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Opinion: संस्‍कृत के नाम पर बीएचयू में हो रही सांप्रदायिकता सत्‍याग्रह नहीं, दुराग्रह है

Piyush Babele | News18Hindi
Updated: November 20, 2019, 1:00 PM IST
Opinion: संस्‍कृत के नाम पर बीएचयू में हो रही सांप्रदायिकता सत्‍याग्रह नहीं, दुराग्रह है
पिछले कुछ दिन से काशी हिंदू विश्‍वविद्यालय के छात्रों का एक छोटा सा गुट इस बात पर धरने पर बैठा है.

जब भारत आजाद हुआ और हमारा संविधान बना तो हमने संस्‍कृत की उच्‍च और मुक्तिकामी धारा को स्‍वीकार किया और उसमें बाद में पनप आई विसंगत विचारधाराओं का त्‍याग किया. हमारे तो पहले शिक्षा मंत्री एक मुसलमान मौलाना अबुल कलाम आजाद थे. तो क्‍या देश के बहुत से गैर मुस्लिम बच्‍चे IIT और दूसरे शिक्षा संस्‍थानों को इसलिए छोड़ देंगे कि उनकी नींव और कल्‍पना में एक मुसलमान का योगदान था.

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  • Last Updated: November 20, 2019, 1:00 PM IST
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विश्‍वविद्यालय किस लिए होता है- वह होता है मानवता के लिए, वह होता है जाब्‍ते के लिए, वह होता है तर्क के लिए, वह होता है तरक्‍की के लिए, वह होता है विचारों की उड़ान के लिए और अंत में वह होता है सत्‍य की खोज के लिए. विश्‍वविद्यालय का मकसद होता है मानव यात्रा को और ऊंचे उद्देश्‍यों की तरफ ले जाना. अगर विश्‍वविद्यालय अपनी जिम्‍मेदारी ढंग से निभाते हैं तो वे मुल्‍क और अवाम के लिए अच्‍छे हैं. लेकिन अगर पढ़ाई के मंदिर ही तंगख्‍याली और ओछेपन का अड्डा बन जाएं तो मुल्‍क और उसकी अवाम कैसे तरक्‍की करेगी. - जवाहरलाल नेहरू, 13 दिसंबर 1947, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी

पिछले कुछ दिन से काशी हिंदू विश्‍वविद्यालय के छात्रों का एक छोटा सा गुट इस बात पर धरने पर बैठा है कि उन्‍हें संस्‍कृत पढ़ाने के लिए यूनिवर्सिटी ने एक मुस्लिम असिस्‍टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति की है. इन छात्रों का शायद दावा है कि संस्‍कृत में उन्‍हें बहुत सी बातें हिंदू धर्म के बारे में भी पढ़नी हैं, इसलिए कोई विधर्मी उन्‍हें यह शिक्षा कैसे दे सकता है. अगर इस तरह की मांग किसी दूर-दराज के मंदिर में पुजारी के चयन को लेकर उठी होती तो शायद कोई उस पर कान देता, लेकिन यह बात काशी में उठी है, जहां के बारे में कहा जाता है- 'कौपीनम् यत्र कौशेयम तत् काशी कीन मीयते' अर्थात् जहां की लंगोटी भी कोसा के वस्‍त्र के समान हो, उस काशी की महिमा का क्‍या कहना. यह बात उस काशी में उठी है जो कबीरदास और तुलसीदास दोनों की कर्मभूमि रही है.

यह बात उस काशी हिंदू विश्‍वविद्यालय में उठी है, जहां से महात्‍मा गांधी ने 1916 में असल मायने में क्रांति का श्रीगणेश किया था. राजा महाराजाओं से खचाखच भरे बीएचयू की उस सभा की अध्‍यक्षता दरभंगा महाराज कर रहे थे और श्रीमती एनीबेसेंट वहां मौजूद थीं. वहां हिंदुस्‍तान पहली बार मोहनदास कर्मचंद गांधी की क्रांतिकारी तजवीजें सुन रहा था. जहां गांधी ने कहा था कि समाज में भय के लिए कोई जगह नहीं है.


अगर वाइसराय को यहां अपनी सुरक्षा के लिए खुफिया पुलिस और अंगरक्षकों की जरूरत पड़ रही है तो इससे अच्‍छा है कि वे मर ही जाएं. यहीं गांधी ने कहा था कि सिर से पैर तक रत्‍नाभूषणों से लदे भारत के राजा महाराजा इंसानियत पर कलंक हैं. वह क्रांतिकारी अपनी बात कहता रहा और राजा-महाराजा एक एक कर वहां से खिसकते गए. अंतत: वह सभा महात्‍मा गांधी का भाषण खत्‍म किए बिना ही समाप्‍त हो गई. लेकिन पूरी दुनिया ने जान लिया कि महात्‍मा गांधी कैसी आजादी चाहते हैं.

Firoze Khan
फिरोज खान के फेसबुक से ली गई उनकी तस्वीर


क्रांति की उसी भूमि बीएचयू में आज 2019 में इस तरह की सांप्रदायिक बातों का उठना बताता है कि यूनिवर्सिर्टियों के लिए जिस खतरे से जवाहरलाल नेहरू आजादी के तुरंत बाद छात्रों को आगाह कर रहे थे, वह हमारे सिर पर सवार है. ये छात्र संप्रदाय और संस्‍कृति में फर्क करना भूल रहे हैं. ये छात्र बड़ी आसानी से यह भूल रहे हैं कि आज भारत का इतिहास जो हम पढ़ते हैं, उसके मूल संरक्षक वे ग्रंथ हैं जो चीन के यात्रियों फाहयान और ह्वेनसांग ने लिखे. उनकी संस्‍कृति का संरक्षण करने वाले ये यात्री कदापि हिंदू तो नहीं थे. वे भूल रहे हैं कि उनकी मातृभाषा हिंदी को इस रूप तक पहुंचाने में एक नींव की ईंट अमीर खुसरो ने रखी थी. वे यह भी भूल रहे हैं कि जब भक्ति काल अस्‍ताचल को जा रहा था तो रीति काल में एक भक्‍त कवि हुआ, जिसका नाम रसखान था.

इन छात्रों को उस मुगल राजकुमार दारा शिकोह की याद भी नहीं आ रही जो न सिर्फ खुद संस्‍कृत का प्रकांड विद्वान था, बल्कि उसी ने संस्‍कृत के बहुत से ग्रंथों का फारसी में अनुवाद कराके उनमें नए सिरे से प्राण फूंके. इन छात्रों को यह बात भी याद नहीं आ रही कि आधुनिक दुनिया में अगर संस्‍कृत साहित्‍य का ऐसा मान सम्‍मान है, तो उसके पीछे उस जर्मन विद्वान मैक्‍समूलर की साधना है जो कदापि हिंदू तो नहीं था.

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कहीं ऐसा तो नहीं कि ये छात्र संस्‍कृत की वैदिक परंपरा यानी ज्ञान की परंपरा से अज्ञान हैं और पतित हो चुकी पिष्‍टपेषण की परंपरा की जूठन को ढो रहे हों. हां, यही वह जूठन थी जिसने संस्‍कृत की मेधा को एक किनारे लगाकर ज्ञान का ढोंग और आडंबर रचा था. इसी परंपरा ने भारतीय मानस को पतित किया और जात-पांत और अंधविश्‍वासों की अबूझ भूलभुलैया तैयार की. इसी भूल भुलैया से लड़ने के लिए दो हजार साल पहले गौतम बुद्ध और महावीर ने संस्‍कृत का रास्‍ता छोड़कर पाली और प्राकृत जैसी लोकभाषाओं को पकड़ा था. इसी कूपमंडूकता से निकलने के लिए मध्‍यकाल में संतों ने भक्ति आंदोलन चलाया था जो पोंगापंथियों के हाथ में जा फंसी संस्‍कृत के बजाय लोकभाषाओं में था. और इसी तरह की कर्मकांडी संस्‍कृत में जकड़े भगवान राम को जन जन के हृदय में बसाने के लिए खुद संस्‍कृत के उद्भट विद्वान होने हुए भी गोस्‍वामी तुलसीदास ने अवधी में रामचरितमानस की रचना की थी.

जब भारत आजाद हुआ और हमारा संविधान बना तो हमने संस्‍कृत की उच्‍च और मुक्तिकामी धारा को स्‍वीकार किया और उसमें बाद में पनप आई विसंगत विचारधाराओं का त्‍याग किया. हमने सत्‍यमेव जयते और तमसो मा ज्‍योतिर्गमय को अपनाया, लेकिन उन स्‍मृति ग्रंथों को पीछे छोड़ दिया जो वर्णाश्रम व्‍यवस्‍था को बढ़ावा देते थे. हमारा तो पहला शिक्षा मंत्री एक मुसलमान मौलान अबुल कलाम आजाद था. तो क्‍या देश के बहुत से गैर मुसलमान बच्‍चे इसलिए आईआईटी और दूसरे शिक्षा संस्‍थानों को इसलिए छोड़ देंगे कि उनकी नींव और कल्‍पना में एक मुसलमान का योगदान था.

बीएचयू में जो हो रहा है, वह भारत के सबसे पिछड़े मानस का खुला और भौंड़ा प्रदर्शन है. बीएचयू प्रशासन ने अब तक जिस सख्‍ती से छात्रों के इस गुट की बात न मानने का फैसला किया है, वह बहुत सराहनीय है. क्‍योंकि कहीं भूल चूक इनकी मांग को तवज्‍जो दी गई तो उत्‍तर प्रदेश उन हजारों उर्दू शिक्षकों को हटाने की मांग भी उठने लगेगी जो मुसलमान नहीं हैं. यह बात ही अपने आप में बड़ी अशोभनीय है कि कोई व्‍यक्ति 21वीं शताब्‍दी में यह सोचे की भाषा का धर्म से कोई संबंध है. इन छात्रों ने छाप तिलक लगा रखा है, वह बड़ी अच्‍छी बात है, लेकिन उन्‍हें थोड़ी कोशिश करके संस्‍कृत की ज्ञान धारा की छाप भी अपने हृदय पर लगानी चाहिए. क्‍योंकि वे जो कर रहे हैं वह सत्‍याग्रह नहीं, दुराग्रह है.

 

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First published: November 20, 2019, 12:27 PM IST
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