'गोडसेवादी' होने का आरोप लगा हटाये गये सेवाग्राम आश्रम प्रमुख, बोले- 'लगाए गये आरोप झूठे'

'गोडसेवादी' होने का आरोप लगा हटाये गये सेवाग्राम आश्रम प्रमुख, बोले- 'लगाए गये आरोप झूठे'
गोडसेवादी होने का आरोप लगा हटाये गये सेवाग्राम आश्रम के प्रमुख (फोटो- News18)

सेवाग्राम आश्रम (Sevagram Ashram) के इतिहास में यह पहली बार है कि पांच साल का कार्यकाल पूरा करने से पहले इसके अध्यक्ष को हटा दिया गया. अध्यक्ष, प्रभु ने अपने ऊपर लगे आरोपों का खंडन किया और "मौका दिए बिना बुरा व्यवहार किये जाने, अपमानित किये जाने और हटाए जाने" पर अपनी पीड़ा व्यक्त की.

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वर्धा. महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के वर्धा (Wardha) के सेवाग्राम आश्रम (Sevagram Ashram) में आश्रम के अध्यक्ष टी. आर. प्रभु को बिना किसी अवसर के कथित तौर पर "गोडसेवादी" बताकर हटाये जाने से विवाद पैदा हो गया है.

73 साल के प्रभु को सर्व सेवा संघ (Sarva Seva Sangh) के अध्यक्ष महादेव विद्रोही ने 18 मार्च को हटा दिया, जबकि बमुश्किल दो साल पहले उन्होंने खुद प्रभु को संघ के प्रमुख के पद पर नियुक्त किया था. यह संघ, सभी गांधीवादी संस्थानों (Gandhian institution) का सर्वोच्च निकाय है.

प्रभु ने जारी किया प्रेस नोट, कहा- अपमानित किये जाने पर हुई पीड़ा
आश्रम के इतिहास में यह पहली बार है कि पांच साल का कार्यकाल पूरा करने से पहले इसके अध्यक्ष को "हटा दिया गया".



हालांकि, प्रभु ने "इस्तीफा देने" का फैसला किया और 22 मई को अपने कागजात दे दिये. उन्होंने अपने खिलाफ लगे आरोपों का खंडन करते हुए एक प्रेस नोट भी जारी किया और खुद के बचाव का "मौका दिए बिना बुरा व्यवहार किये जाने, अपमानित किये जाने और हटाए जाने" पर अपनी पीड़ा व्यक्त की. उन्होंने यह भी लिखा कि उन्हें ऐसे हटाया जाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ और आश्रम के संविधान के खिलाफ है.



कई ने की फैसले की आलोचना, कई ने किया समर्थन
विद्रोही ने अक्टूबर 2018 में प्रभु के कांग्रेस वर्किंग कमेटी को आश्रम परिसर में अपनी बैठक आयोजित करने की अनुमति देने से इनकार करने और उत्तर प्रदेश में कुछ हिंदू कट्टरपंथियों के गांधी के चित्र पर गोली चलाने के खिलाफ बयान जारी नहीं करने आदि को उनके हटाने की कुछ वजहों में से एक बताया है.

हालांकि, प्रभु के निष्कासन ने गांधीवादियों को विभाजित कर दिया, जिसमें कई लोगों ने उनके निष्कासन के तरीके की आलोचना की. वहीं अन्य लोगों ने इसका समर्थन भी किया.

गांधीवादी लेखक, रवींद्र रुक्मिणी पंढरीनाथ ने कहा, “किसी भी राजनीतिक दल को आश्रम के अंदर अपनी बैठक आयोजित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, इसे गलत नहीं कहा जा सकता. प्रभु उस बैठक में नहीं थे जिसमें उन्हें हटाने का निर्णय लिया गया था. यह गांधीवादी सिद्धांतों के खिलाफ है. अगर कोई मुद्दा था, तो चर्चा होनी चाहिए थी. ”

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First published: May 28, 2020, 12:07 AM IST
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