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अपमान, झगड़ा और फिर किसी सिंधिया की विदाई: दादी और पिता की राह पर ज्योतिरादित्य भी

माधवराव का कांग्रेस से विद्रोह 1993 में शुरू हुआ था (फाइल फोटो, Getty Images)

माधवराव का कांग्रेस से विद्रोह 1993 में शुरू हुआ था (फाइल फोटो, Getty Images)

ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) की विदाई ने कांग्रेस की कमलनाथ (Kamalnath) सरकार को अल्पमत में ला दिया है. साथ ही इसने कांग्रेस (Congress) के साथ सिंधिया राजपरिवार (Scindia Royal Family) के रिश्तों को भी बुरी तरह से तोड़ दिया है.

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    विवेक त्रिवेदी
    नई दिल्‍ली. मध्‍यप्रदेश (Madhya Pradesh) में कांग्रेस के कद्दावर और युवा चेहरा रहे ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया बीजेपी में शामिल होने जा रहे हैं. उनके पिता माधवराव सिंधिया से शुरू हुआ कांग्रेस से उनका जुड़ाव करीब 3 दशक तक चला. सिंधिया ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से मंगलवार को इस्तीफा दिया. उन्होंने अपने इस्तीफे की घोषणा ट्विटर पर की.

    ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) की कांग्रेस से कटु विदाई एक से ज्यादा वजहों से महत्वपूर्ण है. उनके इस्तीफे से शुरू हुई घटनाओं की कड़ी ने न केवल कमलनाथ (Kamal Nath) की सरकार को अल्पमत में ला दिया है बल्कि सिंधिया राजपरिवार और कांग्रेस के बीच संबंधों को भी बुरी तरह से तोड़ दिया है.

    राजमाता विजयराजे ने 1967 में ऐसे ही गिराई थी कांग्रेस की सरकार
    यह कटुता भरा प्रस्थान सोमवार की शाम को तब शुरू हुआ, जब सिंधिया के वफादार कांग्रेस विधायकों बंगलुरु चले गए. इस घटना से 1967 में गुना के शाही खानदान की दादी मां विजयराजे सिंधिया (Vijaya Raje Scindia) की 1967 में कांग्रेस से हुई विदाई की यादें ताजा हो गईं. आज की तरह ही, यह विदाई मध्यप्रदेश की कांग्रेस नीत डीपी मिश्रा की सरकार के गिरने की वजह भी बनी थी, जिसके बाद गोविंद नारायण सिंह गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री बने थे.

    राजमाता, जिन्हें विजयराजे (Vijaya Raje Scindia) नाम से जाना जाता है, के साथ कांग्रेस पार्टी के 36 विधायक विपक्षी खेमे में आ गए थे. जिससे कांग्रेस की डीपी मिश्रा सरकार गिर गई थी. पहली बार मध्य प्रदेश में ग़ैर कांग्रेसी सरकार बनी. इस संयुक्त विधायक दल की सरकार में कांग्रेस के बागी विधायकों के अलावा प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और जनसंघ के विधायक भी शामिल थे. इसका श्रेय राजमाता को दिया गया. राजमाता की पसंद के गोविंद नारायण सिंह राज्य के मुख्यमंत्री बने.

    माधवराव ने नहीं दिया मां का साथ, निर्दलीय लड़े 1977 का चुनाव
    हालांकि ये गठबंधन भी स्थायी सरकार नहीं दे पाया. ये सरकार केवल 20 महीने में गिर गई. गोविंद नारायण सिंह फिर कांग्रेस में चले गए. लेकिन इस सारे उठापटक ने जनसंघ (Bharatiya Jana Sangh) को मध्य प्रदेश में मजबूत बना दिया. साथ ही विजयाराजे सिंधिया खुद भी एक बड़ी सियासी ताकत के तौर पर स्थापित हो गईं.

    उनके कदमों पर चलते हुए ही, विजयराजे (Vijaya Raje Scindia) के बेटे और ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया ने भी राजनीति में एंट्री की और मात्र 26 साल की उम्र में 1971 में आम चुनाव गुना सीट से जनसंघ के टिकट पर अपना पहला चुनाव जीता. इसके बाद वे 1977 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर आम चुनाव लड़े और जनता पार्टी की जबरदस्त लहर में भी जीतने में सफल रहे.

    ज्योतिरादित्य की तरह माधवराव को भी कांग्रेस ने नहीं दिया था मुख्यमंत्री पद
    परिवार को विचारधाराओं के आधार पर बंटा हुआ छोड़कर, माधवराव ने कांग्रेस ज्वाइन कर ली और गुना की सीट को 1980 में तीसरी बार जीता. जबकि इसी दौरान उनकी मां बीजेपी की संस्थापक सदस्य बनीं और मध्यप्रदेश में पार्टी के कार्यक्रम की कर्ता-धर्ता बन गईं. मां और बेटे की बीच की यह खाई और तब बढ़ी, जब कांग्रेस ने 1984 में सिंधिया राजपरिवार के गृहनगर ग्वालियर से माधवराव सिंधिया को उम्मीदवार बना दिया. यह अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) को हराने के लिए अंतिम समय में खेला गया कांग्रेस का दांव था. माधवराव सिंधिया ने यह ऐतिहासिक लड़ाई भी जीती. इसी दौरान, उनकी बहन वसुंधरा राजे ने भी बीजेपी ज्वाइन कर ली.

    माधवराव का कांग्रेस से विद्रोह 1993 में शुरू हुआ, जब उन्हें मुख्यमंत्री का पद न देकर वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh) को एमपी में कांग्रेस मुख्यमंत्री बना दिया गया. ऐसा लगता है कि यह भाग्य का ऐसा खेल था जो बाद में उनके बेटे ज्योतिरादित्य के साथ भी हुआ, जिन्हें 2018 में कमलनाथ के लिए राज्य के मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा.

    ज्योतिरादित्य के बीजेपी में जाने से पार्टी में सिंधिया परिवार के 4 नेता हो जाएंगे
    माधवराव ने कांग्रेस (Congress) छोड़ दी और एमपी विकास कांग्रेस नाम से अपनी पार्टी बना ली. जिसने 1996 में यूनाइटेड फ्रंट से जुड़कर सरकार भी बनाई. बाद में वे कांग्रेस में लौटे और इसके बाद 2001 में अपने पिता के देहांत के बाद गुना उपचुनाव जीतने के बाद ज्योतिरादित्य उनके ही पदचिन्हों पर चलते रहे. ज्योतिरादित्य ने तीन बार लोकसभा का चुनाव जीता लेकिन 2019 के आम चुनावों में कृष्ण पाल सिंह यादव से हार गए. यह झटका उन्हें मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी न मिलने के कुछ ही महीनों बाद लगा.

    अगर बीजेपी में ज्योतिरादित्य  की एंट्री हुई तो इसके साथ ही पार्टी में सिंधिया परिवार के नेताओं की संख्या बढ़कर 4 हो जाएगी- ज्योतिरादित्य, उनकी बुआ वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) और यशोधरा राजे और वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत. जो कि राजस्थान के झालावाड़ से सांसद हैं.

    मंगलवार को अपने भतीजे के फैसले का स्वागत करते हुए यशोधरा राजे सिंधिया (Yashodhara Raje Scindia) ने कहा, "राजमाता के खून ने अपना निर्णय देश के हित में लिया है, नए देश का निर्माण होगा, अब सभी दूरियां मिट गई हैं."

    यह भी पढ़ें: ज्योतिरादित्य सिंधिया चले दादी की राह! 43 साल पहले राजमाता ने भी गिराई थी कांग्रेस की सरकार

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