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फ्रीडम हाउस रिपोर्ट में भारत की रेटिंग 'आंशिक स्वतंत्र' किए जाने को सरकार ने भ्रामक और गलत बताया, 7 मुद्दों पर दिया जवाब

अमेरिकी थिंक टैंक का भारत सरकार ने जवाब दिया है. (सांकेतिक तस्वीर)

अमेरिकी थिंक टैंक का भारत सरकार ने जवाब दिया है. (सांकेतिक तस्वीर)

फ्रीडम हाउस (Freedom House) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में लोगों की आजादी पहले से कुछ कम हुई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि कि भारत एक स्वतंत्र देश से आंशिक स्वतंत्र देश में तब्दील हो चुका है. रिपोर्ट में ‘पॉलिटिकल फ्रीडम’ और ‘ह्यूमन राइट्स’ को लेकर तमाम देशों में रिसर्च की गई थी. अब सरकार ने इस रिपोर्ट के सात बिंदुओं पर जवाब दिया है.

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नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने अमेरीकी थिंक टैंक फ्रीडम हाउस (Freedom House) की रिपोर्ट को भ्रामक और गलत बताया है. सरकार ने थिंक टैंक की रिपोर्ट डेमोक्रेसी अंडर सीज (Democracy Under Siege) को लेकर 7 बिंदुओं पर जवाब दिया है. दरअसल फ्रीडम हाउस ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में लोगों की आजादी पहले से कुछ कम हुई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत एक स्वतंत्र देश से आंशिक स्वतंत्र देश में तब्दील हो चुका है. रिपोर्ट में ‘पॉलिटिकल फ्रीडम’ और ‘ह्यूमन राइट्स’ को लेकर तमाम देशों में रिसर्च की गई थी.

बीजेपी के राज्यसभा सांसद प्रो. राकेश सिन्हा इस रिपोर्ट पर सख्त प्रतिक्रिया दी थी. उन्होंने कहा कि ये साम्राज्यवादी हथकंडा है. देश में भौगोलिक साम्राज्यवाद चला गया है. उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार किसी के साथ धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव नहीं हुआ है. अब सरकार ने इस रिपोर्ट के सात बिंदुओं पर जवाब दिया है.  आइए जानते हैं क्या हैं वो
मुस्लिमों के खिलाफ पक्षपातपूर्ण नीतियों पर जवाब: सबसे पहले सरकार ने 'मुस्लिमों को लेकर पक्षपातपूर्ण नीतियां बनाने और दिल्ली दंगों' के संदर्भ पर जवाब दिया है. स्पष्ट किया गया है कि भारत सरकार अपने देश के सभी नागरिकों के साथ एक समान व्यवहार करती है. वहीं दिल्ली दंगों के संबंध में बताया गया है कि दंगों को रोकने के सभी उपाय किए गए. बाद में सरकारी मशीनरी ने निष्पक्ष रूप से मामले की जांच की.
राज्य सरकार के अधीन है राजद्रोह कानून के इस्तेमाल की व्यवस्था: राजद्रोह के कानून के इस्तेमाल पर सरकार की तरफ से साफ किया गया है कि पुलिस और कानून व्यवस्था संघीय ढांचे के तहत राज्यों के अंतर्गत आते हैं. ऐसे में किसी के खिलाफ इस कानून का इस्तेमाल राज्य सरकारों द्वारा ही किया जाता है. इस दौरान जांच से लेकर जान-माल की सुरक्षा जैसी सभी बातें राज्यों को पास ही हैं.
लॉकडाउन के दौरान लोगों की मुश्किलें कम करने का किया गया हर प्रयास: कोविड-19 महामारी के दौरान लॉकडाउन से पैदा हुई मुश्किलों पर भी केंद्र सरकार ने जवाब दिया है. कहा गया है कि बीते साल 16 मार्च से 23 मार्च के बीच राज्यों द्वार पूर्ण और हल्के लॉकडाउन लगाए गए थे. इसके बाद अन्य देशों के अनुभवों और संक्रमण फैलने के खतरे को देखते हुए देश में लॉकडाउन लगाने का फैसला किया गया. लोगों को मुश्किल न होने पाए इसके लिए राज्य सरकारों को स्टेट डिजास्टर रेस्पॉन्स फंड इस्तेमाल करने की छूट दी गई. इसके अलावा कंटेनमेंट जोन से बाहर के इलाकों में अप्रवासी मजदूरों को काम भी दिया गया जिससे उनके सामने आजीविका का संकट न पैदा न होने पाए. साथ ही 1.7 लाख करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा की गई. फिर रोजगार को रफ्तार देने के लिए सरकार ने मिशन लॉन्च किया. तकरीबन 80 करोड़ लोगों को 5 किलो गेंहू और 1 किलो चावल हर महीने मुफ्त मुहैया कराया गया. मनरेगा के तहत रोजाना मजदूरी को बढ़ाया गया.
मानवाधिकार संगठनों की सुरक्षा के लिए है पूरी व्यवस्था: मानवाधिकार संगठनों के प्रति रुख को लेकर कहा गया है कि ह्यूमन राइट्स एक्ट 1993 के अंतर्गत सभी सुरक्षा मुहैया कराई जाती हैं. इस एक्ट के तहत नेशनल और स्टेट लेवल पर ह्यूमन राइट्स कमीशन हैं जो मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करते हैं. नेशनल कमीशन के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज हैं.
पत्रकारों और अकादमिक लोगों की सुरक्षा को प्रतिबद्ध: अकादमिक लोगों को धमकाने और पत्रकारों को धमकाने पर सरकार का कहना है कि विचार-विमर्श और असहमतियां भारत के लोकतंत्र के हिस्से हैं. सरकार अपने देश के सभी नागरिकों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है, इसमें पत्रकार भी शामिल हैं. केंद्र सरकार ने राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को पत्रकारों की सुरक्षा के मद्देनजर विशेष अडवायजरी जारी की है.
क्यों पड़ती अस्थाई इंटरनेट शटडाउन की जरूरत: इंटरनेट शटडाउन पर सरकार ने कहा है कि ऐसा अस्थाई तौर पर संवैधानिक प्रावधान के तहत ही किया जाता है. हालांकि ऐसी स्थितियों की लगातार समीक्षा की जाती रहती है. ऐसे फैसले कानून-व्यवस्था और सुरक्षा के मद्देनजर उठाए जाते हैं. स्थितियां सामान्य होते ही व्यवस्था को बहाल कर दिया जाता है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल पर उठाए कदमों का जवाब दिया: सरकार ने मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशन पर उठाए कदमों का भी जवाब दिया है. सरकार ने कहा है कि संस्था ने एफसीआरए एक्ट के तहत सिर्फ एक बार परमिशन ली थी वो भी 20 साल पहले. इसके बाद सरकार ने कई घटनाओं और पैसे के लेन-देन का जिक्र कर बताया है कि ये कदम क्यों उठाया गया.
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