शिवसेना को कांग्रेस के साथ गठबंधन की कीमत चुकानी पड़ेगी : नितिन गडकरी

शिवसेना को कांग्रेस के साथ गठबंधन की कीमत चुकानी पड़ेगी : नितिन गडकरी
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी

गडकरी ने कहा, 'चुनाव के पहले जो पार्टी आपस में गठबंधन करती हैं और चुनाव जीतने के बाद उसे छोड़कर दूसरी पार्टी के साथ चली जाती है यह सिद्धांतों के आधार पर सही बात नहीं है और लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है.'

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 5, 2019, 3:49 PM IST
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रांची. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी (Nitin Gadkari) ने दावा किया है कि महाराष्ट्र में शिवसेना और कांग्रेस के बीच गठबंधन की सरकार ज़्यादा दिनों तक नहीं चल पाएगी. साथ ही उन्होंने कहा है कि आने वाले दिनों में शिवसेना को इस गठबंधन की कीमत चुकानी पड़ेगी. न्यूज़18 के संवाददाता अमिताभ सिन्हा ने नितिन गडकरी से महाराष्ट्र से लेकर झारखंड हर जगह के चुनावी मुद्दे पर खास बातचीत की. पेश हैं इस बातचीत के मुख्य अंश...

क्या झारखंड में आपकी पार्टी को खतरा है?
मुझे नहीं लगता क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में आज तक के इतिहास की सबसे अच्छी सरकार झारखंड को दी है. साथ ही झारखंड विकास की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है. जनता विकास चाहती है और रघुवर दास जी के नेतृत्व में बीजेपी की निश्चित रूप से जीत होगी ऐसा मेरा विश्वास है.

झारखंड में सड़क निर्माण
जब से झारखंड का निर्माण हुआ है जितने एनएच नहीं थे उससे ज्यादा एनएच हमने दिए और झारखंड में सड़क के हिसाब से बहुत विकास हुआ है.



महाराष्ट्र में सभी पार्टियों का भाजपा के खिलाफ एक साथ आना
चुनाव के पहले जो पार्टी आपस में गठबंधन करती हैं और चुनाव जीतने के बाद उसे छोड़कर दूसरी पार्टी के साथ चली जाती है यह सिद्धांतों के आधार पर सही बात नहीं है और लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं क्योंकि शिवसेना ने वोट मांगे थे कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के खिलाफ. महाराष्ट्र में शिवसेना और बीजेपी को मिलाकर वोट मिले और ऐसे समय में सिर्फ मुख्यमंत्री पद के लिए बीजेपी का साथ छोड़ना कभी भी लोग पसंद नहीं करेंगे. दूसरी बात स्वर्गीय बाला साहब ठाकरे का जो हिंदुत्व था जिसे शिवसेना कहती थी वो हमारे लिए सर्वोपरि है उसे तो कांग्रेस-एनसीपी मानती नहीं है. यह गठजोड़ किसी सिद्धांत पर नहीं है. यह टिकेगा नहीं, क्योंकि यह अवसरवादी गठबंधन है. महाराष्ट्र की जनता के साथ धोखा हुआ है. जनता ने कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस को नकारा था और भाजपा-शिवसेना को जिताया था. यह वोट कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के खिलाफ था. शिवसेना ने सिद्धांतहीनता दिखाई और उन्होंने कांग्रेस के साथ एलायंस किया. इसकी कीमत शिवसेना को भी चुकानी पड़ेगी. मेरा मानना है कि महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना का गठबंधन महाराष्ट्र के लिए, मराठी के लिए और हिंदुत्व के लिए है और दुर्भाग्य से यह हो नहीं पाया. जो कुछ हुआ वह अच्छा नहीं हुआ.

अर्थव्यवस्था पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
कभी कुछ समस्याएं ग्लोबल इकोनॉमी के कारण होती हैं. कुछ समस्याएं डिमांड एंड सप्लाई के कारण होती हैं और कुछ समस्या ऐसी होती हैं जो बिजनेस साइकिल के कारण होती हैं. मुझे लगता है कि हिंदुस्तान की इकोनॉमी फास्टेस्ट ग्रोइंग इकोनामी ऑफ द वर्ल्ड है और मुझे लगता है 2030 तक विश्व की तीसरी बड़ी इकोनॉमी बनने की हम ताकत भी रखते हैं और उसके लिए काम भी कर रहे हैं. इस समय के अप्स एंड डाउन है, यह बदलेगा और हम निश्चित रूप से आगे जाएंगे.

चुनाव में राम मंदिर और धारा 370 का मुद्दा?
मैं मानता हूं 370 या राम मंदिर के मुद्दे पर राजनीति से ऊपर उठकर सोचना चाहिए. यह राष्ट्रहित के मुद्दे हैं हमारे देश में एक ही प्रधान हो एक ही विधान हो एक ही निशान हो. यह अलग-अलग नहीं हो सकता और इसलिए देश की जनता की आशा और आकांक्षा थी कि 370 हटना चाहिए. आपने देखा होगा कि जब ये हटा तो लोगों ने खुशी मनाई और हमारी सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि है. वहीं बात राम मंदिर की तो हम दोनों मुद्दों को कभी भी राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाना चाहते थे. यह देश की अस्मिता का मुद्दा है और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद वहां भव्य राम मंदिर का निर्माण हो इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए. हम यही चाहते हैं कि भव्य राम मंदिर के लिए सब लोग सहयोग करें ताकि दुनिया के इतिहास में हम सब कह सकें कि यह हम सबका है. क्योंकि राम किसी संप्रदाय और किसी धर्म के नहीं राम समस्त भारतीयों के हैं और उसी रूप में उन्हें स्वीकारना चाहिए'.

क्या बीजेपी स्थानीय मुद्दों को अनदेखा कर रही है?
मुझे लगता है कि चुनाव के नतीजों के बाद कौन से मुद्दे चले और कौन से मुद्दे नहीं चले इसका जल्दी मूल्यांकन होता है जो सही नहीं है. चुनाव में जिले के हिसाब से, राज्य के हिसाब से अलग-अलग विषय होते हैं. एक बात जरूर है कि राज्य सरकार की परीक्षा विधानसभा के चुनाव में होती है इसमें राष्ट्रीय मुद्दे नहीं होते. राज्य सरकार अगर बहुमत लेकर आती है तो स्वाभाविक रूप से यही कहा जाता है कि लोगों ने उसे सपोर्ट किया है. कभी-कभी हमारे वोट बढ़े हैं फिर भी हम चुनाव हारे इसका कारण अब जो ट्रेंड है बीजेपी के विरोध में सब एक हो रहे हैं. उनके सिद्धांत आपस में मेल नहीं खाते हैं. वह आपस में एक दूसरे को देखकर हंसते नहीं है. केवल बीजेपी का विरोध या मोदी जी का विरोध करने के लिए ये लोग इकट्ठा हो रहे हैं. हम भी अपनी ताकत बढ़ाएंगे और वैचारिक विरोध के बावजूद हम चुनाव जीतेंगे.

क्या हरियाणा में जो घटनाक्रम हुआ है उसका असर झारखंड में हुआ?
मुझे नहीं लगता झारखंड के चुनाव के विषय अलग हैं और महाराष्ट्र के अलग थे. झारखंड की पार्टियां अलग हैं, महाराष्ट्र की पार्टी अलग थी. मैं यह मानता हूं कि रघुवर दास जी के नेतृत्व में झारखंड जैसे पिछड़े राज्य में जो काम भारत सरकार और राज्य सरकार ने किए हैं कोई भी चुनाव का मुद्दा बनेगा. जो काम आज तक नहीं हुआ निश्चित रूप से उन्होंने किया है और जनता निश्चित रूप से रघुवर दास जी का समर्थन करेगी.

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