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16 साल जेल में बिताए, सुप्रीम कोर्ट में रिहाई का केस आने से पहले हो गई मौत

सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई. (File pic)

सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई. (File pic)

सुप्रीम कोर्ट को इस दौरान इसकी जानकारी नहीं थी कि कोलवाले सेंट्रल जेल में बंद मापारी की मौत 21 दिसंबर, 2020 को ही हो गई थी. मापारी का स्‍ट्रोक आया था और उन्‍हें जेल से अस्‍पताल ले जाया गया लेकिन उन्‍हें बचाया नहीं जा सका.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 22, 2021, 7:38 AM IST
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नई दिल्‍ली. गोवा (Goa) की बारदेज तालुका के रहने वाले शैलेश मापारी पर सितंबर 2004 में उनके दोस्‍त सागर की हत्‍या का दोष सिद्ध हुआ था. इसके बाद मापारी को दो साल बाद उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. सजा के खिलाफ मापारी की ओर से दायर याचिका को बॉम्‍बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने 5 सितंबर 2007 को खारिज कर दिया था. इसके बाद 3 मार्च, 2021 को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की जस्टिस एके कौल और हेमंत गुप्‍ता की पीठ ने मापारी की ओर से हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली स्‍पेशल लीव पिटीशन को भी खारिज कर दिया गया था.

हालांकि इस सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट मापारी के केस में इस बात से हैरान था कि 16 साल से अधिक जेल में बिताने के बाद भी उनके केस को माफी के लिए आगे नहीं भेजा गया था. वैसे तो उम्रकैद का मतलब होता है मौत तक जेल में बंद रहना. लेकिन एक्जिक्‍यूटिव अपने विवेक के अनुसार कैदी की जल्‍दी रिहाई के आदेश दे सकता है. साथ ही कई राज्‍य भी इसके अनुसार ऐसे कैदियों के 14 साल जेल में रहने के बाद उनकी रिहाई पर विचार करते हैं.

नाराज कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यह एक सहायता है जो कि गोवा लीगल सर्विसेज अथॉरिटी की ओर से ही होनी चाहिए. हम इस प्रकार यह निर्देश देने के लिए उपयुक्त मानते हैं कि याचिकाकर्ता के मामले को विचार के लिए रखा जाए. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि सुनवाई की अगली तारीख यानी 19 अप्रैल, 2021 से पहले निर्णय हमारे सामने रखा जाए.



लेकिन सुप्रीम कोर्ट को इस दौरान इसकी जानकारी नहीं थी कि कोलवाले सेंट्रल जेल में बंद मापारी की मौत 21 दिसंबर, 2020 को ही हो गई थी. मापारी का स्‍ट्रोक आया था और उन्‍हें जेल से अस्‍पताल ले जाया गया लेकिन उन्‍हें बचाया नहीं जा सका.
इंडियन एक्‍सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार उत्‍तरी गोवा के बारदेज तालुका के मोईतम गांव में रहने वाले मापारी के भाई उमेश का कहना है कि उनके सामने हमेशा बाधाएं आई हैं. उन्‍होंने कहा, 'बहुत से लोग हमें बताते हैं कि 14 साल जेल में रहने के बाद उम्रकैद के कैदियों को रिहा कर दिया गया. हम उम्मीद कर रहे थे कि वह भी बाहर आ जाएगा. बहुत सारे पैसे वाले लोग भी ऐसे मामलों में संघर्ष करते हैं. हम गरीब हैं और कोई भी हमारी बात नहीं सुनना चाहता.'

सुप्रीम कोर्ट में मापारी का केस लड़ने वाले वकील तिलक राज पासी ने बताया कि उन्हें यह केस सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी (SCLSC) की ओर से मिला था. यह कमेटी गरीब परिवारों के लिए वकील की व्‍यवस्‍था करती है, जो फीस वहन नहीं कर सकते हैं. ऐसे में उन्‍हें भी मापारी की मौत के बारे में जानकारी नहीं थी. उनका कहना है के गोवा स्‍टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी या जेल प्रशासन को उसकी मौत की जानकारी एससीएलएससी को देनी चाहिए थी.
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