनों पर है
आज शहर और जिले के तौर पर वाराणसी आधिकारिक तौर पर अस्तित्व में है, लेकिन शहर के लोगों के लिए बनारस और काशी आज भी दिल और जुबान दोनों पर है, साथ में काशी नरेश भी. यही वजह है कि वाराणसी से लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद, अपने पहले कार्यकाल में बतौर पीएम नरेंद्र मोदी जापान गये, तो उन्होंने काशी को जापान के प्राचीनतम शहर क्योटो के तौर पर विकसित करने के समझौते पर हस्ताक्षर किये और इसी के तहत पिछले पांच साल में कई बड़ी योजनाएं लागू भी कीं, जिसके तहत काशी विश्वनाथ के पास हेरिटेज कॉरीडोर की महत्वाकांक्षी योजना भी है. मोदी को काशी के महत्व का अहसास तो है ही, वाराणसी के लोगों के लिए तो आज भी तीनों लोकों से न्यारी काशी ही है, जिसका जिक्र करना मशहूर वैज्ञानिक शांति स्वरुप भटनागर भी काशी हिंदू विश्वविद्यालय का कुलगीत लिखते समय भूले नहीं थे, जिसकी स्थापना बनारस रियासत के जमाने में 1916 में हुई थी.
First published: July 5, 2019, 9:13 AM IST
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