ANALYSIS: सियासी नक्शे और भारत के दिल से बेदखल हैं अंडमान और लक्षद्वीप!

प्रतीकात्मक तस्वीर.
प्रतीकात्मक तस्वीर.

पर्यटन के नक्शे पर होने के बावजूद अंडमान निकोबार और लक्षद्वीप, इन दो संसदीय क्षेत्रों में हालात ऐसे हैं कि बरसों से देश से अलग थलग आगामी लोकसभा चुनाव के मुद्दे क्या हैं? यह तक समझ पाना आसान नहीं है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 20, 2019, 5:42 PM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने वर्तमान कार्यकाल में सभी राज्यों में 340 दौरे किए और एक राज्य में औसतन वह 11 बार दौरे पर गए लेकिन न्यूज़18 के विश्लेषण के मुताबिक अंडमान निकोबार और लक्षद्वीप का दौरा प्रधानमंत्री ने सिर्फ एक बार किया. प्रधानमंत्री कार्यालय ने मोदी की यात्राओं का जो डेटा जारी किया, उसके मुताबिक साल 2014 से फरवरी 2019 के बीच प्रधानमंत्री इन लोकसभा क्षेत्रों में सिर्फ एक बार गए.

पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षित करने वाले ये दो केंद्रशासित प्रदेश राजनीति के नक्शे पर लगातार उपेक्षा के शिकार हैं. देश की चुनावी राजनीति को लेकर सर्वे करने वाली प्रमुख संस्था सीएसडीएस के डायरेक्टर संजय कुमार का कहना है कि 'हम नहीं कह सकते कि हमने अंडमान निकोबार और लक्षद्वीप को ठीक तरह से जाना समझा है.' इस वाक्य के पीछे न सिर्फ पिछले पांच सालों का बल्कि कई सालों का इतिहास है.

राजनीति की मुख्यधारा में इन दो द्वीपों की लगातार उपेक्षा का नतीजा यह रहा है कि यहां हालात में कोई सुधार और विकास नहीं हुआ. एक तरह से ये दोनों केंद्रशासित प्रदेश देश से अलग-थलग नज़र आते हैं, हालांकि दोनों ही पर्यटन के लिए देश ही नहीं, दुनिया को आकर्षित करते हैं. इन हालात में सवाल ये खड़ा है कि ये दोनों द्वीप इस बार किन मुद्दों पर वोट दें?



आंकड़ों और विश्लेषण के मुताबिक नरेंद्र मोदी ने अंडमान निकोबार द्वीप की जो इकलौती यात्रा की थी, उसका उद्देश्य नीति आयोग की विकास परियोजना के तहत द्वीप पर पर्यटन की संभावनाओं को खोजना और रणनीतिक लाभ लेना रहा था. इससे पहले, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन अपने दस साल के कार्यकाल के दौरान दो बार यहां दौरे पर गए थे और लक्षद्वीप तो वह कभी नहीं गए. एक नज़र इन द्वीपों के राजनीति परिदृश्य पर डालें तो बहुत कुछ साफ नज़र आ सकता है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में केवल एक-एक बार अंडमान और लक्षद्वीप का दौरा किया.


अंडमान निकोबार द्वीप समूह
60 के दशक के अंत से 90 के दशक के अंत तक यहां कांग्रेस का ही परचम लहराता रहा. सात बार लगातार लोकसभा चुनाव में मनोरंजन भक्ता ने जीत हासिल की. इस द्वीप समूह पर करीब 2.7 लाख वोटर 2014 में चिह्नित किए गए थे जिनमें से पिछले लोकसभा चुनाव में 70 फीसदी ने मतदान किया था.

द्वीप के एक पत्रकार और शोधकर्ता ज़ुबेर अहमद कहते हैं कि 'द्वीप के बारे में तकरीबन सभी फैसले गृह मंत्रालय से लिये जाते हैं और ब्यूरोक्रेसी के ज़रिये यहां लागू किए जाते हैं. यही समस्या है कि यहां कोई विधानसभा या विधान परिषद नहीं है.' इन्हीं हालात के चलते दिल्ली और पॉंडिचेरी जैसे केंद्रशासित प्रदेश भी पूर्ण राज्य की मांग उठाते रहे हैं. इस बार यानी 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने इन द्वीपों को राज्य का दर्जा देने का वादा किया है.

बीते 16 मार्च को कांग्रेस ने जो प्रेसनोट जारी किया, उसके मुताबिक आगामी लोकसभा चुनाव के लिए अंडमान निकोबार सीट से कुलदीप राय शर्मा कांग्रेस के उम्मीदवार होंगे, जो 2009 और 2014 में भी प्रत्याशी रह चुके हैं और कुछ ही वोटों से वर्तमान सांसद बिष्णुपदा राय से पीछे रह गए थे. दूसरी ओर, भाजपा ने यहां से अपने उम्मीदवार की घोषणा अभी तक नहीं की है.

द्वीप समूह का वोटिंग कल्चर
इस द्वीप समूह पर आदिवासियों और प्राचीन जनजातियों की रिहाइश रही है. अंडमानी, ओंगे, जारवा और सेंथियाली जनजातियां अंडमान में और निकोबार में मुख्यत: शोंपेन और अन्य जनजातियां हैं. अहमद बताते हैं कि उन्होंने पाया है कि इन जनजातियों में से जारवा और सेंथियाली वोटिंग में हिस्सा नहीं लेते.

अंडमान निकोबार में वोटिंग का इतिहास.


वोटिंग पैटर्न के बारे में बात करते हुए वह बताते हैं कि यहां अस्ल में, प्रमुख वोट बैंक निकोबारी आबादी ही है और उनके वोट ज़्यादातर कांग्रेस के पक्ष में जाते रहे हैं.' अहमद के मुताबिक 2004 और 2009 के चुनावों में भी इनके वोट कांग्रेस को ही मिले थे. वहीं 2014 में भी, ज़्यादातर निकोबारी वोट कांग्रेस के खाते में ही थे.

लक्षद्वीप के हालात
निर्वाचन क्षेत्रों के हिसाब से लक्षद्वीप देश की सबसे छोटी संसदीय सीट रही है. 2011 जनगणना के मुताबिक यहां की 95 फीसदी आबादी अनुसूचित जनजाति यानी एसटी श्रेणी में है. इसलिए यह सीट एसटी के लिए आरक्षित है.

लक्षद्वीप में वोटिंग का इतिहास.


यहां की कुल आबादी में 95 फीसदी मुस्लिम हैं. 1967 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर और बाद में कांग्रेस के साथ मिलकर पी एम सईद यहां से लगातार 10 बार सांसद रहे. 2004 में यहां बदलाव हुआ और सईद को जेडीयू के पूखुनी कोया ने सिर्फ 71 वोटों से मात दी थी. 2009 में, कांग्रेस के हमदुल्ला सईद जीते और 2014 में हमदुल्ला को डेढ़ हज़ार वोटों के अंतर से एनसीपी के फैज़ल ने हराया.

दोनों द्वीप मुख्यधारा से बेदखल
कार्नेगी इंडिया के पिछले साल के अध्ययन के मुताबिक 'यहां इंटरनेट एक्सेस नहीं है, चीज़ों और सेवाओं सहित इन्फ्रास्ट्रक्चर और स्वास्थ्य संंबंधी सुविधाएं न के बराबर हैं'. इस स्टडी में यह भी कहा गया है कि इन हालात के चलते ही यहां के लोग भारत के अन्य इलाकों में विस्थापन के लिए मजबूर हो रहे हैं.

अध्ययनों के हवाले से यह भी कहा जा रहा है कि दोनों ही द्वीप रणनीति के लिहाज़ से महत्वपूर्ण हैं और 'स्ट्रैटजिक आउटपोस्ट' के तौर पर देखे जाते हैं क्योंकि यहां न केवल सामाजिक-आर्थिक लाभ के गणित काम करते हैं बल्कि रक्षा की रणनीति से भी दोनों द्वीपों का महत्व है. फिर भी यहां विकास अब तक नहीं पहुंचा है.

प्रतीकात्मक तस्वीर. फोटो रॉयटर्स.


यहां स्थानीय लोगों के हिसाब से नीतियां न होना भी एक समस्या रहा है. अहमद बताते हैं कि 'नीति आयोग की तमाम नीतियां यहां के बड़े होटलों और रिसॉर्ट को ही ध्यान में रखती हैं, स्थानीय लोगों की भागीदारी और उनके हितों पर किसी का ध्यान नहीं है.'

'हम कभी इन द्वीपों को नहीं जान पाए. हम केवल अंदाज़ा लगा सकते हैं कि चुनाव के लिए यहां क्या मुद्दे होंगे या हो सकते हैं लेकिन असलियत यह है कि भारत के और इलाकों से हालात यहां बहुत अलग हैं.' चुनावों में इन द्वीपों के मुद्दों पर संजय कुमार का यह कहना कठोर लेकिन यथार्थ की बानगी है.

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