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सीताराम दास: एक हाथ वाले पुजारी, जिनकी एक आवाज में पानी से बाहर आते हैं मगरमच्छ

सीताराम दास गोरखपुर से इस गांव में करीब 50 साल पहले आए थे. उनका काम गायों की देखभाल की करना था, लेकिन इसके बजाए वे मगरमच्छों की तरफ आकर्षित हुए. (सांकेतिक तस्वीर)
सीताराम दास गोरखपुर से इस गांव में करीब 50 साल पहले आए थे. उनका काम गायों की देखभाल की करना था, लेकिन इसके बजाए वे मगरमच्छों की तरफ आकर्षित हुए. (सांकेतिक तस्वीर)

Sitaram Das: छत्तीसगढ़ के कोटमी सोनार स्थित तालाब पर सीताराम दास मगरमच्छों (Crocodiles) से मुलाकात करते देखे जा सकते हैं. मगरमच्छ उनकी आवाज सुनकर पानी से बाहर आ जाते हैं. खास बात यह है कि मगर के हमले दास अपना हाथ गंवा चुके हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 21, 2021, 12:47 PM IST
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रायपुर. आमतौर पर लोगों के लिए मगरमच्छ एक आकर्षण का केंद्र होता, जिसे वे दूर से देखना ही पसंद करते हैं. मगरमच्छ के जरा भी नजदीक जाना जान पर भारी पड़ सकता है. हालांकि, मगर का स्वभाव भी बेहद आक्रामक होता है, लेकिन मंदिर के पुजारी सीतारम दास (Sitram Das) को लेकर शायद इन खतरनाक जीवों की सोच कुछ ओर ही है. वे दास की आवाज सुनकर पानी से बाहर आ कर बैठ जाते हैं. इतना ही नहीं पुजारी इन जीवों को उनकी शक्लों से पहचानते हैं.

छत्तीसगढ़ (Chattisgarh) के कोटमी सोनार (Kotami Sonar) स्थित एक तालाब के पास आपको दास की मौजूदगी मिल जाएगी. उन्हें मगरमच्छों से बेहद प्यार है. पुजारी कहते हैं कि वे उनके बच्चे हैं. इस बात को सुनकर आश्चर्य ही होता है कि एक इंसान की आवाज और इशारों को मगरमच्छ इतनी आसानी से सुनते और समझते हैं. हालांकि, करीब 15 साल पहले दास मगर के हमले का शिकार हो गए हैं, जिसमें उन्होंने अपना एक हाथ गंवा दिया था.

यह भी पढ़ें: जलवायु ही नहीं, इंसानी गतिविधियों ने महासागरों की आवाजें तक बदल दी हैं



इसके घटना के बाद भी उन्हें इन जीवों से डर या नफरत नहीं है. एक हाथ गंवाने के बाद भी पुजारी ने मगरमच्छों के लिए काम करने का फैसला किया. दास ने अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया 'मगरमच्छ मुझे नुकसान नहीं पहुंचाना चाहती थी. उसने मुझे पकड़ा क्योंकि मैं उसके रास्ते में आ गया था. इसके बाद उसने मुझे जाने दिया.'

बड़ी दिलचस्प है कहानी
दास गोरखपुर से इस गांव में करीब 50 साल पहले आए थे. उनका काम गायों की देखभाल की करना था, लेकिन इसके बजाए वे मगरमच्छों की तरफ आकर्षित हुए. इतना ही नहीं उन्हें इन जीवों को लेकर गहरी जानकारियां भी हैं. वे हर मगर को उसके चेहरे से जानते हैं. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि दास ने अपना पूरा जीवन मगरमच्छों की सेवा के लिए देने का फैसला किया है. वे चाहते हैं कि मरने के बाद उनके शरीर को तालाब में फेंक दिया जाए.
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