SC का आधार कानून पर सवाल- 'कल को UIDAI डीएनए टेस्‍ट के लिए ब्‍लड सैंपल भी मांग सकता है'

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्‍यक्षता वाली संवैधानिक पीठ के सदस्‍य जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से पूछा कि ऐसा तो नहीं है संसद ने आधार बनाने वाले यूआईडीएआई को ज्‍यादा ही ताकत दे दी है.

भाषा
Updated: April 4, 2018, 11:07 PM IST
SC का आधार कानून पर सवाल- 'कल को UIDAI डीएनए टेस्‍ट के लिए ब्‍लड सैंपल भी मांग सकता है'
(Photo: REUTERS)
भाषा
Updated: April 4, 2018, 11:07 PM IST
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को आधार कानून के काफी खुले होने और सरकार के भविष्‍य में और शारीरिक जानकारियां लेने की छूट पर चिंता जताई. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्‍यक्षता वाली संवैधानिक पीठ के सदस्‍य जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से पूछा कि ऐसा तो नहीं है संसद ने आधार बनाने वाले यूआईडीएआई को ज्‍यादा ही ताकत दे दी है.

आधार कानून के एक नियम जिसमें कहा गया है, 'बायोमीट्रिक सूचना का मतलब है फोटोग्राफ, अंगुलियों के निशान, आंखों की पुतलियों का स्‍कैन या व्‍यवस्‍थापक की ओर से तय की गईं ऐसे ही अन्‍य शारीरिक जानकारियां', की ओर इशारा करते हुए बैंच ने इसे परिभाषित करने को कहा.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, 'कल को यूआईडीएआई कह सकता है कि आपके डीएनए टेस्‍ट करने के लिए खून के नमूने दो. क्‍या यह आधार बनाने वाले यूआईडीएआई को दी गई ज्‍यादा ताकत नहीं है.' इस पर वेणुगोपाल ने जवाब दिया कि वह भविष्‍य को लेकर टिप्‍पणी नहीं कर सकते लेकिन सुप्रीम कोर्ट किसी अन्‍य जरूरत की जांच कर सकता है. उन्‍होंने कहा, 'खून, पेशाब, डीएनए जोड़े जा सकते हैं लेकिन वह कोर्ट की जांच के विषय होंगे जैसे कि अभी कोर्ट जांच रहा है कि अंगुलियों के निशान और आंखों की पुतलियों का स्‍कैन निजता का हनन तो नहीं है.'

उन्‍होंने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि उसने सामाजिक सुरक्षा कार्ड के लिए अंगुलियों के निशान लेने को बरकरार रखा है. हालांकि बैंच ने माना कि यूरोपीय अदालतों का रूख ऐसे मामलों में अमेरिकी अदालतों से अलग रहा है. संविधान पीठ आधार योजना और इससे जुड़े 2016 के कानून की वैधता का परीक्षण कर रही है.

अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने न्यायमूर्ति एके सीकरी, एएम खानविलकर, डीवाई चंद्रचूड़ और अशोक भूषण की सदस्यता वाली पीठ को बताया कि आधार ‘धनशोधन रोकने और सब्सिडी एवं लाभ देने’ का बेहतरीन जरिया है. उन्‍होंने कहा कि ‘विशेषज्ञों द्वारा मंजूर सरकार के नीतिगत निर्णयों की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती.’

काफी लंबी चली सुनवाई में वेणुगोपाल ने विश्व बैंक सहित कई अन्य रिपोर्टों का हवाला दिया और कहा कि उन्होंने माना है कि भारत ने ‘गरीबों में गरीब’ की पहचान के लिए एक कदम उठाया है जिससे सभी के लिए वित्तीय समावेश का लक्ष्य प्राप्त करने में आखिरकार मदद मिलेगी.

वेणुगोपाल ने कहा कि यदि सरकार के हर कदम की न्यायिक समीक्षा होने लगी तो विकास की रफ्तार थम जाएगी. उन्होंने कहा कि ‘अदालतों को तकनीकी विशेषज्ञता के मामलों में दखल नहीं देना चाहिए.’ उन्होंने कहा कि अदालत का एकमात्र कर्तव्य कानून की भाषा की व्याख्या करना है और वह यह तय नहीं कर सकती कि कोई नीतिगत निर्णय उचित है कि नहीं.
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पीठ ने वेणुगोपाल से कहा कि योजना का विरोध कर रहे लोग कहते हैं कि यह आनुपातिकता के सिद्धांत का उल्लंघन है. अटॉर्नी जनरल ने कहा कि आधार योजना साधन एवं लक्ष्य के बीच तार्किक गठजोड़ को दिखाकर आनुपातिकता को संतुष्ट करती है. उन्होंने कहा कि सभी सब्सिडी गरिमा के साथ जीने के अधिकार का हिस्सा हैं और यह निजता के अधिकार पर वरीयता पाएगी. इस मामले में बहस गुरुवार को भी जारी रहेगी.

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