OPINION | इंग्लेण्ड में सेक्सुअल माइग्रेंट की तरह रह रहा है भारतीय राजनेता का यह बेटा

अगर मैं पीछे मुड़कर मुंबई के दिनों को याद करूं तो मैं ईमानदारी से नहीं कह सकता कि समलैंगिकता को वैधता मिलने के बाद भी मेरे जीवन पर कोई असर पड़ता.

भाषा
Updated: September 10, 2018, 7:51 PM IST
OPINION | इंग्लेण्ड में सेक्सुअल माइग्रेंट की तरह रह रहा है भारतीय राजनेता का यह बेटा
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद खुशी मनाते LGBTQ समुदाय के लोग
भाषा
Updated: September 10, 2018, 7:51 PM IST
(जहीर मसानी)

1950 और 60 के दशक में जब मैं बॉम्बे में बड़ा हो रहा था तब मैं सेक्शन 377 और समलैंगिकता पर किसी तरह पर बैन के बारे में पूरी तरह से अनभिज्ञ था. मुझे केवल इतना पता था कि समाज  और बातचीत में यह विषय वर्जित है. जिस जगह पर मेरे माता-पिता रहते थे वहां कम से कम इसे कभी उदारता और सहिष्णुता भरी नजरों से नहीं देखा गया.

मुझे काफी छोटी उम्र शायद छह साल में ही इस बात का आभास हो गया था कि मैं सेक्सुअली और रोमांटिकली अपने पुरुष मित्रों और पैरेट्स सर्कल में हैंडसम 'अंकल्स' की तरफ आकर्षित होता हूं. लेकिन समलैंगिकता को सामाजिक श्रेणी के रूप में खोज करने से पूर्व मैं एक बालप्रौढ़ 15 साल का कॉलेज छात्र था. नॉवेल और कॉलेज के नाटकों के जरिए मुझे इस बारे में पता चला.

15 साल की उम्र में अपने एक साथी छात्र के साथ मेरा पहला प्रेम संबंध बना. आश्चर्यजनक रूप से यह रोमांटिक, सबसे छिपाया हुआ और दुखद रूप से अल्पकालिक था. यह वह वक्त था जब मैंने आत्महत्या का विचार छोड़कर अपनी मां की बात पर विश्वास किया. मेरी मां ने एक क्षण के लिए भी यह नहीं सोचा कि मैं गलत या गुमराह हो सकता हूं. उन्होंने मुझसे पूछा, "तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?" "तुम जो हो उसमें कुछ गलत नहीं है. कई सफल लोग ऐसे हैं." और इसके बाद उन्होंने मेरे पैरेंट्स सर्कल और कई कलाकारों और एक्टर्स के नाम गिनाए. हालांकि उन्होंने इस सीक्रेट को पिता के साथ साझा न करने का सुझाव दिया, हो सकता है कि समाज इसे न समझ पाए.

अगले एक दशक तक, जब तक कि मैं 25 का नहीं हुआ मेरी सेक्सुअलिटी मेरे, मेरी मां और मेरे कुछ करीबी दोस्तों के बीच रहस्य बनी रही. 1970 में लंदन के ऑक्सफोर्ड के मुक्त वातावरण ने मुझे 'बाहर निकलने' में सक्षम बनाया, हालांकि आज के वातावरण जितना नहीं. भारत में मेरी यौन इच्छाएं पूरी होनी असंभव थी इसलिए मैंने यौन प्रवासी के तौर पर इंग्लैण्ड में रहने का फैसला लिया.

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अगर मैं पीछे मुड़कर मुंबई के दिनों को याद करूं तो मैं ईमानदारी से नहीं कह सकता कि समलैंगिकता को वैधता मिलने के बाद भी मेरे जीवन पर कोई असर पड़ता. हां इस कानून की वजह से पुलिस और शारीरिक संबंध बनाने वाले अन्य पुरुषों द्वारा ब्लैकमेल किया जा सकता था, लेकिन मैंने न तो तब और न ही अब ऐसे एक भी मुकदमे के बारे में सुना जो सेक्शन 377 से संबंधित हो. समलैंगिकों के लिए भारत में सबसे बड़ा डर समाज द्वारा उपहास उड़ाए जाने का है.

भारत में सेक्शन 377 को ब्रिटिशकालीन कानून कहकर विरोध किया जा रहा था. लेकिन मैकाले द्वारा तैयार यह कानून न केवल समलैंगिकता के लिए ब्रिटिश दृष्टिकोण दर्शाता है बल्कि हिन्दुओं और मुस्लिम दोनों गहराई से मानते थे कि यह अप्राकृतिक और अनैतिक है और इसे अवैध होना चाहिए.

हिन्दुओं ने इसके लिए मुस्लिमों को दोष दिया, हिन्दू और मुस्लिम दोनों ने इसके लिए पारसियों को जिम्मेदार ठहराया और पारसियों ने इसके लिए मुस्लिमों को जिम्मेदार बताया. औपनिवेशिक काल से पहले शरिया और ब्राह्मणवादी हिन्दु संस्कृति में समलैंगिकता के लिए मौत की सजा थी.

विचार है कि किन्नर और अन्य ट्रांसजेंडर के तथाकथित 'तीसरे जेंडर' के लिए भारतीय सम्मान समलैंगिकता की सहिष्णुता को इंगित करता है, यह विशेष रूप से हास्यास्पद है. इसके बजाय, तीसरे जेंडर की धारणा मुझे अपने जेंडर के आकर्षणकी संभावना की अस्वीकृति देती है.

हां जाहिर है धारा 377 को कभी भी लागू नहीं किया जाना चाहिए था, और इसे बहुत पहले रद्द कर दिया जाना चाहिए था. क्यों, कोई पूछ सकता है, क्या भारतीय व्यवस्थापकों ने यूरोप के त्यागने के बाद लंबे वक्त तक इस औपनिवेशिक कानून को लटकाकर रखा. बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने यह काम किया जो कि धार्मिक प्रतिक्रिया से डरते हैं. अब भी यह निर्णय व्यवस्थापकों के बजाए न्यायपालिका ने लिया है.

भारत को अब भी समलैंगिक उदारवाद के लिए लंबा रास्ता तय करना है जिसने 1960 से 1990 के दशक में यूरोपिय दृष्टिकोण बदल दिया. यह उन आधुनिक और हां, सामाजिक परिवर्तन और यौन मुक्ति के पश्चिमी मॉडल में हैं जिन्हें हमें एक पौराणिक पूर्व औपनिवेशिक अतीत में घूमने की बजाय, आकांक्षा देनी चाहिए.

(जहीर मसानी पूर्व नेता मीनू मसानी के बेटे और इतिहासकार रुस्तम मसानी के पोते हैं. वह दो साथ तक बीबीसी के करेंट अफेयर प्रोड्यूसर रहे और वर्तमान में स्वतंत्र पत्रकार और ब्रॉडकास्टर हैं. लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं.
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