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सियासी साजिश या ऐतिहासिक भूल? आखिर कैसे चूर हो गया पीएम बनने का शरद पवार का सपना

राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) की हत्या के बाद कांग्रेस को संभालने वालों में 7 लोगों में शरद पवार (Sharad Pawar) का नाम सबसे ऊपर था. (फाइल)
राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) की हत्या के बाद कांग्रेस को संभालने वालों में 7 लोगों में शरद पवार (Sharad Pawar) का नाम सबसे ऊपर था. (फाइल)

शरद पवार साल 1991 में देश के प्रधानमंत्री बनने के काफी करीब भी आ गए थे. हालांकि, दूसरे नेताओं की राजनीति और पवार के भी कुछ फैसलों ने उन्हें इस सपने से काफी दूर कर दिया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 13, 2020, 2:00 PM IST
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नई दिल्ली. कभी देश की सबसे बड़ी और मजबूत पार्टी कही जाने वाली कांग्रेस (Congress) में आंतरिक कलह जारी है. हालांकि, यह पहली बार नहीं जब पार्टी के अंदर ही सियासी खींचतान दिख रही हो. पार्टी इस दौर से कई बार गुजर चुकी है. साल 1991 में राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) की हत्या के बाद कांग्रेस को संभालने वालों में 7 लोगों का नाम शामिल था. इनमें से शरद पवार (Sharad Pawar) का नाम सबसे ऊपर था. यह बात सच है कि साल 1991 में पवार देश के प्रधानमंत्री बनने के काफी करीब भी आ गए थे. हालांकि, दूसरे नेताओं की राजनीति और पवार के भी कुछ फैसलों ने उन्हें इस सपने से काफी दूर कर दिया था.

कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने सोनिया गांधी को पीएम बनने के लिए चुना, लेकिन उनके मना कर देने के बाद पार्टी के भीतर गहमागहमी तेज हो गई. इस दौरान पवार कैंप काफी सक्रिय हो गया था. डिनर पार्टियां होने लगी थीं. इन पार्टियों के आयोजक थे सुरेश कलमाड़ी. कहा जाता है कि ऐसे दुख के समय में डिनर पार्टियों के आयजनों ने पवार को नुकसान पहुंचाया. उनके पास महज 54 सांसदों का समर्थन रह गया था. इस दौरान उन्होंने अर्जुन सिंह से भी झगड़ा मोल ले लिया. जबकि नरसिम्हा राव (Narsimha Rao) खुद को पीएम उम्मीदवार बताने से परहेज कर रहे थे. वहीं, पवार, अर्जुन, एनडी तिवारी, माधवराव सिंधिया एक दूसरे की संभावनाओं को खत्म करने में व्यस्त थे. खास बात है कि प्रधानमंत्री रहते हुए राजीव गांधी ने भी कई नेताओं की गुंजाइश को खत्म करने में काफी समय खर्च किया था, लेकिन इनमें से कई लीडर अपनी इच्छाओं को जोड़कर फिर तैयार हो रहे थे.

राजीव गांधी की अचानक मृत्य के बाद इनकी आकांक्षाओं ने और जोर पकड़ लिया. महाराष्ट्र से पवार, जिनकी अपने दुश्मनों से भी काम पूरा कराने की आदत थी. फिर नेताओं में नेता माने जाने वाले उत्तर प्रदेश के नारायण दत्त तिवारी थे. मध्य प्रदेश के अर्जुन सिंह को भी उनके सियासी हुनर के लिए जाना जाता था और उन्होंने सीएम रहते हुए कई बार राजीव गांधी की बातों को अनसुना कर दिया. इसकी वजह से गांधी को सरकार में काफी मुश्किल समय भी देखना पड़ा. इनके अलावा कर्नाटक के सीएम वीरेंद्र पाटिल, आंध्र प्रदेश के सीएम एम चन्ना रेड्डी थे. हालांकि, इन नेताओं का सामना करने के लिए राजीव गांधी ने ऐसे नेताओं को ताकतवर जगह दीं, जिनका कोई जनाधार नहीं था. इनमें सरदार बूटा सिंह, एमएल फोतेदार, गुलाम नबी आजाद और जितेंद्र प्रसाद का नाम शामिल था.



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खास बात है कि इस दौरान फोतेदार, प्रसाद, सिंह, आजाद और अन्य लोगों पर आरोप लगाने वाले पवार, राव की बातों में आ गए थे. माना जाता है कि राव ने उनसे कहा था कि भविष्य तुम्हारा है. हालांकि, राव यही बात अर्जुन सिंह को भी कह रहे थे. राव के मंत्रीमंडल में पवार खुशी से रक्षा मंत्री बन गए. 1995 आते- आते पवार के नेतृत्व में काम करने वाली कांग्रेस महाराष्ट्र में हार गई और फिर पवार को पहले वाली ताकत कभी दोबारा वापस नहीं मिल पाई. 1995 के बाद से पवार की छवि एक किंगमेकर की हो गई और कभी भी सीएम के तौर पर वापसी नहीं कर सके. जबकि, उनके सिखाए हुए विलासराव देशमुख, सुशील कुमार शिंदे और पृथ्वीरात च्व्हाण ने यह गद्दी पाने में सफलता हासिल की थी. 1996 के बाद पवार कहीं तस्वीर में भी नहीं थे. 13 दिन की अटल सरकार गिरने के बाद मुलायम सिंह यादव और लालू यादव भी पीएम बनने के सपने देखने लगे थे. इसके बाद गठबंधन की कमान बंगाल सीएम ज्योति बसु को दी गई. हालांकि, वाम दल ने बसु को यह जिम्मेदारी नहीं लेने दी. इसके बाद चंद्रबाबू नायडू और जीके मूनपार की सलाह से चलने वाली यूनाइटेड फ्रंट से कांग्रेस को बाहर रखा गया.

22 मई 1991 में CMC की मीटिंग में अर्जुन सिंह ने सोनिया गांधी के नाम का प्रस्ताव दिया. इसके बाद पवार ने उन्हें हैरानी भरी निगाहों से दखा. दोनों नेता अगल-बगल ही बैठे थे. कहा जाता है कि इस दौरान अर्जुन ने अपने नोटपैड पर लिखा 'वह नहीं करेंगी'. इन बातों की कभी पुष्टि तो नहीं की जा सकती, लेकिन यह जरूर बताती हैं कि राजनीति को कला क्यों समझा जाता है.

देवगौड़ा के नाम को मना किए जाने के बाद कांग्रेस के अध्यक्ष सीताराम केसरी पीएम बनने की तैयारी में नजर आने लगे थे. ऐसा कहा जाता है कि जब राष्ट्रपति केआर नारायण ने उन्हें शपथ ग्रहण के लिए नहीं बुलाया, तो केसरी अपने पुराना किले आवास पर पहुंचे. इस दौरान उनके पॉमेरेनियन डॉग ने स्वागत किया, लेकिन प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि गुस्साए केसरी ने उसे लात मार दी.



पवार के खास माने जाने वाले प्रफुल्ल पटेल की यह बात सच हो सकती है कि जब देवगौड़ा ने कहा था '125 कांग्रेस सांसद पवार के घर पर पहुंच गए थे और उन्हें अपना समर्थन देने के लिए तैयार थे, लेकिन पवार ने कांग्रेस में बंटवारे का कोई कदम नहीं उठाया.' शायद पवार 1991 में हुई अपनी गलती को दोहराना नहीं चाहते थे.

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