Opinion : मोदी सरकार की नीतियों में दिखता है श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों का अक्स

श्यामा प्रसाद मुखर्जी काफी दूरदर्शी थे, इसकी झलक उनके उन फैसलों में भी दिखाई पड़ती है, जिसका आगे चलकर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक शक्ति में बड़ा योगदान रहा.

Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor | News18Hindi
Updated: August 8, 2019, 4:12 PM IST
Opinion : मोदी सरकार की नीतियों में दिखता है श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों का अक्स
मोदी सरकार की नीतियों में दिखता है श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों का अक्स
Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor
Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor | News18Hindi
Updated: August 8, 2019, 4:12 PM IST
आज देश में एक ऐसी सरकार है जो पूरी तरीके से श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों पर चलने की बात करती है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी. ये दल 1980 में बीजेपी के तौर पर अपने नए अवतार में आया. लेकिन वो भी दिन थे जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों के साथ सहमत होने वाले गिने चुने लोग थे. आज वो दिन है जब सरकार में शामिल तमाम लोग श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बताए हुए रास्ते पर चलने की बात करते हैं और उसी के मुताबिक अपनी नीतियां बनाते हैं. जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट में श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जगह कैसे मिली थी? क्या यह सिर्फ समाजवादी और साम्यवादी सोच रखने वाले नेहरू की उदारता थी जो उन्होंने हिंदुत्व और राष्ट्रवादी विचारों से ओतप्रोत श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपने कैबिनेट में जगह दी थी या सच्चाई कुछ और थी?

6 जुलाई 1901 को कोलकाता में जन्मे श्यामा प्रसाद मुखर्जी के कैबिनेट में शामिल होने की कहानी खास है. 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ, उस समय हालात जुदा थे, कौन कैबिनेट का सदस्य बने, ये तय करना अकेले नेहरू के हाथ में नहीं था बल्कि उस कैबिनेट पर महात्मा गांधी और सरदार पटेल की छाया थी. वैसे भी ये ऐतिहासिक तथ्य है कि सिर्फ गांधी की इच्छा थी, जिसकी वजह से सरदार पटेल की जगह नेहरू देश के प्रधानमंत्री बने. ऐसे में जब आजादी के बाद प्रथम कैबिनेट की रचना की बारी आई तो उसमें मंत्री के तौर पर कौन-कौन शामिल हो, इसको मोटे तौर पर गांधी और पटेल ने तय किया.

Sardar Patel letters to Shyama Prasad Mukherjee by Saad Bin Omer on Scribd




गांधी की सोच थी कि आजादी के बाद बने पहले कैबिनेट में न सिर्फ कांग्रेस, बल्कि देश की तमाम विचारधाराओं की हिस्सेदारी हो, समुदायों की हिस्सेदारी हो और राज्यों का भी प्रतिनिधित्व हो. इसी नाते श्यामा प्रसाद मुखर्जी की नेहरू कैबिनेट में एंट्री हुई, जो न सिर्फ बंगाल के बड़े राजनेता थे बल्कि अविभाजित बंगाल में वित्त मंत्री रह चुके थे.

जब मुखर्जी ने नेहरू की कैबिनेट में जुड़ने का फैसला किया तो उनकी इच्छा शिक्षा मंत्री बनने की थी क्योंकि न सिर्फ पिता आशुतोष मुखर्जी बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में वो भी बड़ी भूमिका निभा चुके थे. पिता आशुतोष मुखर्जी की तरह बेटे श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी कोलकाता यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर रह चुके थे. लेकिन मौलाना आजाद शिक्षा मंत्रालय के लिए जिद कर चुके थे और नेहरू आजाद की इच्छा को काटना नहीं चाह रहे थे इसलिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी को शिक्षा मंत्री की जगह उद्योग और आपूर्ति मंत्री बनाया गया. मुखर्जी ने नेहरू कैबिनेट में यह भूमिका 1 अप्रैल 1950 तक निभाई, तब तक जब तक उन्होंने नेहरू मंत्रिमंडल से कश्मीर, पाकिस्तान और मुस्लिम तुष्टीकरण के मुद्दे को लेकर इस्तीफा नहीं दे दिया.

Narendra Modi, Shyama Prasad Mukherjee, BJP, Jawaharlal Nehru, Mahatma Gandhi, Planning, Modi cabinet
Loading...

करीब पौने तीन साल के अपने कार्यकाल के दौरान मुखर्जी ने कई बड़ी सिद्धियां हासिल की, मसलन चितरंजन में रेल का कारखाना हो या सिंदरी में खाद का कारखाना, इन्हें स्थापित करने का फैसला मुखर्जी का था.

इसे भी पढ़ें :- कैसे हुई थी श्यामाप्रसाद मुखर्जी की मौत? जिसकी जांच चाहती है BJP

मुखर्जी काफी दूरदर्शी थे, इसकी झलक उनके उन फैसलों में भी दिखाई पड़ती है, जिसका आगे चलकर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक शक्ति में बड़ा योगदान रहा. बेंगलुरु में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के तौर पर आज जो कारखाना चल रहा है, उसके पीछे की सोच भी मुखर्जी की ही थी. वालचंद हीराचंद ने जहाज बनाने का यह कारखाना स्थापित किया था, लेकिन भारत की सामरिक जरूरत के मुताबिक इसे सरकार चलाए, यह दूरदृष्टि मुखर्जी की ही थी.

इसी तरह की दूरदृष्टि मुखर्जी ने हवाई जहाज निर्माण के साथ ही विशाखापत्तनम के शिपबिल्डिंग यार्ड के मामले में भी दिखाई. यहां पर फिलहाल अत्याधुनिक अरिहंत न्यूक्लियर सबमरीन का निर्माण हो रहा है. वह कारखाना भी वालचंद हीराचंद ने सिंधिया शिप बिल्डिंग यार्ड के तौर पर शुरू किया गया था, जिसकी नीव वालचंद हीराचंद ने कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष के तौर पर राजेंद्र प्रसाद से रखवाई थी. उसी यार्ड को बंद करने की नौबत आ गई थी क्योंकि एक तो भारत में उस समय इस्पात का उत्पादन कम था, जोकि शिप बिल्डिंग के लिए जरूरी कच्चा माल होता है. दूसरा भारत में शिपिंग का मार्केट बहुत बड़ा नहीं था ऐसे में ऑर्डर कम मिलते थे, जिसकी वजह से शिप बनाने की लागत ब्रिटेन के मुकाबले ज्यादा होती थी. लेकिन यह बात सरदार पटेल और श्यामा प्रसाद मुखर्जी दोनों ही मानते थे कि अगर भारत को न सिर्फ आर्थिक तौर पर, बल्कि सामरिक तौर पर भी मजबूत होना है तो एयर क्राफ्ट मेकिंग या फिर शिपबिल्डिंग जैसे उद्योगों को बढ़ावा देना होगा.

Narendra Modi, Shyama Prasad Mukherjee, BJP, Jawaharlal Nehru, Mahatma Gandhi, Planning, Modi cabinet

जब वालचंद हीराचंद ने अपनी समस्या को सरदार पटेल के आगे रखा तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तत्काल इस बात से सहमति जाहिर की कि सरकार आर्थिक कारणों से अगर सीधे-सीधे शिपबिल्डिंग यार्ड का अधिग्रहण ना कर पाए तो कम से कम वहां से जो जहाज निर्मित हो रहे हैं, उनको लागत मूल्य पर खरीद कर फिर उन्हें बाजार मूल्य पर बेच दे ताकि शिपबिल्डिंग के इस व्यवसाय को जीवंत रखा जा सके.

आजादी के कुछ वर्षों बाद मुखर्जी की दिखाई हुई उस राह पर चलते हुए ही आखिरकार सरकार की तरफ से विशाखापत्तनम के इस शिप बिल्डिंग यार्ड का हिन्दुस्तान शिपयार्ड के तौर पर अधिग्रहण कर लिया गया. जहां से न सिर्फ बड़ी बड़ी वार शिप्स का निर्माण करने में कामयाबी हासिल हुई, बल्कि अब अरिहंत जैसी अत्याधुनिक पनडुब्बियों का भी वहां निर्माण हो रहा है.

उद्योग मंत्री के तौर पर नेहरू के विचार के उलट मुखर्जी मानते थे कि देश की आजादी के शुरुआती दौर में ये जरूरी है कि उद्योग धंधों की स्थापना के लिए सरकारी और निजी पूंजी, दोनों को ही प्रोत्साहित किया जाए ताकि भारत आवश्यक वस्तुओं के निर्माण के मामले में और खासतौर पर भारत की सुरक्षा के मामले में आत्मनिर्भर हो सके. मुखर्जी शायद लंबे समय तक नेहरू मंत्रिमंडल का हिस्सा रहे होते और उद्योग मंत्री की भूमिका निभा रहे होते तो भारत उस नेहरूवियन सोच के दायरे में घिरा ना होता जहां पर निजी उद्योग और निजी पूंजी दोनों को घृणा की निगाह से देखा जाता था. नेहरू की उस सोच से बाहर निकलते निकलते देश को चार दशक लग गए और आज देश में एक ऐसी सरकार है जो नेहरू की जगह श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों से प्रेरणा पाती है और इसी हिसाब से देश में उद्योग धंधे, व्यवसाय और अर्थव्यवस्था को आगे ले जाने की कोशिश कर रही है.

Narendra Modi, Shyama Prasad Mukherjee, BJP, Jawaharlal Nehru, Mahatma Gandhi, Planning, Modi cabinet

मुखर्जी को अमूमन कश्मीर के मुद्दे को लेकर उनकी राष्ट्रवादी सोच के तौर पर याद किया जाता है, लेकिन आज जो पश्चिम बंगाल भारत के हिस्से में है उसके पीछे मुखर्जी जैसे लोगों की बड़ी भूमिका रही है अन्यथा इसके ज्यादातर हिस्सों के तब के पाकिस्तान में जाने की आशंका थी. सवाल ये उठता है कि आखिर मुखर्जी ने नेहरू का मंत्रिमंडल क्यों छोड़ा, क्या उसका कारण कश्मीर के मसले पर नेहरू की ढुलमुल नीति थी या फिर और भी वजह थी. दरअसल मुखर्जी इस बात से भी नेहरू से बहुत नाराज थे कि वह पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों पर जो उस वक्त अत्याचार हो रहे थे और पाकिस्तान की सरकार उनकी सुरक्षा के लिए कोई कोशिश नहीं कर रही थी, बल्कि उल्टे उन्हें भारत की तरफ धकेलने में लगी हुई थी, उसको लेकर भारत सरकार कोई कड़ा रुख क्यों नहीं अपना रही है. मुखर्जी ने उस समय आशंका जाहिर की थी कि अगर यही हाल रहा तो पाकिस्तान में जहां हिंदू तेजी से नगण्य होने की स्थिति में पहुंच जाएंगे वहीं भारत में मुस्लिम आबादी लगातार बढ़ती रहेगी.

Narendra Modi, Shyama Prasad Mukherjee, BJP, Jawaharlal Nehru, Mahatma Gandhi, Planning, Modi cabinet

मुखर्जी की आशंका उनके देहांत के छह दशक बाद पूरी तरीके से सही साबित हुई है, जहां आज के पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू आबादी लगातार जनसंख्या के अनुपात में कम होती जा रही है, जबकि भारत में मुस्लिम आबादी कुल जनसंख्या के अनुपात में बढ़ती जा रही है.

यह भी बहुत कम लोगों को ध्यान में होगा कि कश्मीर का जो मसला नेहरू की वजह से आज भी भारत के लिए परेशानी का सबसे बड़ा सबब है, अगर मुखर्जी की दूरदर्शिता नहीं होती तो वैसा ही कुछ हैदराबाद के मामले में होता और हैदराबाद भारत के लिए नासूर की तरह होता. वह मुखर्जी ही थे जिन्होंने नेहरू की कैबिनेट की बैठक के दौरान जोर देकर यह कहा था कि हैदराबाद का मसला सरदार पटेल को सुलझाने दिया जाए, जिसके लिए बाकी मंत्रियों ने भी अपनी सहमति दी और सरदार भी उसके लिए राजी हो गए और ऐसे में नेहरू इसके लिए मना नहीं कर पाए. इसके बाद ही सरदार ने पुलिस कार्रवाई के तहत बिना किसी बड़े रक्तपात के देश की सबसे बड़ी रियासत रही हैदराबाद को भारत का अविभाज्य हिस्सा बना दिया, जिसका निजाम अपनी रियासत को स्वतंत्र देखना चाह रहा था और मुस्लिम जगत का नया खलीफा बनने का सपना पाले हुए था. कश्मीर के मामले में भी अगर मुखर्जी ने अपना बलिदान नहीं दिया होता तो नेहरू शेख अब्दुल्ला के साथ अपनी दोस्ती निभाने के चक्कर में शायद उस दिशा में भी बढ़ जाते, जहां अब्दुल्ला अपने लिए कश्मीर को शेखगाह बनाने की फिराक में थे!
First published: July 6, 2019, 12:08 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...