...तो एंटी क्लॉक चलने वाली घड़ियों से दूर होंगी दुनिया की समस्याएं!

आदिवासियों के मुताबिक जब तक दुनिया उनकी एंटी क्लॉक चलने वाली घड़ी नहीं अपनाएगी, दुनिया की समस्याएं दूर नहीं होंगी.

जनक दवे | News18India
Updated: June 30, 2018, 11:09 PM IST
जनक दवे
जनक दवे | News18India
Updated: June 30, 2018, 11:09 PM IST
आपके घर या दफ्तर में जो घड़ी टंगी है, वो गलत है. आप की कलाई पर जो घड़ी बंधी है, वो गलत है. अब तक आप जिन घड़ियों को सही मानकर वक्त देखा करते थे, वो सब गलत हैं. ये दावा उस आदिवासी समुदाय ने किया है, जिन्होंने सालों पहले हमारी घड़ी को देखना बंद कर दिया है. उन्होंने घड़ी को उल्टा देखना शुरू कर दिया है, और उनकी माने तो उल्टी घड़ी से ही दुनिया का मंगल हो सकता है.

नीचे तस्वीर में जरा गौर से देखिए, क्या आप बता सकते हैं कि इस घड़ी में कितने बजे हैं? दिमाग चकरा गया ना. आज तक आप जिन घड़ियों को देखने के आदी रहे हैं, ये उससे बिल्कुल उल्टी है. घड़ी उल्टी तो चल ही रही है, घड़ी में नंबर भी उल्टे लिखे हुए हैं. गुजरात के एक बड़े हिस्से में यही घड़ी आपको घर-घर में दिखाई देगी. दुकानों पर यही घड़ी बिकती दिखाई देगी. उल्टी दिशा में चलने वाली इस घड़ी को यहां का आदिवासी समुदाय बिल्कुल सही मानता है. इस घड़ी का इतना जबरदस्त असर है कि सरकारी दफ्तरों में भी आदिवासी घड़ी टंगी दिख जाएगी.



आखिर ये घड़ी उल्टी दिशा में क्यों चल रही है? ये उल्टी घड़ी हर घर-दफ्तर में क्यों दिख रही है?

किसने बनाई ये उल्टी घड़ी? और बाकी दुनिया से अलग उल्टी चलने वाली घड़ी बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? इन्हीं सवालों की पड़ताल करने न्यूज18 की टीम गुजरात के उन इलाकों की ओर रवाना हुई, जहां से उल्टी घड़ी की मांग बढ़ने की खबर आ रही थी. हमारी पड़ताल की शुरुआत गुजरात के दाहोद जिले से हुई.



न्यूज18 की टीम को पता चला कि दाहोद जिले के आदिवासी इलाकों में उल्टी घड़ी एक मुहिम की शक्ल अख्तियार कर चुकी है. उन इलाकों की ओर बढ़ते हुए हमें विकास का असर साफ दिखाई दे रहा था. पक्की सड़कें और बिजली के तार बता रहे थे कि ये बाकी दुनिया से कटा हिस्सा नहीं है, लेकिन यहां समय की धारा बाकी दुनिया से अलग उल्टी दिशा में बह रही है.
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तकरीबन दो हजार लोगों के इस छोटे से गांव के हर घर में उल्टी घड़ी टंगी है. इस घड़ी को देखकर हमारे लिए भी वक्त का पता लगा पाना मुश्किल था. आम तौर पर हम जो घड़ी इस्तेमाल करते हैं, उसके ऊपर के आधे हिस्से पर नजर डालें तो पता चलेगा कि घड़ी की सुइयां बाएं से दाएं की ओर चलती हैं. लेकिन आदिवासी घड़ी के ऊपर के आधे हिस्से में घड़ी की सुइयां दाएं से बाएं जाती दिख रही हैं.



हमने लोगों से बातचीत की तो उन्होंने हमें स्कूल जाकर बात करने की सलाह दी. पता चला कि स्कूल में बकायदा आदिवासी घड़ी के बारे में पढ़ाया-समझाया जाता है. ये दाहोद प्राइमरी स्कूल के 7वीं क्लास के बच्चे हैं. यहां शिक्षक बच्चों को बता रहे हैं कि आदिवासी घड़ी ही सही घड़ी है, और दूसरी घड़ी उनके किसी काम की नहीं है. दोनों घड़ियों का फर्क बताने के लिए क्लास में आदिवासी घड़ी भी है और वो घड़ी भी है जिसे हम और आप इस्तेमाल करते हैं. यहां हमें टीचर ने बताया कि उल्टी चलने वाली घड़ी आदिवासी समुदाय की पहचान से जुड़ी है.



 
शिक्षक बाबू भाई निनामा ने बताया कि बच्चों को शुरुआत से सिखाने की वजह है कि वो उनका कल्चर को समझ पाए. आदिवासियों का कल्चर प्रकृति के साथ रहा है. उनको उनकी दिशा बताना है आज लोग अपना कल्चर भूलते जा रहे है. यूएन ने भी कहा है कि विश्व को ग्लोबल वार्मिंग से बचना है तो आदिवासियों के कल्चर को बताना जरूरी है.

प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने की टीचर की ये दलील वाजिब भी है. विकास की अंधी दौड़ के बीच आदिवासी आज भी कुदरती तरीके से जीने के आदी हैं. पहाड़, तालाब, खेत-खलिहान, पालतू जानवर उनकी जिंदगी के अहम हिस्से हैं. वो आज भी उन परम्पराओं और संस्कृतियों से जुड़े हैं, जो सैकड़ों साल पहले से चली आ रही हैं.

आदिवासियों की दलील है कि हमारी धरती सूर्य के चारों ओर दाईं से बाईं ओर परिक्रमा करती है.
अनाज पीसने के लिए चक्की को भी दाएं से बाएं घुमाया जाता है. विवाह के वक्त फेरे भी दाएं से बाएं लिए जाते हैं. आदिवासियों के पारंपरिक नृत्य के दौरान कलाकार दाएं से बाएं घूमते हैं. यहां तक कि खेत जोतने वाले बैल भी जुताई के दौरान दाएं से बाएं तरफ घूमते हैं. लिहाजा घड़ी के सुइयों के चलने की दिशा भी दाएं से बाएं होनी चाहिए.

आदिवासी समुदाय का मानना है कि दुनिया की ज्यादातर समस्याओं की वजह यही है कि लोग वक्त की उल्टी दिशा को तरजीह दे रहे हैं. आदिवासियों के मुताबिक जब तक दुनिया उनकी एंटी क्लॉक चलने वाली घड़ी नहीं अपनाएगी, दुनिया की समस्याएं दूर नहीं होंगी.
आदिवासी नेता भंवरलाल परमार के मुताबिक होली हो चाहे पीपल पूजा हो चाहे, मंदिर हो चाहे आरती हो आप लेफ्ट साइड से करते है जबकि हैम राइट साइड से करते है. अब यह समय आ गया है कि यह प्रूफ करना हैं कि आप सही है या हम? अगर हम गलत है तो पृथ्वी को, चंद्र को उल्टा घुमाकर दिखाइए, बेल को उल्टा चलाकर दिखाइए, हम साढ़े आठ प्रतिशत लोग प्रकृति के अनुसार घूम रहे है तो आप लोग क्यो उल्टा घूम रहे हो?

सिर्फ गुजरात ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के आदिवासी समुदायों में भी उल्टी घड़ी एक जनआंदोलन बन चुकी है. इन घड़ियों की शुरुआत कब हुई, इसका कोई पुख्ता सबूत नहीं है.



शुरू में इस घड़ी को देखना अटपटा था, लेकिन अब तो हालत ये है कि आदिवासियों ने शहरी घड़ी देखना सालों पहले बंद कर दिया है. आदिवासियों के मुताबिक यही घड़ी प्राकृतिक घड़ी है. उल्टी घड़ी की पड़ताल में जुटी न्यूज18 की टीम दाहोद के एक सरकारी दफ्तर का मुआयना करने पहुंची. यहां के जिला पंचायत भवन में कदम रखते ही हम चौंक गए, क्योंकि यहां भी दीवार पर आदिवासी घड़ी टंगी दिखी.



न्यूज18 ने दाहोद के एक सरकारी दफ्तर में टंगी उल्टी घड़ी के बारें में सरकारी कर्मचारी विल्सन संगाडा से बातचीत की. उनसे हुई बातचीत के अंश इस प्रकार हैं--

सवाल: कितने बजे है विल्सन?
विल्सन: अभी एक बजने में10 मिनट बाकी है.
सवाल: आपको कन्फ्यूजन नही होता!
विल्सन: नही,पहले कंफ्यूसन होता था लेकिन अब आदत हो गई है.
सवाल: क्यों लगाये इस घड़ी को?
विल्सन: आदिवासियों का यह प्रतिक है.

अब हमारे सामने सवाल ये था कि ये घड़ियां आदिवासियों तक पहुंचती कैसे हैं. इसे कौन बनवाता है, कहां तैयार होती हैं उल्टी दिशा में चलने वाली घड़ियां. हमें पता चला कि पास के बाजार में एक आदिवासी दुकानदार इन घड़ियों को बेच रहा है.


आदिवासी समुदाय के राजेश भाँभोर ने कहा है कि यह समाज की संस्कृति का प्रतीक है. हमारे समाज के लोगों को प्रकृति के पास दोबारा लाने का प्रयास है. युवाओं में खास जनजागरण हो रहा है.

राजेश भांभोर ने बताया कि ऐसी घड़ियां गुजरात के तापी जिले में तैयार हो रही हैं. हमारी टीम ने तापी का रुख किया. वहां लालभाई नाम के एक आदिवासी कार्यकर्ता की देखरेख में उल्टी दिशा में चलने वाली घड़ियां तैयार हो रही हैं. यहां से अब तक 15 हजार से ज्यादा घड़ियां गुजरात और दूसरे राज्यों के आदिवासी इलाकों में जा चुकी हैं. अब तैयारी उल्टी चलने वाली हाथ घड़ी बनाने की है.


आदिवासी कार्यकर्ता लालभाई के मुताबिक घड़ियों की मांग बढ़ती जा रही है.अबतक 12 से 15 हजार घड़ियां घर घर पहुंचाई जा चुकी हैं.

लालभाई के मुताबिक युवाओं में इस प्राकृतिक घड़ी को लेकर दीवानगी दिख रही है. फेसबुक के जरिए भी इसका प्रचार किया जा रहा है और आदिवासी घड़ी दूर-दराज के इलाकों तक भी पहुंचाई जा रही है. यहीं हमारी मुलाकात उस शख्स से हुई जो रहने वाले तो झारखंड के हैं लेकिन इस घड़ी को उन्होंने देश के कई राज्यों तक फैलाने में अहम भूमिका निभाई है.



मुकेश बिरवा की मुहिम आदिवासी इलाकों में रंग दिखाने लगी है, लेकिन उनकी ख्वाहिश है कि एक दिन ऐसा आएगा जब पूरे देश में इसी घड़ी का इस्तेमाल होगा और हर कोई कुदरत के साथ तालमेल बिठाना सीख जाएगा.

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