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आपराधिक मामलों की ठीक से जांच नहीं कर पाती पुलिस, आरोपियों को मिलता है फायदा: सुप्रीम कोर्ट

एसए बोबडे ने कहा कि मौजूदा दौर में सबूत इकट्ठा करने के लिए टेक्नोलॉजी का बहुत इस्तेमाल होता है.. (File Photo)

एसए बोबडे ने कहा कि मौजूदा दौर में सबूत इकट्ठा करने के लिए टेक्नोलॉजी का बहुत इस्तेमाल होता है.. (File Photo)

Supreme Court: मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि क्रिमिनल मामलों में मजिस्ट्रेट नियुक्त होने चाहिए जो पुलिस को बताए कि किस तरह से और कैसे सबूत इकट्ठा किए जाने चाहिए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 24, 2021, 11:22 PM IST
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नई दिल्ली. भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबडे (Chief Justice of India SA Bobde) ने इस बात पर चिंता जताई कि क्रिमिनल मामलों (Criminal Cases) में पुलिस ठीक से जांच नहीं करती. पुलिस के सबूत ठीक से जमा न करने की वजह से आरोपियों को फायदा हो जाता है और अदालत को उन्हें बरी करना पड़ता है. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि क्रिमिनल मामलों में मजिस्ट्रेट नियुक्त होने चाहिए जो पुलिस को बताए कि किस तरह से और कैसे सबूत इकट्ठा किए जाने चाहिए. ससे पुलिस बेहतर तरीके से सबूत इकट्ठा करेगी और दोषियों कि सजा देने में आसानी होगी.

बोबडे ने कहा कि मौजूदा दौर में सबूत इकठ्ठा करने के लिए टेक्नोलॉजी का बहुत इस्तेमाल होता है. इसमें फॉरेंसिक साइंस की बड़ी भूमिका होती है. इसलिए अदालत चाहता है कि प्रोफेशनल तरीके से क्रिमिनल मामलों की जांच होनी चाहिए. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वह इस बात पर अलग से सुनवाई करेंगे और सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगेंगे. हालांकि उन्होंने आज कोई आदेश पारित नहीं किया. मुख्य न्यायाधीश की ये टिप्पणी एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आई जिसमे क्रिमिनल मुकदमों के जल्द निपटारे पर चर्चा हो रही थी.

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ऐसे ही एक मामले से कोर्ट ने सुनाया था ये फैसला
इससे पहले मंगलवार को ऐसे ही एक आपराधिक मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि आरोपी का संबंध अपराध से जोड़ने के लिए प्रत्यक्ष साक्ष्य के अभाव वाले मामलों में, दोष साबित करने के निष्कर्ष तक पहुंचने वाली परिस्थितियां पूरी तरह से साबित की जाएं और घटनाओं की कड़ी में कोई अंतराल नहीं छूटे.

शीर्ष न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के एक फैसले के खिलाफ दोषी की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की. साथ ही, अपनी टिप्पणी से जुड़े कई फैसलों का जिक्र भी किया.

गौरतलब है कि उच्च न्यायालय ने 28 अक्टूबर 2005 को दोषी को अपनी गर्भवती पत्नी की हत्या करने के मामले में उम्र कैद की सजा सुनाई थी. शीर्ष न्यायालय को इन कानूनी दलीलों का सामना करना पड़ा कि यह मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था और दोषी को हत्या से जोड़ने वाली घटनाओं की कड़ी में अंतराल (गैप) था.

इस घटना के तहत आर दामोदरन (दोषी) ने शराब के नशे में अपनी पत्नी निर्मला मेरी को डंडे से पीटा था, जिससे उसे अंदरूनी चोट लगी थी और वह खुद ही उसे एक अस्पताल ले गया और दावा किया कि उसे (निर्मला को) दिल का दौड़ा पड़ा था.
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