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क्या सेना में महिलाओं को 'कॉम्बैट रोल' देना सही होगा, भारत के पहले अमेरिका की भी थी यही चिंता

प्रतीकात्मक तस्वीर
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दरअसल, 1997 की शुरुआत में एक स्टडी में पाया गया कि सेना में महिलाओं शामिल करने की वजह से जवानों में आत्मविश्वास बढ़ेगा.

  • News18.com
  • Last Updated: December 19, 2018, 2:45 PM IST
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(अनिरुद्ध घोषाल)

क्या महिलाओं को सेना में 'कॉम्बैट रोल' दिया जाना चाहिए. भारतीय सेना की तरह ही अमेरिकी सेना को भी  साल 2015 के पहले ऐसी ही चिंता थी. पर अमेरिका ने इस चिंता को खत्म करने के लिए स्टडी शुरू किया.

इससे पहले जनरल बिपिन रावत ने सीएनएन-न्यूज़ 18 को दिए गए एक इंटरव्यू में कहा था कि भारत अभी महिलाओं को कॉम्बैट रोल में देखने के लिए तैयार नहीं है. रावत ने कहा था कि महिलाओं की ज़िम्मेदारी मां के रूप में है और उनको छह महीने का मातृत्व अवकाश देना भी मुश्किल है. उन्होंने ये भी कहा कि महिलाओं सैनिकों पर ताकझांक करने का भी आरोप लगा सकती हैं.



अमेरिका को भी महिलाओं को कॉम्बैट रोल में भर्ती करने के पहले इसी तरह की चिंता थी. अमेरिका के अलावा डेनमार्क, एस्टोनिया, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी और इज़रायल ने भी इस मामले में समस्याओं को खत्म किया है.
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साल 2013 में जब अमेरिकी सेना ने महिलाओं को कॉम्बैट रोल के लिए भर्ती करने की सोची तो उसके बाद उसने कई रिसर्च किए और फैसला लिया कि महिलाओं को सेना में कॉम्बैट रोल के लिए भर्ती करना चाहिए. लेकिन इस रिपोर्ट में कहा गया कि महिलाओं को कॉम्बैट रोल में शामिल करने के लिए इन बातों का ध्यान रखना चाहिए कि जो नियम बने हैं उन्हें नियमित तौर पर लागू करें, अनुशासनहीनता और गैर-प्रोफेशनल व्यवहार को बदलने को बदला जाए और महिलाओं का यौन शोषण न हो इस बात को सुनिश्चित किया जा सके.

भारत की तरह अमेरिका को पता था कि इसमें मुश्किलें आएंगी. लेकिन अमेरिकी जेंडर इंटिग्रिटी की पॉलिसी भारत की नीतियों से थोड़ा अलग है. रावत ने कहा था कि अधिकतर जवान गांवों से आते हैं इसलिए दिक्कत होगी. जबकि अमेरिका ने 'लीडर्स फर्स्ट' एप्रोच को अपनाया. विचार यह था कि जूनियर अधिकारियों के पहले महिला अधिकारियों को कॉम्बैट रोल में लाया जाएगा.

इसके अलावा अमेरिकी सेना की एक और योजना है जिसके अनुसार वह जेंडर न्यूट्रल टेस्टिंग और ट्रेनिंग शुरू करेगी. ताकि इस चिंता को भी खत्म किया जा सके कि महिलाओं के लिए कठिन ट्रेनिंग नहीं होती है. यौन शोषण से जुड़ी जो दूसरी चिंता थी कि जवान ताकझांक करेंगे. इस डर को खत्म करने के लिए स्टडी में कहा गया है कि इसके लिए जवानों को शिक्षित और जागरुक करने की ज़रूरत है और महिलाओं व पुरुषों को अलग-अलग रखने के बजाय उन्हें साथ-साथ काम करने का मौका देना चाहिए.

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दरअसल, 1997 की शुरुआत में एक स्टडी में पाया गया कि सेना में महिलाओं शामिल करने की वजह से जवानों में आत्मविश्वास बढ़ेगा. जेंडर इंटीग्रेशन की वजह से नैतिक रूप से कुछ सकारात्मक प्रभाव होंगे. कुछ पुरुषों ने ये भी बताया कि पुरुषों की तुलना में वो महिलाओं ज़्यादा अच्छे तरीके से अपनी तनाव व चिंताओं के बारे में चर्चा कर सकते हैं, जिसकी वजह से उनके द्वारा अधिक शराब पीने और झगड़े में भी कमी आएगी.
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