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7 साल पहले बेंगलुरु में भी हुई थी पुलिस-वकीलों के बीच झड़प, फिर भी रुकी नहीं इस तरह की घटनाएं

D P Satish | News18Hindi
Updated: November 6, 2019, 6:59 PM IST
7 साल पहले बेंगलुरु में भी हुई थी पुलिस-वकीलों के बीच झड़प, फिर भी रुकी नहीं इस तरह की घटनाएं
बेंगलुरु में सात साल पहले पुलिस और वकीलों के बीच संघर्ष की घटना सामने आई थी.

दिल्ली (Delhi) की तरह ही बेंगलुरु (Bengaluru) में भी करीब सात साल पहले पुलिसकर्मियों और वकीलों के बीच जमकर संघर्ष हुआ जिसके चलते अदालत परिसर समेत पूरे शहर में खूब हंगामा हुआ था.

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  • Last Updated: November 6, 2019, 6:59 PM IST
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बेंगलुरु. दिल्ली (Delhi) में पिछले दिनों पुलिस और वकीलों के बीच जो झड़प हुई वैसी ही घटना सात साल पहले बेंगलुरु (Bengaluru) में भी हुई थी. निचली अदालत के वकील और पुलिस के बीच अदालत परिसर और शहर की गलियों में जमकर संघर्ष हुआ था जिसके कारण इस शहर में कई दिनों तक अराजकता की स्थिति रही और जन जीवन ठप हो गया था. दिल्ली की तरह ही बेंगलुरु में भी इस संघर्ष की शुरुआत बहुत ही मामूली बात से हुई थी.

एक ट्रैफिक पुलिसवाले ने तीन वकीलों को विधानसभा भवन विधान सौध के पास रोका जो एक ही मोटरसाइकिल पर सवार होकर जा रहे थे. जब इन वकीलों ने इस पुलिसवाले के साथ जब बदसलूकी करने की कोशिश की तो वह उन्हें एक नजदीक के पुलिस थाने में ले गया और उनपर जुर्माना लगाया. वकीलों ने आरोप लगाया कि थाने ले जाकर उन्हें मारा-पीटा गया.

वकीलों ने लगा दिया था जाम
अगले दिन, गुस्साए वकीलों ने शहर के मध्य हिस्से में सड़कों को अवरुद्ध कर दिया जिसके बाद पुलिस और वकीलों के बीच झड़प शुरू हो गई. स्थानीय कन्नड़ मीडिया विशेषकर टीवी चैनलों ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया और यहां तक कि कुछ वकीलों को गुंडा तक बता दिया. इसके बाद तो वकीलों ने बदला लेने की ठान ली.

दो सप्ताह बाद, बीजेपी के पूर्व मंत्री और माइनिंग माफिया गली जनार्दन रेड्डी को शहर की एक अदालत में सुनवाई के लिए लाया गया. उन्हें हैदराबाद की एक जेल से यहां लाया गया था. इस मौके की कवरेज के लिए भारी संख्या में मीडिया के लोग वहां मौजूद थे.

वहां उस समय मौजूद लोगों का कहना था कि वकीलों ने पत्रकारों पर हमले शुरू कर दिए जिन्होंने अपने लिए बनाइ गई सीमा को पार करके रेड्डी के वहां पहुंचने की घटना को कवर करने के लिए आगे बढ़ गए थे.

पुलिस ने बरसाईं वकीलों पर लाठियां
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पुलिस ने संघर्ष पर उतारू वकीलों पर लाठियां बरसाईं ताकि उन पर काबू पाया जा सके. पर वकीलों ने पुलिस को उतनी ही ताकत से जवाब दिया जिस वजह से दोनों ही पक्षके कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गये.

वकीलों ने पुलिस के एक वाहन को आग के हवाले कर दिया और बहुत सारे वाहनों को नुकसान पहुंचाया. पुलिस को घटनास्थल पर अतिरिक्त बल की तैनाती करनी पड़ी ताकि आग को बुझाया जा सके और अदालत भवन और उसमें मौजूद लोगों की जान बचाई जा सके. इसके बाद तो जैसे सारे बंधन टूट गए. वकीलों ने हड़ताल कर दी और शहर के सभी अदालतों में काम ठप कर दिया और वहां मीडिया और पुलिस को जाने से रोक दिया.

कोर्ट ने दिए जांच के आदेश
कर्नाटक हाईकोर्ट (Karnataka High court) ने इस मामले की जांच के आदेश दिए और पुलिस को अदालत परिसर में प्रवेश नहीं करने का आदेश दिया. इससे वकीलों का साहस और बढ़ा. पुलिस और मीडिया के खिलाफ कई मामले दर्ज कराये गए. मीडिया और पुलिस की अदालत में पैरवी के लिए कोई वकील आगे नहीं आ रहा था. जो लोग पैरवी के लिए सामने आये उन्हें उनके साथी वकीलों ने धमकियां दीं.

एक प्रमुख कन्नड़ दैनिक के सम्पादक के साथ अदालत में बदसलूकी की गई जहां वे सुनवाई के लिए गए थे.

बीजेपी सरकार के मुख्यमंत्री डीवी सदानंद गौड़ा (DV Sadanand Gowda) ने इस मामले की सीआईडी (CID) जांच के आदेश दिए. पर जब वकीलों ने इस रिपोर्ट का विरोध किया और कहा कि सीआईडी जांच भेदभावपूर्ण है, कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले की सीबीआई (CBI) जांच का आदेश दिया.

वकील के खिलाफ नहीं हुई चार्जशीट
कथित रूप से इस अविश्वसनीय जांच के बाद, सीबीआई ने 15-16 पुलिस वाले और लगभग आधे दर्जन मीडियाकर्मियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की. दिलचस्प बात यह थी कि किसी भी वकील के खिलाफ कोई चार्जशीट दाखिल नहीं हुई.

हालांकि, अदालत ने सीबीआई चार्जशीट को मानने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि पुलिसकर्मियों को दंडित करने से पहले उसने सरकार की अनुमति नहीं ली थी.

एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी के अनुसार, यह मामला आज भी अदालत में लंबित है और इस मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है. दुःख की बात यह है कि कर्नाटक आरक्षी बल के कुछ कर्मी जो उस समय ड्यूटी पर तैनात थे, रिटायर होने के बाद उनके खिलाफ इस मामले में चार्जशीट दायर कर दिया गया.

“यह दुर्भाग्यपूर्ण था. जब मैं क़ानून मंत्री था, तो वे हमसे मिले थे. मैंने राज्य मंत्रिमंडल को इन लोगों का कानूनी खर्च उठाने को कहा,” यह कहना था कर्नाटक के पूर्व क़ानून और संसदीय कार्य मंत्री टीबी जयचंद्र का.

बड़े पैमाने पर हुई तोड़फोड़
वहां पर बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ और आगजनी की गई और मीडिया और पुलिस को आतंकित करने की कोशिश की गई. महीनों तक दोनों ही अपने काम के लिए अदालत परिसर में जाने से डरते रहे कि कहीं उन पर हमले न हो जाए.

“गुंडागर्दी की इस घटना ने पुलिस और वकील के बीच विश्वास को समाप्त कर दिया. हम आज भी एक-दूसरे को शक की निगाहों से देखते हैं. अपने ही इस उदाहरण से हम जानते हैं की दिल्ली में भी वकीलों का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है. हम उनके खिलाफ लड़ाई नहीं जीत सकते. यह निश्चित रूप से एक बहुत ही चिंताजनक बात है,” यह कहना है एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी का जो उस समय बेंगुलुरु शहर के पुलिस महकमे में तैनात थे.

मद्रास हाईकोर्ट में भी हुआ था हंगामा
कुछ वर्ष पहले मद्रास हाईकोर्ट में इससे भी बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी जब पुलिस ने वकीलों के चैंबर में प्रवेश किया था ताकि वहाँ के बिगड़े हालात पर वह काबू पा सके.

मद्रास और बेंगलुरु दोनों ही शहरों की घटनाओं पर उस समय देश का ध्यान नहीं गया था जिस तरह इस समय दिल्ली की घटनाओं पर लोगों की गई है. इसके लिए दूरी को छोड़कर और किसको जिम्मेदार ठहराया जा सकता!

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First published: November 6, 2019, 6:59 PM IST
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