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कभी राजीव गांधी ने कर दिया था किनारे, फिर मनमोहन ऐसे बने सोनिया गांधी के वफादार 'सरदार' और एक दक्ष राजनेता

सोनिया गांधी को न्योता नहीं दिए जाने से नाराज़ मनमोहन सिंह नहीं जाएंगे ट्रंप के डिनर में

सोनिया गांधी को न्योता नहीं दिए जाने से नाराज़ मनमोहन सिंह नहीं जाएंगे ट्रंप के डिनर में

राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) के योजना आयोग (Planing Commission) के अर्थशास्त्रियों को 'जोकरों का झुंड' (Bunch of Jokers) कहने के बाद मनमोहन सिंह (Manmohan Singh) योजना आयोग से इस्तीफा देने के लिए तैयार थे.

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    (रशीद किदवई)

    नई दिल्ली.
    डॉ वाई के अलघ ने एक बार मनमोहन सिंह (Manmohan Singh) को सबसे अंडररेटेड (कम आंके गए) राजनेता हैं और सबसे ज्यादा तवज्जो दिए गए अर्थशास्त्री (Economist) हैं. वर्तमान कांग्रेस (Congress) में, इस बात पर लगभग सहमति है कि मनमोहन सिंह नेताओं में नेता हैं.

    अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह की एक दक्ष राजनीतिज्ञ के तौर पर उभरने की यात्रा एक आकर्षक कहानी है. यह कमोबेश एक आश्चर्य के रूप में सामने आई, इस दौरान उन्होंने अपने ही मेंटर पीवी नरसिम्हा राव (PV Narasimha Rao) की छवि को छोटा भी कर दिया. पूर्व प्रधानमंत्री आईके गुजराल (IK Gujral) की 100वीं जयंती के अवसर पर दिल्ली में एक सभा को संबोधित करते हुए मनमोहन सिंह ने कहा था कि 1984 के सिख विरोधी दंगों को रोका जा सकता था अगर तत्कालीन गृहमंत्री नरसिम्हा राव ने गुजराल की हिदायतों पर ध्यान दिया होता.

    'नरसिम्हा राव मानते गुजराल की हिदायत तो रोके जा सकते थे सिख विरोधी दंगे'
    मनमोहन सिंह ने कहा था, "गुजराल जी इतने ज्यादा चिंतित थे कि वे उसी शाम तत्कालीन गृहमंत्री नरसिम्हा राव के घर गए... उन्होंने कहा, स्थिति इतनी ज्यादा खराब है कि सरकार को जल्दी से जल्दी सेना को बुला लेना चाहिए. अगर इस हिदायत पर ध्यान दिया गया होता. तो शायद 1984 के नरसंहार से बचा जा सकता था." 1984 का सिख विरोध नरसंहार एक बहुत ही भावुक और संवेदनशील मुद्दा है जिसे लेकर राजीव गांधी की भूमिका की अक्सर समीक्षा की जाती है कि युवा प्रधानमंत्री उन दंगों को रोकने में असफल रहे, जिसमें केवल दिल्ली में ही 3 हजार सिख मारे गए. इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की सिख बॉडीगार्ड द्वारा हत्या के बाद देश के अलग-अलग अन्य 80 शहरों में भी सिख-विरोधी दंगे हुए थे.

    जब मनमोहन सिंह ने RSS को भी सिख दंगों के लिए ठहराया था दोषी
    यह जानने लायक बात है कि कैसे मनमोहन सिंह 1984 के दंगों के बारे में अलग-अलग समय पर अलग-अलग बातें कह रहे थे. 1999 में दक्षिणी दिल्ली लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान, सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को इसमें फंसाने की कोशिश की थी. प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में 2 सितंबर, 1999 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए सिंह ने 1984 के दंगों को 'एक काला धब्बा और सबसे दुखद घटना' (A black spot and the saddest event) बताया था. हालांकि उन्होंने साफ किया था कि कांग्रेस की एक संगठन के तौर पर इसमें कोई भूमिका नहीं थी. सिंह ने तब यह भी कहा था कि दिल्ली के कई पुलिस थानों में लिखाई गई FIR से यह साबित होता है कि इन दंगों में कई सारे RSS के कार्यकर्ता भी शामिल थे.

    1999 के आम चुनावों के दौरान दक्षिणी दिल्ली सीट से मनमोहन सिंह चुनाव लड़े लेकिन यह सीट उनके लिए दुर्जेय साबित हुई क्योंकि तब कांग्रेस अपने अंदर ही मतभेदों से लड़ रही थी और बीजेपी इस सीट पर सिख वोटर्स को टारगेट करके ऐसे प्रचार कर रही थी कि लोग एक ऐसी पार्टी को वोट न दें, 'जिसके हाथ खून से रंगे हुए हैं.' इस लड़ाई में डॉ सिंह बीजेपी के विजय कुमार मल्होत्रा (Vijay Kumar Malhotra) से हार गए.

    चुनावों में हार के बाद RSS के बयान पर दी थी सफाई
    अपनी चुनावी हार के कुछ ही महीनों के भीतर मनमोहन सिंह ने अपना रुख बदल दिया. इस राजनीतिज्ञ ने जिसे अब तक कांग्रेस की मुखिया सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) राज्यसभा भेज चुकी थीं, साफ कर दिया कि 1984 के दंगों के लिए सिर्फ RSS ही जिम्मेदार नहीं है. 13 दिसंबर, 1999 को मनमोहन सिंह ने कहा, मेरे बयान को राजनीतिक फायदे के लिए तोड़-मरोड़कर पेश किया गया था. मैंने कहा था कि अगर उसमें कांग्रेस से जुड़े कुछ लोग व्यक्तिगत तौर पर शामिल थे तो दूसरे संगठनों, जिसमें RSS भी शामिल था, उन्होंने भी दंगों में भाग लिया था. उन्हें भी सजा देनी चाहिए.

    भारत लौटने के कदम को मशहूर अर्थशास्त्री ने बताया था 'बेवकूफी'
    जब मनमोहन सिंह संयुक्त राष्ट्र संघ में मशहूर अर्थशास्त्री राउल प्रेबिस्च के मातहत काम कर रहे थे, उन्हें दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स (Delhi School of Economics) में एक लेक्चरर के तौर पर पढ़ाने का प्रस्ताव मिला. उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और 1969 में भारत लौटने का फैसला कर लिया. इस पर डॉ प्रेबिस्च आश्चर्यचकित थे कि क्यों उनके जैसे एक प्रतिभाशाली अर्थशास्त्री ने संयुक्त राष्ट्र की नौकरी छोड़ दी और भारत वापस लौट गया. प्रेबिस्च ने डॉ सिंह से कहा था, "तुम बेवकूफी कर रहे हो." उन्होंने यह भी कहा था, "लेकिन जीवन में कभी-कभी बेवकूफी करना भी बुद्धिमानी का काम होता है."

    भारत वापस लौटने ने निस्संदेह मनमोहन सिंह को राजनीतिज्ञों में राजनीतिज्ञ बना दिया.

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