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जयंती विशेष: शेख अब्‍दुल्‍ला न होते तो कश्‍मीर को भारत का अभिन्‍न अंग बनाना मुश्किल होता

Piyush Babele | News18Hindi
Updated: December 5, 2019, 6:24 PM IST
जयंती विशेष: शेख अब्‍दुल्‍ला न होते तो कश्‍मीर को भारत का अभिन्‍न अंग बनाना मुश्किल होता
शेख अब्दुल्ला (Sheikh abdullah) शुरू से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress) की धर्मनिरपेक्ष राजनीति से प्रभावित थे और वह विशेष रूप से नेहरू (Jawahar lal nehru)के करीब आते चले गए.

शेख अब्दुल्ला (Sheikh abdullah) शुरू से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress) की धर्मनिरपेक्ष राजनीति से प्रभावित थे और वह विशेष रूप से नेहरू (Jawahar lal nehru)के करीब आते चले गए.

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  • Last Updated: December 5, 2019, 6:24 PM IST
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नेशनल कांफ्रेंस (National Confrence) के संस्‍थापक और जम्‍मू कश्‍मीर के पहले प्रधानमंत्री और पहले मुख्‍यमंत्री रहे शेख मुहम्‍मद अब्‍दुल्‍ला का आज जन्‍मदिन है. आज जब जम्‍मू कश्‍मीर (Jammu and kashmir) का राज्‍य का दर्जा समाप्‍त हो गया है और वह केंद्र शासित प्रदेश बन गया है, तब यह जानना दिलचस्‍प होगा कि इस सीमावर्ती इलाके का भारत में कैसे विलय हुआ था और विलय में शेख अब्‍दुल्ला की कितनी बड़ी भूमिका थी. उनकी पूरी भूमिका देखने से पहले भारत की आजादी के तुरंत बाद किंतु कश्‍मीर का भारत में विलय होने से पहले दिया गया शेख अब्‍दुल्‍ला का एक भाषण देख लीजिए:

29 सितंबर 1947 को प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू (Jawahar lal nehru) के प्रयासों से कश्मीर के राजा हरि सिंह की जेल से आजाद होने के बाद शेख अब्दुल्ला ने एक भाषण में कहा: “पाकिस्तान के नारे में कभी मेरा विश्वास नहीं रहा. फिर भी आज पाकिस्तान एक वास्तविकता है. मैं भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद का अध्यक्ष हूं और उसकी नीति स्पष्ट है. पंडित जवाहरलाल नेहरू मेरे उत्तम मित्र हैं और मुझे गांधीजी के प्रति सच्चा पूज्य भाव है. यह भी सत्य है कि कांग्रेस ने (कश्मीर में लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना के पक्ष में) हमारे आंदोलन की बड़ी मदद की है, परंतु इन सब बातों के बावजूद मेरा निजी विश्वास दोनों में से किसी एक देश के पक्ष में स्वतंत्र निर्णय करने के मार्ग में बाधक नहीं बनेगा. भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का हमारा चुनाव जम्मू और कश्मीर में रहने वाले 40 लाख लोगों की भलाई पर आधारित होगा और यदि हम पाकिस्तान में मिल गए तो भी हम दो राष्ट्रों के सिद्धांत को नहीं मानेंगे. जिसने इतना अधिक जहर फैलाया है.”

शेख अब्दुल्ला का यह बयान महीन कूटनीति से भरा है. वे यह तो मान रहे हैं कि कश्मीर की जनता को भारत या पाक में से एक को चुनने का अधिकार है. लेकिन साथ ही जाहिर कर रहे हैं कि वे गांधी और नेहरू के साथ हैं. इससे बढ़कर वे कह रहे हैं कि दो राष्ट्रों के सिद्धांत में यकीन नहीं है. जिस आदमी को दो राष्ट्र के सिद्धांत में यकीन ही नहीं है, वह इसी सिद्धांत पर बने पाकिस्तान के साथ कैसे जा सकता है.

इसके बाद जब कश्‍मीर पर कबायली हमला हुआ तो कश्‍मीर के राजा के राजा हरि सिंह ने भारत में विलय के प्रस्‍ताव पर दस्‍तखता किए. इस प्रस्‍ताव को कश्‍मीर की जनता की तरफ से शेख अब्‍दुल्‍ला ने स्‍वीकार किया.

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विलय प्रस्‍ताव के बाद महात्‍मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने कहा था कि प्रवचन में कहा:

मेरी सदा यह राय रही है कि सारे ही राज्यों के सच्चे शासक वहां के लोग हैं. कश्मीर के लोगों को किसी बाहरी या भीतरी दबाव अथवा बल प्रदर्शन के बिना इस प्रश्न का निर्णय स्वयं करना होगा. पाकिस्तान सरकार कश्मीर को पाकिस्तान में मिलने के लिए दबाती रही है. इसलिए जब महाराजा ने संकट में फंसकर शेख अब्दुल्ला के समर्थन से संघ में शामिल होना चाहा तो भारतीय गवर्नर जनरल इस प्रस्ताव को अस्वीकार नहीं कर सके. यदि महाराजा अकेले ही भारत के साथ मिलना चाहते, तो मैं उसका समर्थन नहीं कर पाता. परंतु हुआ यह कि महाराजा और शेख अब्दुल्ला दोनों ने जम्मू और कश्मीर के लोगों की तरफ से बोलते हुए ऐसा चाहा था. शेख अब्दुल्ला इसलिए मैदान में आए क्योंकि उनका दावा मुसलमानों का ही नहीं, बल्कि सारे कश्मीर के लोगों का प्रतिनिध होने का है.”इसके बादा मार्च 1948 में संविधान सभा में दिए भाषण में नेहरू कहते हैं:

“हमारे विरोधी कह रहे हैं कि यह हिंदू और मुसलमान का झगड़ा है. हम कश्मीर में अल्पसंख्यक हिंदुओं और सिखों की मदद करने के लिए वहां गए हैं, कश्मीर की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी हमारे साथ नहीं है. इससे ज्यादा सफेद झूठ और क्या हो सकता है. हम वहां कश्मीर के महाराजा के न्योते पर भी नहीं जाते, अगर उस न्योते को वहां की जनता के नेताओं की सहमति हासिल नहीं होती. मैं सदन को यह बताना चाहता हूं कि हमारी सेनाओं ने वहां अदम्य बहादुरी का परिचय दिया है, लेकिन इस सब के बावजूद हमारी सेनाओं को कामयाबी नहीं मिली होती, अगर उन्हें कश्मीर के लोगों की मदद और सहयोग न मिलता.’’

ऊपर दिए गए उद्धरण बताते हैं कि किस तरह शेख अब्‍दुल्‍ला ने उस सांप्रदायिकता से भरे माहौल में मुस्लिम बहुल कश्‍मीर की जनता को भारत के साथ खड़ा कर दिया था और कश्‍मीर के लोग खुशी खुशी भारत के साथ आ गए. लेकिन शेख अब्‍दुल्‍ला के कांग्रेस यानी भारत के करीब आने की कहानी भी कम दिलचस्‍प नहीं है.

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शेख अब्‍दुलला के बारे में नेहरू की बायोग्राफी में फ्रैंक मोरिस कुछ इस तरह बताते हैं: “1929 में लाहौर में हुए कांग्रेस के अधिवेशन से पहले अशिक्षित और दबे-कुचले कश्मीर के लोग राजनीतिक रूप से बहुत जागरूक नहीं थे. नेहरू की अध्यक्षता में हुए इस अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता को अपना का लक्ष्य बताया था. यह पहला मौका था जब कश्मीर में राजनैतिक जागरूकता ने जोर पकड़ा. उस समय 25 साल के बेरोजगार अध्यापक शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर में आजादी के आंदोलन का नेतृत्व शुरू किया. 6 फुट 4 इंच लंबे अब्दुल्ला जल्द ही शेर-ए-कश्मीर के नाम से जाने जाने लगे. वह निडर थे, सीधा और साफ बोलने वाले थे, हालांकि उनके भीतर कहीं एक गहरी कुटिलता और छल था.

1931 में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में कश्मीर में एक छोटा सा प्रदर्शन हुआ, जिसके बाद अब्दुल्ला को कई हफ्तों के लिए जेल में डाल दिया गया. उसके बाद अक्टूबर 1932 में बने अब्दुल्ला के संगठन ‘ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कांफ्रेंस’ ने कई विरोध और विद्रोह किए.

अब्दुल्ला शुरू से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष राजनीति से प्रभावित थे और वह विशेष रूप से नेहरू के करीब आते चले गए. बदले में नेहरू ने भी उनकी राष्ट्रीय सोच की तारीफ की और उसे स्वीकार किया. धीरे-धीरे दोनों व्यक्ति करीबी दोस्त हो गए. नेहरू के इसी दृष्टिकोण से प्रभावित होकर अब्दुल्ला ने जून 1939 में ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कान्फ्रेंस को अपना नाम बदलकर ऑल जम्मू एंड कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस करने के लिए मना लिया. जब अब्दुल्ला अपने संगठन में धर्म विशेष की जगह राष्ट्रवादी बदलाव कर रहे थे, तो उनके संगठन का एक छोटा धड़ा चौधरी गुलाम अब्बास के नेतृत्व में अलग हो गया. और खुद को मुस्लिम कांफ्रेंस ही कहता रहा. इस धड़े ने बाद में पाकिस्तान की हिमायत की, वहीं शेख अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस कांग्रेस के और करीब आ गई.’’

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इसी करीब आने का असर था कि शेख अब्‍दुल्‍ला ने आजादी के तुरंत बाद वह भाषण दिया जिसका ऊपर जिक्र किया गया है. हालांकि बाद में शेख अब्‍दुल्‍ला कश्‍मीर की आजादी के प्रति झुके तो उन्‍हें पंडित नेहरू ने जेल में बंद कर दिया. वे अगले 10 साल तक जेल में रहे. नेहरू जी की मृत्‍यु से ठीक पहले वे जेल से रिहा किए गए और तब तक वे कश्‍मीर की आजादी के बजाय स्‍वायत्‍ता के समर्थक नजर आने लगे थे. नेहरू जी अपने अंतिम दिनों में भारत पाक रिश्‍तों को बेहतर कराने में शेख अब्दुल्ला की मदद चाहते थे. शेख इस काम में जुट भी गए थे. लेकिन 27 मई 1964 को जब वे पाक अधिकृत कश्‍मीर के मुजफ्फराबाद में एक बड़ी रैली को संबोधित कर रहे थे, तभी नेहरू की मृत्‍यु की खबर आ गई. उसके बाद भी वे कश्‍मीर के मुख्‍यमंत्री बने रहे. ​

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First published: December 5, 2019, 5:54 PM IST
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