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न्यूटन, आइंस्टीन, आर्कमडीज को एक भारतीय दे रहा है चुनौती!

सारंग उपाध्याय | News18India.com
Updated: June 30, 2015, 7:49 AM IST
न्यूटन, आइंस्टीन, आर्कमडीज को एक भारतीय दे रहा है चुनौती!
हिमाचल प्रदेश के शिक्षा विभाग में सहायक निदेशक अजय शर्मा का दावा है कि विज्ञान की दुनिया में भगवान कहे जाने वाले न्‍यूटन, आर्कमडीज और आइंस्‍टीन के नियम अधूरे हैं।

हिमाचल प्रदेश के शिक्षा विभाग में सहायक निदेशक अजय शर्मा का दावा है कि विज्ञान की दुनिया में भगवान कहे जाने वाले न्‍यूटन, आर्कमडीज और आइंस्‍टीन के नियम अधूरे हैं।

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नई दिल्‍ली। दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों की बात हो तो आइजक न्यूटन, अल्बर्ट आइंस्टीन और आर्कमडीज जैसे नाम सबसे पहले जुबान पर आते हैं। ये वो वैज्ञानिक हैं जिनके सिद्धांत पढ़ना विज्ञान के छात्र होने की पहली शर्त है लेकिन दुनिया भर में पढ़ाए जाने वाले इन वैज्ञानिकों के सबसे प्रामाणिक सिद्धांतों को मिली है चुनौती। हिमाचल प्रदेश के शिक्षा विभाग में सहायक निदेशक अजय शर्मा का दावा है कि विज्ञान की दुनिया में भगवान कहे जाने वाले न्‍यूटन, आर्कमडीज और आइंस्‍टीन के नियम अधूरे हैं। 2265 साल पुराना आर्कमडीज का सिद्धांत हो, 330 साल पुराने न्‍यूटन के गति के नियम हों या 110 साल पुराना आइंस्‍टीन का E=MC2 समीकरण, अजय शर्मा के मुताबिक इन सब में खामियां हैं और उनका शोध ये बात साबित करता है। दुनिया के कई देशों ने अजय शर्मा की इस चुनौती और शोध को गंभीरता से लिया है लेकिन भारत में उनके दावों को तरजीह देने वाला कोई नहीं। उल्टे उनका विरोध ही किया जा रहा है।

33 साल से लगे हैं शोध में  

2 मार्च 1963 में हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले के बरठी गांव में जन्‍मे अजय शर्मा इस शोध में तकरीबन 33 साल लगा चुके हैं। अजय के मुताबिक जब वे 19 साल के थे और बीएससी. द्वितीय वर्ष के छात्र थे, तभी उनको इस बात का भरोसा हो गया था कि आइंस्टीन के पदार्थ-ऊर्जा समीकरण (E=mc2), व न्यूटन के गति के नियम और आर्कमडीज का सिद्धांत अधूरे हैं। अगर उनमें संशोधन किया जाए तो  वे अधिक उपयोगी हो सकते हैं। शिमला में शिक्षा विभाग के सहनिदेशक शर्मा का दावा है कि शोध में उन्होंने 20 लाख रुपये खर्च किए हैं और उनका यह शोध पूरी तरह पारदर्शी है और वे यह चुनौती पूरी दुनिया में विज्ञान के भगवान कहे जाने वाले वैज्ञानिकों को भारत की ओर से दे रहे हैं।

आर्कमडीज का सिद्धांत और चुनौती



अजय का कहना है कि आर्कमडीज का सिद्धांत है, जब‍ किसी वस्‍तु को पानी में डुबोया जाता है तो उसके भार में कमी आ जाती है, वस्‍तु के भार में आई ये कमी उसके द्वारा हटाए गए पानी के भार के बराबर होती है। अजय का कहना है कि आर्कमडीज के इस सिद्धांत के अनुसार तो पानी या द्रव में गिरने वाली वस्‍तु के संबंध में इसका आकार पूरी तरह महत्‍वहीन हो जाता है। इस नियम के अनुसार वस्‍तु और पानी का घनत्‍व ही महत्‍वपूर्ण है। अजय उदाहरण देते हुए कहते हैं कि मान लीजिए कोई वस्‍तु 5 ग्राम एल्‍यूमिनियम धातु की बनी है और इसके आकार अलग-अलग हैं यानी कि छोटी सी गोली या सपाट प्‍लेट। अब यदि आर्कमडीज के सिद्धांत के मुताबिक यदि पानी में डुबोया जाए तो एल्‍यूमिनियम की छोटी सी गोली और सपाट प्‍लेट को 5 सेकेंड में निर्धारित दूरी तय करनी चाहिए, लेकिन होता विपरीत है। गोली तेजी से नीचे गिरती है जबकि सपाट प्‍लेट धीरे-धीरे। अजय कहते हैं यह सिद्धांत विरो‍धाभासी है। अजय ने इस सिद्धांत में संशो‍धन किया और नया घटक जोड़ा। यह घटक वस्‍तु के आकार की व्‍याख्‍या करता है, लेकिन इसके लिए अजय को कुछ प्रयोगों की जरूरत थी। जिसके लिए उन्‍हें 1998 में सरकार ने पैसे भी दिए, लेकिन कुछ सरकारी अड़चनों से वो शुरू ही नहीं हो पाया। हालांकि इसे समीकरण द्वारा उन्‍होंने अपने शोध पत्रों में विस्‍तार से समझाया है।

न्‍यूटन ने नहीं दिया गति का दूसरा नियम

अजय का दावा है कि न्‍यूटन का दूसरा नियम, न्‍यूटन ने नहीं बल्कि स्‍विट्जरलैंड के वैज्ञानिक लियोनहार्ड यूलर (1703-1783) ने दिया था। लेकिन यह विडंबना ही है कि उनके इस नियम को दुनिया में न्‍यूटन के दूसरे नियम के नाम से पढ़ाया जाता है। अजय का कहना है कि न्‍यूटन के शोध को प्रसिद्ध वैज्ञानिक एडमंड हैली ने अपने खर्चे पर प्रकाशित किया था। न्‍यूटन के यह शोध प्र‍िसिपिया में प्रकाशित हुआ। इस पुस्‍तक का 1727 में लैटिन से अंग्रेजी में अनुवाद आया, तब तक न्‍यूटन की मृत्यु हो चुकी थी। इस पुस्‍तक में न्‍यूटन ने नियमों की परिभाषा के आधार पर कोई समीकरण नहीं दिया। इस तरह देखा जाए तो आज के संदर्भ में न्‍यूटन का काम अधूरा है। कमाल की बात है कि वैज्ञानिकों ने बाद में यूलर के समीकरण को ही न्‍यूटन के गति का दूसरा नियम बना दिया। अजय दावा करते हैं कि न्‍यूटन के दूसरे नियम के अनुसार वस्‍तु की गति में बदलाव, उस पर लगे बल के समानुपात में होता है। इस परिभाषा पर आधारित समीकरण को देखें तो वह है बल=गति में बदलाव=अंतिम वेग-आरंभिक वेग या F-(v-u)  अजय के मुताबिक प्रिसिपिया में दिए गए गति के दूसरे नियम का अनुप्रयोग कहीं नहीं होता और इसे कहीं नहीं पढ़ाया जाता। उनके मुताबिक यूलर ने 1775 में नोवा कारपोरवम रिजिडेरवम डिटरमिनैडी नाम के शोध पत्र में यही नियम दिया था, जिसका समीकरण है F=संहित (m)* त्‍वरण (a)या F=ma। अजय का कहना है कि वैज्ञानिकों से भूल यहां हुई कि उन्‍होंने दोनों समीकरणों के दाएं पक्ष को भी समान मान लिया है। वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिकों को सबसे बड़ा भ्रम हुआ, वह यह है कि प्रिसिपिया में जो न्‍यूटन के गति के दूसरे नियम में वाक्‍यांश है 'गति में बदलाव' जबकि यूलर के नियम में लिखा हुआ है 'गतिमात्रा में बदलाव की दर' अब दिक्‍कत यहां पैदा हुई है कि वैज्ञानिकों ने दोनों ही वाक्‍यांशों को एक माना और यूलर का नियम न्‍यूटन का नियम बन गया। अजय के मुताबिक यूलर का नियम ज्‍यादा व्‍यावहारिक है। पिछले साल जुलाई में ‘द यूलर सोसायटी वॉशिंगटन की तरफ से अजय शर्मा को इस पूरे शोध को व्‍याख्‍यान के रूप प्रस्‍तुत करने के लिए बुलाया गया था। सोसायटी के चेयरमैन प्रो. रोवर्ट ब्रैडली ने इस शोधकार्य को लिखित रूप में सराहा है।

तीसरे नियम को चुनौती

इसी तरह अजय न्‍यूटन के तीसरे नियम को भी चुनौती देते हुए, उसमें सुधार की बात कहते हैं। वे कहते हैं कि न्‍यूटन का तीसरा नियम भी अधूरा है, जिसमें कहा गया है कि प्रत्‍येक क्रिया के विपरीत समान प्रतिक्रिया होती है, या दो वस्‍तुओं पर लगे बल समान और विपरीत दिशा में होते हैं। अजय कहते हैं कि इस नियम को देखा जाए तो नियम का समीकरण ऐसा बनता है। क्रिया=प्रतिक्रिया। न्यूटन ने प्रिसिपिया में अपने तीनों नियमों को समझाने के लिए तीन उदाहरण दिए हैं। अजय का मानना है कि यह तीनों ही उदाहरण गुणात्‍मक हैं, परिमाणात्‍मक नहीं और न ही इसके समीकरण दिए गए हैं।

अल्‍बर्ट आइंस्‍टीन को चुनौती

इसी तरह अजय 21वीं सदी के महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्‍टीन को भी चुनौती देते हैं। वे आइंस्‍टीन के पदार्थ-ऊर्जा-समीकरण E=mc2 पर गहन शोध के बाद कहते हैं, कि इस सिद्धांत के मुताबिक जब कोई मोमबत्‍ती जलती है, तो उसका मास कम हो जाता है, प्रकाश और ऊर्जा निकलती है। अजय के मुताबिक आइंस्‍टीन ने यह समीकरण विशेष परिस्थितियों में प्राप्त किया था। इसका अर्थ यह है कि वस्‍तु से सिर्फ प्रकाश की दो किरणें निकलती हैं। दोनों किरणों में प्रकाश की मात्रा बराबर होती है, और दोनों ही किरणें विपरीत दिशाओं से निकलती हैं। अजय का कहना है कि आइंस्‍टीन का यह शोध पत्र 1905 में जर्मन शोध पत्रिका एनल डर फिजिक में बिना विशेषज्ञों की राय के छपा था। अजय दावा करते हैं कि यदि इन समीकरणों को सभी परिस्थितियों में व्युत्पन्न और व्‍याख्‍या की जाए तो, गलत परिणाम भी सामने आते हैं। अजय आइंस्‍टीन के इसी उदाहरण को सामने रखते हुए कहते हैं कि मान लीजिए मोमबत्‍ती जलती है तो उसका भार बढ़ना चाहिए। अजय कहते हैं कि उनका यह शोधपत्र पूरी वैज्ञानिक छानबीन के साथ छप चुका है। उनके मुताबिक आइंस्‍टीन के नियम की इस खामी के चलते ही उन्‍होंने E=mc2 का विस्‍तार E=Amc2 के रूप में किया है। शर्मा के समीकरण से निकली ऊर्जा की मात्रा E=mc2 के बराबर या कम या ज्‍यादा भी हो सकती है।

अजय शर्मा ने आइंस्‍टीन के रेस्‍ट मास एनर्जी की व्युत्पत्ति में भी गंभीर खामियां गिनाई हैं। अजय के मुताबिक आइंस्‍टीन ने रेस्‍ट मास एनर्जी उस अवस्‍था में निकाली है जब पहला समीकरण शून्‍य होता है। इस तरह बाकी समीकरणों का कोई अस्तित्‍व ही नहीं है। अजय समझाते हुए कहते हैं कि इस तरह आइंस्‍टीन ने बिना इनपुट, जिसमें कि पहला समीकरण ही शून्‍य है, उसके आउट पुट रेस्‍ट मास एनर्जी प्राप्‍त की है और यह पूरी तरह असंभव है। अजय पूरे दावे के साथ आइंस्‍टीन के इस समीकरण को एक उदाहरण के जरिये रद्द करते हुए कहते हैं कि मान लीजिए हमारे पास 10 मंजिला एक बिल्डिंग है, और यदि हम आधार मंजिल यानी कि जिस पर ऊपर की नौ मंजिलें खड़ी हैं, उसे गिरा देते हैं, तो बाकी ऊपर की नौ मंजिलें हवा में तैरनी चाहिए, लेकिन ऐसा असंभव है। इस तरह आइंस्‍टीन की व्युत्पत्ति पूरी तरह आधारहीन है।

झेलना पड़ा विरोध, भारत सरकार से आस  

पिछले 33 साल से इस दिशा में शोध कर रहे अजय शर्मा को अपने पक्ष को रखने के लिए भारत सरकार से ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय वैज्ञानिक समुदाय से एक तरह की उपेक्षा और विरोध झेलना पड़ा। यहां तक कि अपने कॉलेज के शुरुआती दिनों में जब अजय ने इस पर औरों से चर्चा की तो परिणाम बहुत ही खराब थे, इसलिए अजय ने विचारों की चर्चा बंद कर दी और खुद से ही बात करने लगे। इसके बाद अजय ने फैसला कर लिया कि उनकी जिंदगी का मकसद एक ही होगा कि आधारभूत नियमों में संशोधन। हालांकि अजय ने पीएचडी करने का प्रयास किया। उनके दिमाग में थीसिस पहले से ही थी कि आधारभूत नियमों पर शोध करेंगे। लेकिन किसी भी यूनिवर्सिटी प्रोफेसर के जेहन में यह बात ही नहीं थी। वे इन नियमों को बहुत पवित्र मानते थे और संशोधन की बात को पाप। इसी वजह से अजय को अकेले ही चलना पड़ा।

 अमेरिका और यूरोप ने ली सुध

अजय का सबसे बड़ा सहारा इंटरनेट बना। वे इंटरनेट के माध्यम से शोध पत्र यूरोप और अमेरिका के वैज्ञानिकों को भेजते रहे। उत्तर भी आए, लगा कि उनका बौद्धिक स्तर भी हमारी तरह ही है। अजय को अंतरराष्‍ट्रीय कॉन्‍फ्रेंस से पहला निमंत्रण ताईवान से अप्रैल 2002 में आया। उन्होंने ताइपे में शोधपत्र प्रस्तुत किया। उसके बाद आज तक लगभग 90 अंतरराष्‍ट्रीय कॉन्‍फ्रेंस से निमंत्रण आ चुके हैं। वे दो बार अमेरिका में, दो बार इंग्लैंड में शोध प्रस्तुत कर चुके हैं, जबकि आज वे बाउमीन टैक्निकल यूनिवर्सिटी मॉस्‍को में आइंस्‍टीन के नियमों के संशोधन पर व्‍याख्‍यान देंगे। अजय का शोधपत्र फिजिकल इंटरप्रेटेशन और रिलेटिविटी 2015 की कॉन्‍फ्रेंस की प्रोसिडिंग में प्रकाशित होगा। अजय के 55 शोध पत्र अंतरराष्‍ट्रीय शोधपत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। अजय शर्मा की दो पुस्तकें बियॉण्‍ड न्यूटन एंड आर्कमडीज और बियॉण्‍ड आइंस्टीन एंड E=mc2 पूरी जांच पड़ताल के बाद इंग्‍लैंड के कैंब्रिज इंटरनेशनल पब्लिशर्स, कैंब्रिज से प्रकाशित हो चुकी हैं। इन पुस्तकों को अपने खर्च पर प्रकाशक विक्टर रिकैनसकाई ने प्रकाशित किया है।

 भारत सरकार से आस

अजय शर्मा की भारत सरकार से आस है कि उनके काम का पूरे पारदर्शी ढंग से सही मूल्‍यांकन करवाए। वे लिखित तौर पर भारत और दुनिया के हर वैज्ञानिक और विज्ञान विशेषज्ञों के हर प्रश्‍न का उत्‍तर देने के लिए तैयार हैं।

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First published: June 30, 2015, 7:10 AM IST
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