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शादी से बाहर संबंध रखने पर महिला भी अपराधी? SC करेगा समीक्षा

शादी से बाहर संबंध रखने पर महिला भी अपराधी? SC करेगा समीक्षा

सुप्रीम कोर्ट (Image: Network18 Creatives)

सुप्रीम कोर्ट (Image: Network18 Creatives)

शादी के बाहर संबंध रखने से जुड़े कानून में हमेशा महिलाओं को पीड़िता के तौर पर लेकर उन्हें संरक्षण दिया जाता है. फिलहाल इस प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट जांच कर रहा है.

    शादी के बाहर संबंध रखने से जुड़े कानून में हमेशा महिलाओं को पीड़िता के तौर पर लेकर उन्हें संरक्षण दिया जाता है. फिलहाल इस प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट जांच कर रहा है.

    मुख्य न्यायाधीश दीपक मिसरा की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने पूछा कि व्याभिचार के मामले में कैसे कोई कानून महिलाओं को हमेशा पीड़िता मानकर उनका संरक्षण कर सकता है? कोर्ट ने कहा कि क्या ये कानून भेदभावपूर्ण और लैंगिक पूर्वाग्रह से भरा हुआ नहीं है? ये कहकर कि अगर महिला का पति मंजूरी देता तो महिला की ओर से ये अपराध नहीं किया जाता, क्या ये कानून महिलाओं को संपत्ति या गुलाम के तौर पर नहीं देखता?

    धारा 497 को चुनौती देने वाले पीआईएल ने कोर्ट के सामने कई सवाल उठाए-
    - क्या किसी रिश्ते में केवल पुरुष ही प्रेरक हो सकता है?
    - क्या एक महिला शादी से बाहर संबंध रखने में असमर्थ है?
    - क्या दूसरे की पत्नी से शारीरिक संबंध रखने पर केवल पुरुष ही जेल का भागी है?
    - क्या अगर पति अपनी पत्नी को शादी के बाहर संबंध रखने की इजाज़त देता है तो फिर प्रेमी को दोषमुक्त माना जाए?

    150 साल पुराने इस कानून की वैधता के खिलाफ उठाए गए सवालों के साथ ही सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को भारतीय दंड संहिता की धारा 497 की जांच करने के लिए सहमत हो गया.

    आईपीसी धारा 497 के अनुसार किसी महिला से अगर गैर पुरुष शारीरिक संबंध बनाता है तो वो उस पर व्याभिचार का मामला चलता है और पुरुष को पांच साल तक कि सजा हो सकती है, लेकिन संबंध बनाने वाली महिला के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता.

    चीफ जस्टिस मिसरा की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार को इस कानूनी प्रावधान की वैधता पर नोटिस जारी करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया ये कानून काफी पुराना है और महिलाओं को पुरुषों के बराबर नहीं मानता.

    न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और डी वाई चंद्रचूड़ की सदस्यता वाली पीठ ने कहा कि धारा 497 सभी परिस्थितियों में महिलाओं को पीड़ित मानता है और केवल पुरुषों को कार्यवाही का ज़िम्मेदार माना जाता है.

    बता दें केरल निवासी जोसेफ शाइन नाम के व्यक्ति ने इस कानून को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की थी. याचिका में कहा गया कि आईपीसी का ये प्रावधान लैंगिक समानता के बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ है और इसे रद्द किया जाना चाहिए.

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    Tags: Supreme Court

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