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लंबे समय के सेक्सुअल रिलेशन को क्या शादी के बराबर माना जाए? SC ने केंद्र से मांगी राय

Utkarsh Anand | News18Hindi
Updated: July 2, 2018, 11:02 PM IST
लंबे समय के सेक्सुअल रिलेशन को क्या शादी के बराबर माना जाए? SC ने केंद्र से मांगी राय
प्रतीकात्मक फोटो

कोर्ट ने अपने किसी भी फैसले में यह साफ नहीं किया है कि किसी रिश्ते को शादी के बराबर मानने के लिए उस रिश्ते की तय सीमा क्या होगी?

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क्या लंबे समय से चले आ रहे शारीरिक संबंधों को शादी के बराबर माना जा सकता है? यदि हां तो ऐसे रिश्तों के लिए तय समयसीमा क्या होगी? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से राय मांगी है कि क्या ऐसे रिश्तों को शादी की तरह माना जा सकता है और क्या ऐसे रिश्तों में पुरुष पार्टनर का उत्तरदायित्व तय किया जा सकता है.

जस्टिस आदर्श गोयल और जस्टिस एसए नजीर ने भारत के एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल को एक नोटिस जारी किया है. जजों ने उनसे आग्रह किया है कि इस संबंध में कोर्ट की मदद के लिए वह एक एडिशनल सॉलिसिटर जनरल को नियुक्त करें. कोर्ट ने यह कदम उन मामलों को देखते हुए उठाया है जिनमें लंबे समय तक सेक्सुअल संबंधों में रह चुके जोड़ों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी रहती है.

कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी को इस मामले में एमिकस क्यूरी नियुक्त किया है.



इस बेंच ने पाया कि कई मामलों में देखा गया है कि लंबे समय तक सेक्सुअल रिलेशन में रहने वाले जोड़ों के मामले में पुरुष पार्टनर पर कानूनी रूप से बलात्कार का मामला नहीं चलाया जा सकता है. हालांकि कोर्टे ने कहा कि ऐसे रिश्तों में शादी की तरह की कुछ जिम्मेदारियां तय होनी चाहि.



कोर्ट ने कहा, “लंबे समय तक साथ रहने वाले जोड़ों में भले ही शारीरिक संबंध आपसी सहमति से बनाए गए हों और याचिकाकर्ता पर बलात्कार का दोष नहीं लगाया जा सकता. ऐसे में ऐसे रिश्ते को शादी मानकर क्या याचिकाकर्ता की कानूनी जिम्मेदारी तय की जा सकती है.”

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, “भले ही कोई क्राइम न किया गया हो लेकिन यह ध्यान में रखना होगा कि महिला पार्टनर के साथ शोषण न हो और न ही उसे बिना किसी उपाय के छोड़ दिया जाए.”

इस नोटिस में कहा गया है कि पूर्व के कई फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में घरेलू हिंसा एक्ट, उत्तराधिकार एक्ट के तहत लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं की सहायता की है. लेकिन यह भी पाया है कि ऐसे रिश्तों को कानूनी रूप से मान्यता नहीं है.

कोर्ट ने 2012 में छपे एक आर्टिकल का भी रिफरेंस दिया. इसमें सूप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस एके गांगुली ने लिव-इन रिलेशनशिप और 'शादी जैसे रिश्तों' को लेकर संशय को दूर करने पर जोर दिया था.

इस आर्टिकल में रिटायर्ड जज ने कहा था कि लिव इन रिलेशनशिप और ऐसे रिश्तों को शादी की कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए. इसके साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या देश के पर्सनल लॉ में उन्हें जगह दी जा सकती है.

दूसरी तरफ कोर्ट ने अपने किसी भी फैसले में यह साफ नहीं किया है कि किसी रिश्ते को शादी के बराबर मानने के लिए उस रिश्ते की तय सीमा क्या होगी?

जस्टिस गांगुली ने यह भी कहा था कि ऐसे रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को मेंटेनेंस देने के लिए सीआरपीसी के सेक्शन 125 को लागू किया जाना चाहिए.

यह भी हाईलाइट किया गया था कि उत्तराधिकार, तलाक और लिव इन में रहनेवाले जोड़ों के बच्चों के स्टेटस और अधिकारों को लेकर भी संशय बना हुआ है. उन्हें भी कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट इस मामले में 12 सितंबर को सरकार का पक्ष सुनेगी.

बेंच ने इस संबंध में सरकार की राय जानने का फैसला एक याचिका की सुनवाई के दौरान लिया. इस याचिका में एक व्यक्ति ने खुद पर लगे रेप आरोपों को हटाने की मांग की थी. वह कई सालों तक एक महिला के साथ यौन संबंधों में रहा लेकिन उसने उससे शादी करने से मना कर दिया. महिला ने आरोप लगाया था कि व्यक्ति ने शादी का झांसा देकर उसका शारीरिक शोषण किया.

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First published: July 2, 2018, 11:02 PM IST
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