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उमर अब्दुल्ला पर PSA लगाए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं बहन सारा अब्दुल्ला

News18Hindi
Updated: February 10, 2020, 2:32 PM IST
उमर अब्दुल्ला पर PSA लगाए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं बहन सारा अब्दुल्ला
उमर अब्दुल्ला पर पीएसए लगाए जाने के खिलाफ बहन पहुंची सुप्रीम कोर्ट

जम्‍मू-कश्‍मीर (Jammu-Kashmir) प्रशासन ने उमर अब्दुल्ला (Omar Abdullah) पर पीएसए लगाने के कारणों में बारे में बताते हुए कहा है कि अब्‍दुल्‍ला चरमपंथ के चरम पर होने के दौरान भी अपने समर्थकों को बड़ी संख्‍या में मतदान के लिए कर प्रोत्‍साहित कर लेते थे.

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  • Last Updated: February 10, 2020, 2:32 PM IST
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श्रीनगर. जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की जन सुरक्षा कानून के तहत नजरबंदी के खिलाफ उनकी बहन सारा अब्दुल्ला पायलट ने सोमवार को उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की. न्यायमूर्ति एन वी रमणा की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सारा अब्दुल्ला पायलट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस याचिका का उल्लेख किया और इसे शीघ्र सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया.

सिब्बल ने कहा कि उन्होंने जन सुरक्षा कानून के तहत उमर अब्दुल्ला की नजरबंदी को चुनौती देते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की है और इस पर इसी सप्ताह सुनवाई करने का अनुरोध किया है. पीठ इस याचिका को शीघ्र सूचीबद्ध करने पर सहमत हो गई है.

सारा अब्दुल्ला पायलट ने अपनी याचिका में कहा है कि ऐसा व्यक्ति जो पहले ही छह महीने से नजरबंद हो, उसे नजरबंद करने के लिए कोई नई सामग्री नहीं हो सकती. याचिका में नजरबंदी के आदेश को गैरकानूनी बताते हुए कहा गया है कि इसमें बताई गईं वजहों के लिए पर्याप्त सामग्री और ऐसे विवरण का अभाव है जो इस तरह के आदेश के लिए जरूरी है.

याचिका में दिया गया ये तर्क
इसमें कहा गया है, यह बिरला मामला है कि वे लोग जिन्होंने सांसद, मुख्यमंत्री और केन्द्र में मंत्री के रूप में देश की सेवा की और राष्ट्र की आकांक्षाओं के साथ खड़े रहे, उन्हें अब राज्य के लिए खतरा माना जा रहा है. याचिका में कहा गया है कि उमर अब्दुल्ला को चार-पांच अगस्त, 2019 की रात घर में ही नजरबंद कर दिया गया था. बाद में पता चला कि इस गिरफ्तारी को न्यायोचित ठहराने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 107 लागू की गई है. इसके अनुसार, इसलिए यह नितांत महत्वपूर्ण और जरूरी है कि यह न्यायालय व्यक्ति के जीने और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा ही नहीं करे बल्कि संविधान के भाग के अनुरूप अनुच्छेद 21 के भाव की भी रक्षा करे क्योंकि जिसका उल्लंघन एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए अभिशाप है. याचिका में उमर अब्दुल्ला को जन सुरक्षा कानून के तहत नजरबंद करने संबंधी पांच फरवरी का आदेश निरस्त करने का अनुरोध किया गया है.

राज्य में पांच अगस्त, 2019 से ही संचार संपर्क पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. (सांकेतिक तस्वीर)


सोशल नेटवर्क से जनता को उकसाने का है आरोप
उमर अब्दुल्ला को इस कानून के तहत नजरबंदी के कारणों के बारे में बताया गया है कि राज्य के पुनर्गठन की पूर्व संध्या पर उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों और अनुच्छेद 35-ए को खत्म करने के फैसले के खिलाफ आम जनता को भड़काने का प्रयास किया. इस आदेश में एक अन्य वजह में इस फैसले के खिलाफ जनता को उकसाने के लिए सोशल नेटवर्किंग पर उनकी टिप्पणियों को भी शामिल किया गया है. उमर अब्दुल्ला 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री थे. उन्हें इस नजरबंदी के संबंध में तीन पेज का आदेश दिया गया है. इसमें उनके दिए गए कथित बयान हैं, जिन्हें विघटनकारी स्वरूप का माना गया है.

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पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती 5 अगस्त से ही नज़रबंद हैं.


क्या है जन सुरक्षा कानून
पीएसए के तहत किसी भी आरोपी को बिना किसी अन्य आरोप या फिर ट्रायल के 2 साल तक हिरासत में रखा जा सकता है. इस कानून के तहत आरोपी व्यक्ति को बिना वारंट, किसी विशेष जुर्म के किए आरोपी होने के बिना भी बिना किसी समयसीमा के अरेस्ट या डीटेन कर रखा जा सकता है. बता दें कि उमर अब्दुल के पिता फारुक अब्दुल्ला को पहले ही इस कानून के तहत नज़रबंद करके रखा गया है.

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First published: February 10, 2020, 12:05 PM IST
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