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OPINION: धर्मनिरपेक्षता की अजब रवायत- पंजाब में सिख सीएम पसंद पर देश के हिन्दू पीएम से कष्ट

2011 की जनगणना के मुताबिक पंजाब की 39 प्रतिशत आबादी हिंदू है.(फोटो-@msgpahujaa)

2011 की जनगणना के मुताबिक पंजाब की 39 प्रतिशत आबादी हिंदू है.(फोटो-@msgpahujaa)

पंजाब में नया मुख्यमंत्री चुने जाने वक्त धार्मिक पहचान को उजागर करने वाला ये समूह भारत में तथाकथित 'बहुसंख्यकवाद' को लेकर बहुत ज्यादा शोर मचाता है. उन्हें बहुत पीड़ा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) स्पष्ट और निडर हिंदू हैं.

  • News18India
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    (अभिजीत मजूमदार)

    नई दिल्ली. सेक्युलरिज्म (Secularism) भारत के धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों (Secularism Intelligentsia) के लिए लंबे समय से गोल पोस्ट बदलने का एक मनोरंजक खेल रहा है. ये पाखंड व्यवहार में आकर इतनी कठोर आदत बन गई है कि लगातार सात साल से चुनावी और सांस्कृतिक हार के बाद ये लोग अपनी आदत सुधार पाने में फेल रहे हैं. दरअसल कांग्रेस की वरिष्ठ नेता अंबिका सोनी (Ambika Soni) को पंजाब के मुख्यमंत्री (Punjab CM) पद का ऑफर दिया गया तो उन्होंने इनकार करते हुए कहा कि केवल सिख ही मुख्यमंत्री (Sikh CM) होना चाहिए – जोकि वे राज्य में दबदबा रखते हैं. दलित सिख लीडर चरणजीत सिंह चन्नी (Charanjit Singh Channi) को राज्य का नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया है. हालांकि यह जाट सिख के प्रभाव को कमजोर करता है, लेकिन ‘दलित सिख’ चन्नी के पगड़ी पहने होने के चलते समस्या का समाधान हो जाएगा. धर्मनिरपेक्षता तुरंत मान गई और उसने यह भी नहीं पूछा कि अन्य समुदाय के लोगों को इस पद की आकांक्षा क्यों नहीं रखनी चाहिए. ये समूह भारत में तथाकथित ‘बहुसंख्यकवाद’ को लेकर बहुत ज्यादा शोर मचाता है. उन्हें बहुत पीड़ा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) स्पष्ट और निडर हिंदू हैं.

    बीते सालों से तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने इस नैरेटिव को भी नॉर्मल बना दिया है कि पंजाब का सीएम अनिवार्य तौर पर सिख होना चाहिए क्योंकि पंजाब एक सिख बहुल राज्य है. बावजूद इसके कि राज्य की 39 प्रतिशत आबादी (2011 की जनगणना के मुताबिक) हिंदू है. यही नहीं, जम्मू और कश्मीर का मुख्यमंत्री (जब सूबा को केंद्रशासित प्रदेश नहीं बना था) भी अनिवार्य तौर पर मुस्लिम होना चाहिए क्योंकि स्थानीय आबादी में मुस्लिमों का दबदबा है. वहीं नागालैंड और मिजोरम का मुख्यमंत्री ईसाई होना चाहिए क्योंकि दोनों राज्यों में ईसाईयों की आबादी ज्यादा है.

    उन लोगों ने कभी भी अपनी आवाज या कलम जम्मू और कश्मीर के अल्पसंख्यकों के लिए नहीं उठाई, जिनके लिए भेजा गया करोड़ों रुपया साल दर साल बहुसंख्यक मुस्लिम हड़पते रहे. अविभाजित पंजाब के दो राज्यों (पंजाब और हरियाणा) में बंटवारे के बाद राज्य में कोई भी मुख्यमंत्री हिंदू, ईसाई, जैन या बौद्ध नहीं रहा है. 1966 में रामकिशन अविभाजित पंजाब के आखिरी हिंदू मुख्यमंत्री थे. उसके बाद से हर मुख्यमंत्री जट्ट सिख रहा है.

    दूसरी ओर दलित सिख का विचार विरोधाभासी है. सिख धर्म किसी भी तरह की जाति धर्म को नहीं मानने वाला रहा है. यह सभी से जातियों को छोड़कर सिंह या कौर उपनाम अपनाने का आह्वान करता है. बावजूद इसके सिख धर्म में 25 तरह की जातियां हैं. इनमें सबसे प्रमुख हैं – जाट, खत्री, अरोड़ा, रामगढ़िया, अहलूवालिया, भापस, भत्रास, रायस, सैनी, लोबाना, काम्बोज, रामदसिया, रविदसिया, रहतिया, मझाबी और रनग्रेतास, इनमें आखिरी दो दलित सिख समुदाय की प्रभुत्व वाली शाखाएं हैं. वहीं, जाट सिख, समुदाय की श्रृंखला में सबसे ऊपर रखे जाते हैं.

    सिख धर्म में भीषण भेदभाव भी देखने को मिलता है. यह आर्थिक से लेकर गुरुद्वारे तक फैला है. दलितों को ट्रस्टों से बाहर कर दिया गया है. निचली जातियों के खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी की गई है. इस तरह के विभाजन ने मिशनरी गतिविधि के लिए जमीन तैयार कर दी है. हाल ही में सिख धर्म से ईसाई धर्म में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण की खबरें आई हैं.

    लेकिन ये सब ‘सेक्युलर’ बुद्धिजीवियों या पंजाब की सियासत में कुर्सी पाने के लिए हाथ पैर मार रहे नेताओं को परेशान नहीं करता है. लेकिन वे राष्ट्र को याद दिलाते रहते हैं कि जब तक हिंदू वो नहीं करते हैं, जो हम कर रहे हैं, तब तक घृणा की कोई बात नहीं है.

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