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Opinion: सेक्‍युलर या हिंदू राष्‍ट्र- किस तरफ जाएगी शिवसेना!

Piyush Babele | News18Hindi
Updated: November 28, 2019, 12:16 PM IST
Opinion: सेक्‍युलर या हिंदू राष्‍ट्र- किस तरफ जाएगी शिवसेना!
शिवसेना के अध्‍यक्ष उद्धव ठाकरे आज शाम महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेंगे

शिवसेना (Shiv Sena) के विकिपीडिया (Wikipedia) पेज पर जो उथल-पुथल मची है वह यही बता रही है कि पार्टी एक तरफ खुद को राष्‍ट्रवादी कहेगी तो दूसरी तरफ यह दुहराएगी कि भारत के संविधान में उसकी पूरी आस्‍था है.

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  • Last Updated: November 28, 2019, 12:16 PM IST
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नई दिल्ली. शिवसेना के अध्‍यक्ष उद्धव ठाकरे आज शाम महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेंगे, लेकिन उसके पहले ही उनकी पार्टी गंभीर वैचारिक द्वंद्व में फंस गई है. आधिकारिक रूप से भले ही अभी कुछ न हुआ, लेकिन विकिपीडिया पर शिवसेना की विचारधारा को लेकर उलझन बढ़ गई है. शिवसेना के विकिपीडिया पेज पर लंबे समय से यही लिखा हुआ था कि वह हिंदू राष्‍ट्रवादी पार्टी है्. लेकिन जैसे ही एनसीपी और कांग्रेस के साथ शिवसेना का गठबंधन फाइनल हुआ और उद्धव ठाकरे के मुख्‍यमंत्री बनने का दावा पेश किया गया तो पार्टी का विकिपीडिया पेज संशोधित किया गया और उसमें शिवसेना को हिंदू राष्‍ट्रवादी की जगह सेक्‍यूलर पार्टी बताया गया.

यह बदलाव कुछ घंटे तक बना रहा, लेकिन जैसे ही इसको लेकर सवालों का माहौल बना, तो पार्टी का विकिपीडिया पेज एक बार फिर संशोधित किया गया और पार्टी वापस हिंदू राष्‍ट्रवादी पार्टी बन गई. जाहिर है कि विकिपीडिया का पेज किसी पार्टी का आधिकारिक प्‍लेटफार्म नहीं होता और इसे पार्टी की आधिकारिक राय नहीं माना जा सकता. लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इंटरनेट के जमाने में विकिपीडिया किसी का भी परिचय हासिल करने का पहला और बड़ा माध्‍यम बन गया है.

Shiv Sena Wikipedia
शिवसेना के विकिपीडिया पेज पर हिन्दु नेशनलिस्ट पार्टी लिखा था, जिसमें बुधवार तड़के बदलकर सेक्युलर पार्टी कर दिया गया था.


हिंदू राष्‍ट्र और सेक्‍यूलर राष्‍ट्र एक ऐसी फांस है जिस पर शिवसेना को आगे भी फंसाने की कोशिश की जाएगी. दरअसल बाला साहब ठाकरे ने जब 1966 में शिवसेना की स्‍थापना की तब से ही यह पार्टी वैचारिक मुद्दों के बजाय अस्मिताओं की लड़ाई लड़ती रही है. बाल ठाकरे एक बहुत अच्‍छे काटूनिस्‍ट थे और निजी जीवन में उन्‍हें खुली तबीयत का आदमी कहा जा सकता है. लेकिन उस जमाने की सर्वशक्तिमान कांग्रेस से निपटने के लिए बाल ठाकरे ने एक तरफ महाराष्‍ट्र का गौरव और दूसरी तरफ हिंदू राष्‍ट्रवाद को पार्टी का मुख्‍य अंग बनाया.

इनमें से पहली नीति यानी महाराष्‍ट्र गौरव या मराठी मानुस की नीति यहां तक गई कि कई बार शिवसेना ने मुंबई में रह रहे उत्‍तर भारतीयों या हिंदीभाषियों को निशाना बनाया. हिंदीभाषियों की पिटाई करने का मामला ऐसा था कि जिस पर भाजपा या कांग्रेस दोनों ही दल शिवसेना का समर्थन नहीं कर सकते थे. कुछ साल पहले तक विशुद्ध रूप से उत्‍तर भारत की पार्टी बने रहने के बावजूद भाजपा ने शिवसेना के साथ गठबंधन बनाए रखा. यही नहीं पार्टी ने बड़ी खूबसूरती से उत्‍तर भारतीयों के प्रति शिवसेना के रुख को उत्‍तर भारत में इस तरह मैनेज किया कि भाजपा को उत्‍तर भारत में इसका कोई खामियाजा नहीं उठाना पड़ा.

अब तब शिवसेना एनसीपी और कांग्रेस के साथ सरकार बना रही है तो कांग्रेस के साथ में उसे एक कदम और आगे बढ़ना है. भाजपा को शिवसेना के हिंदीभाषी विरोध से दिक्‍कत थी, तो कांग्रेस को हिंदीभाषी के साथ ही हिंदू राष्‍ट्र से भी दिक्‍कत आएगी. इसी बात को समझते हुए भाजपा के प्रवक्‍ता टीवी डिबेट में बार-बार वे बातें उठाकर शिवसेना को घेर रहे हैं जिनमें बाल ठाकरे ने कांग्रेस के बारे में हर किस्‍म की बातें की थीं.

इस नए हमले की काट के लिए शपथग्रहण से पहले शिवसेना ने वे तस्‍वीरें अपने तहखाने से निकाली हैं, जिनमें बाल ठाकरे इंदिरा गांधी के साथ बड़ी सौहार्दपूर्ण बातचीत करते नजर आ रहे हैं. पार्टी ने वे तस्‍वीरें भी खोज निकाली हैं, जिनमें बाल ठाकरे और शरद पवार हंसते बतियाते नजर आ रहे हैं. इसी तरह एनसीपी और कांग्रेस ने भी यह कहना शुरू कर दिया है कि वही शिवसेना की सच्‍चे हितैषी हैं. दोनों पार्टियों के प्रवक्‍ता तर्क दे रहे हैं कि भाजपा ने बाल ठाकरे के परिवार का इस्‍तेमाल किया, लेकिन उनके बेटे को कुर्सी तक नहीं पहुंचने दिया. अब ये दोनों पार्टियां उद्धव ठाकरे को मुख्‍यमंत्री बनाकर बाल ठाकरे को सच्‍ची श्रद्धांजलि दे रही हैं.
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जाहिर है कि तीनों पार्टियां शिवसेना के बारे में वे बातें निकालकर ला रही हैं जो अंधे के हाथी की तरह हैं, लेकिन हैं हर पार्टी के सुभीते वालीं. शिवसेना को भी इन सब बातों का अंदाजा है इसलिए पार्टी हर विषय पर मध्‍यमार्गी बात करने लगी है.

यह सत्‍ता का दबाव हो या राजधर्म, लेकिन अगर कोई कट्टर पार्टी मध्‍यमार्ग की तरफ आ रही है तो यह राजनीति के लिए अच्‍छा ही है. जैसे अब उम्‍मीद की जा सकती है कि शिवसेना कम से कम अपनी तरफ से मुंबई में ऐसा कोई आंदोलन नहीं चलाएगी जो उत्‍तर भारतीयों को निशाना बनाएगा. वीर सावरकर को भारत रत्‍न देने के मुद्दे पर बहुत संभव है कि पार्टी पहले तो ऐसे सवालों से किनारा करे या दबी जबान में इसका समर्थन करे. पार्टी के विकिपीडिया पेज पर जो उथल-पुथल मची है वह यही बता रही है कि पार्टी एक तरफ खुद को राष्‍ट्रवादी कहेगी तो दूसरी तरफ यह दुहराएगी कि भारत के संविधान में उसकी पूरी आस्‍था है. यह तकरीबन वही लाइन होगी जो भाजपा लंबे समय से अपनी राजनीति में लेती रही है. आखिरकार भाजपा की स्‍थापना का मूल सिद्धांत गांधीवादी समाजवाद बताया गया था, जबकि पार्टी हमेशा हिंदुत्‍व के मुद्दे पर चलती रही. भाजपा की तरह ही शिवसेना का यह द्वंद्व भी लगातार बढ़ता जाएगा. इससे बचने के लिए जल्‍द ही पार्टी कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की ढाल का इस्‍तेमाल कर सकती है.

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First published: November 28, 2019, 12:06 PM IST
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