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  • अयोध्या मामले में दाखिल पहली रिव्यू पिटिशन में कहा गया, 'सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद ध्वंस के लिए हिंदुओं को दिया पुरस्कार'

अयोध्या मामले में दाखिल पहली रिव्यू पिटिशन में कहा गया, 'सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद ध्वंस के लिए हिंदुओं को दिया पुरस्कार'

अयोध्या भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में पहली रिव्यू पिटिशन दाखिल की गई है (सांकेतिक फोटो)

अयोध्या भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में पहली रिव्यू पिटिशन दाखिल की गई है (सांकेतिक फोटो)

मौलाना सैयद अशद राशिदी (Maulana Syed Ashhad Rashidi), जो कि असली अयोध्या भूमि विवाद (Ayodhya Land Dispute) मामले के याचिकाकर्ता एम सिद्दीक के बेटे हैं, उन्होंने रिव्यू पिटिशन (Review Petition) में 9 नवंबर को दिए गए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के फैसले में भारी खामियां हैं.

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नई दिल्ली. अयोध्या भूमि विवाद मामले (Ayodhya Land Dispute) में मुस्लिम पक्ष  की ओर से सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में दाखिल की गई पहली पुनर्विचार याचिका (Review petition) में कहा गया है कि अयोध्या की विवादित भूमि को हिंदू पक्ष (Hindus) को देना उन्हें बाबरी मस्जिद के विध्वंस के लिए ईनाम देने जैसा है.

इस पुनर्विचार याचिका (Review Petition) को मौलाना सैय्यद अशद राशिदी (Maulana Syed Ashhad Rashidi) ने दाखिल किया है. राशिदी अयोध्या भूमि विवाद के पक्षकार एम सिद्दीक के कानूनी वारिस है. इस याचिका में उन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के 9 नवंबर के फैसले में भारी खामियां हैं. इसलिए इसमें पुनर्विचार की आवश्यकता है.

'अपराधों पर सुप्रीम कोर्ट ने दिया पुरस्कार'
वकील एजाज मकबूल की 217 पेज की याचिका में 217वें पेज पर कहा गया है, "माननीय न्यायालय ने राहत देने में गलती की है जो कि बाबरी मस्जिद (Babri Masjid) को ध्वस्त करने आदेश जैसा है." माननीय कोर्ट ने हिंदू पक्ष को जमीन देकर 1934, 1949 और 1992 के दौरान हुए अपराधों को पुरस्कार देने की गलती की है. वह भी ऐसे में जब वह (कोर्ट) स्वयं कह चुका है कि यह कार्य गैरकानूनी थे.

इसमें यह सवाल उठाया गया है कि पांच जजों की बेंच five-judge bench) कैसे हिंदुओं की 1934 में मस्जिद गुंबद ध्वंस की गैरकानूनी वारदात को दर्ज करने के बाद भी फैसला दे सकती है, जिसके बाद 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वंस की घटना घटी.

'हिंदू पक्ष की मौखिक गवाही को दी गई मुस्लिम पक्ष के दस्तावेजी प्रमाणों पर वरीयता'
इस याचिका में कहा गया है, 'कोर्ट ने हिंदू पक्ष को विवादित भूमि का मालिकाना हक देते हुए उन मूल सिद्धांत की आलोचना की है, जिनके मुताबिक कोई भी व्यक्ति गैरकानूनी काम से फायदा नहीं उठा सकता है... एक दागी क्रियाकलाप को सिविल मुकदमे (Civil Suit) में नहीं बनाए रखा जा सकता और न ही इसकी डिक्री की जा की जा सकती है.'

इस याचिका में दावा किया गया है कि मुस्लिम इस विवादित जमीन के हमेशा से एकमात्र कब्जेदार थे लेकिन बेंच ने हिंदुओं की मौखिक गवाही को, उनके (मुस्लिम पक्ष के) दस्तावेजी प्रमाणों के ऊपर वरीयता दी गई. इसमें यह भी जोड़ा गया कि कोर्ट का विश्वास पुरातात्विक साक्ष्य (Archaeological Evidence) और यात्रा वृतांत पर विश्वास भी गलत थे.

हालांकि सुन्नी वक्फ बोर्ड (Sunni Waqf Board) ने कहा था कि यह कोर्ट के फैसले पर कोई पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं करेगा. हालांकि जमीयत उलेमा-ए-हिंद और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कह चुके हैं कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं. दोनों ही संगठनों अलग-अलग वादी के तौर पर इस मामले में पक्षकार थे.

यह भी पढ़ें: अयोध्‍या मामला: मुस्लिम पक्ष का एक धड़ा पहुंचा SC, दाखिल की रिव्‍यू पिटीशन

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