सोहराबुद्दीन शेख केस: कोर्ट ने कहा- नेताओं को फंसाने के लिए गढ़ी गई कहानी

सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले में कोर्ट ने इस मामले में 21 दिसंबर को फैसला सुनाया था, लेकिन लिखित बयान सोमवार को जारी हुआ. सीबीआई जज ने अपने फैसले के आखिर में इस बात पर खेद जताया कि एक गंभीर मामले में किसी को सजा नहीं हो रही है.

Utkarsh Anand | News18Hindi
Updated: January 1, 2019, 10:46 PM IST
सोहराबुद्दीन शेख केस: कोर्ट ने कहा- नेताओं को फंसाने के लिए गढ़ी गई कहानी
सोहराबुद्दीन शेख. (File Photo)
Utkarsh Anand | News18Hindi
Updated: January 1, 2019, 10:46 PM IST
सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले में सीबीआई की स्‍पेशल कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया. कोर्ट ने अपने फैसले में पुलिसवालों की कार्रवाई पर कहा कि अगर उन लोगों ने शेख और उसके साथियों के खिलाफ ऐसा नहीं किया होता तो उन पर काम में लापरवाही का आरोप लगता.

सीबीआई जज एसजे शर्मा ने अपने फैसले में लिखा, 'अगर आरोपी पुलिसकर्मियों ने उन लोगों पर कार्रवाई नहीं की होती, जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामलों में शामिल होने की सूचना थी तो बरी किए गए व्‍यक्तियों पर कर्त्‍तव्‍य में लापरवाही का आरोप लगता.' जज ने कहा कि सभी 21 आरोपी पुलिसकर्मी निर्दोष नजर आते हैं और संभव है कि राजनेताओं को फंसाने की स्क्रिप्‍ट को सही साबित करने के लिए सीबीआई ने अपनी धुन में इन्‍हें फंसा दिया.

जज शर्मा ने आगे कहा कि सभी 21 पुलिसकर्मियों को बरी किया जाना चाहिए, क्‍योंकि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में नाकाम रहा है. साथ ही पुलिसकर्मियों पर केस चलाने के लिए उचित रजामंदी भी नहीं ली गई.

कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारियों को आपराधिक कार्रवाई के नियमों की धारा 197 के तहत लाभ मिलना चाहिए था. इस धारा के तहत सरकारी सेवा में कार्यरत लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करने से पहले संबंधित अधिकारी से अनुमति लेनी होती है. जज ने कहा कि भले ही पुलिसकर्मियों ने अपनी क्षमता से आगे जाकर काम किया, लेकिन केस चलाने से पहले अनुमति जरूरी होती है. बता दें कि राजस्‍थान और गुजरात के कुल 21 पुलिसकर्मी सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में आरोपी थे.

कोर्ट ने इस मामले में 21 दिसंबर को फैसला सुनाया था, लेकिन लिखित बयान सोमवार को जारी हुआ. जज शर्मा ने 358 पन्‍नों का फैसला दिया था. जज ने कहा कि जांचकर्ताओं ने दो लोगों को चश्‍मदीद बताया था, लेकिन वे बयान से पलट गए. ऐसे में पूरा केस परिस्थितिजन्‍य साक्ष्‍यों पर निर्भर था.

कोर्ट ने सबूतों और गवाहों की जांच के बाद पाया कि सीबीआई और सीआईडी क्राइम किसी बड़े षड्यंत्र या पुलिस-राजनेता की साठगांठ को साबित नहीं कर पाई. जज ने कहा कि यह बात साबित नहीं हो पाई कि तुलसीराम, शेख और कौसरबी के साथ एक ही बस में सफर कर रहा था. साथ ही वह किसी घटना का गवाह होने के कारण मारा गया इस बात को भी साबित नहीं किया गया.

सीबीआई जज ने अपने फैसले के आखिर में इस बात पर खेद जताया कि एक गंभीर मामले में किसी को सजा नहीं हो रही है. लेकिन आगे जोड़ा, 'कानून इस बात की अनुमति नहीं देता है कि नैतिक आस्‍था या संदेह के आधार पर कोर्ट किसी को सजा सुनाए.' उन्‍होंने सीबीआई को फटकार लगाते हुए कहा कि वह सच को ढूंढने के बजाय पहले से तय एक थ्‍योरी को साबित करने में लगी हुई थी.

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First published: January 1, 2019, 9:40 PM IST
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